Monday, 4 May 2020

दोहे

नेता , अधिकारी , पुलिस , खूब उड़ायें मौज ।
बदहाल खड़ी जनता , साँसें अपनी  रोक ।।
देश का सारा माल , इनकी बढ़ाये तोंद ।
सत्ता से चिपके बैठे , स्वार्थ की लगा गोंद ।।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

सजल

सजल
समांत - आई
पदांत - है
मात्रा भार - 29
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ईश्वर  ने  यह दुनिया अनुपम ,अद्भुत  बनाई है
पंछी , प्रकृति ,जीव जंतु , जनाकृतियों से सजाई है
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उसने चाहा तो यही था कि सब मिलकर साथ रहें 
इंसान और इंसान के बीच  गहरी खाई है
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चमन बनाया  था जिसे  सहयोग  और सद्भाव से
मानव ने वहाँ झूठ ,फरेब  की बस्ती बसाई है
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भस्म हुई  हैं नीतियाँ , विलुप्त हो रहे हैं संस्कार
बैर ,कटुता की यह अग्नि जाने किसने जलाई है 
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विपत्तियों  की  गर्म हवा में सहयोग की बारिश ने
इंसानियत  के जीवित होने की आस जगाई है
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़



मुक्तक

पीर यह मन की कील बन गई है ,
धार थी नद की  झील बन गई है ।
फलक पर मन के यह उड़ान भरती_
आघात  करती चील बन गई है  ।।
डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़
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पा   श्चात्य रीति को हम विस्मृत कर लें ,
जीवन - शैली अपनी परिष्कृत कर लें ।
आत्मसात कर लें जीवन - मूल्यों को_
भविष्य हम अपना  सुसंस्कृत कर लें ।।
डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़
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प्रवृत्तियों पर अपनी चिंतन कर लें ,
कमियों पर अपनी मनन कर लें ।
कुछ तो उथल - पुथल होगा ही_
मन रूपी सागर- मंथन कर लें ।।
डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़

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मुक्तक

निकले थे नापने  दुनिया नाप न सके ,
रिश्तों की गहराई  को वो माप न सके ।
चले थे  जीतने जो दूसरों के दिल को_
दर्द वह जीवनसाथी का  भांप न सके ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा  चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

खूनी बावड़ी ( कहानी )

 बरसों बाद  अनुभा अपनी सहेलियों के साथ छुट्टी मनाने अपने गाँव जा रही थी ।  दादा - दादी के गुजर जाने के बाद पापा ने ही वहाँ जाना छोड़ दिया तो बाकी लोगों का तो प्रश्न नहीं उठता । बचपन की कुछ  बातें अभी भी स्मृतियों में स्थान
बनाये हुए हैं । गाँव है भी  तो बहुत दूर..पहाड़ों के आँचल तले 
हरे - भरे वनों के बीच नदी ,तालाबों , बावड़ियों से भरपूर ।ऐसी घनी छाँह फिर नसीब नहीं हुई , वह तो हार गई पापा की मिन्नतें कर - कर के पर पापा ने तो कुछ न कहने की कसम खा ली थी । अनुभा समझ सकती थी उनका मन..उस जगह उनकी कितनी खट्टी - ,मीठी यादें हैं । उनके अपने जिन्होंने उन्हें गोद में खिलाया , साथ पढ़े हमजोली बने । कुछ हैं तो कुछ बिछड़ गये । ज्यादातर तो चले ही गये , उन्हें याद कर अधिक उदास हो जाते थे पापा इसलिए कभी किसी ने बहुत जिद नहीं की । अब वक्त काफी आगे निकल चला है ,अनुभा की शादी हो गई और अब वह अपने निर्णय लेने में समर्थ है।एक दिन उसने अपनी सहेलियों के सामने अपने खूबसूरत गाँव का जिक्र किया तो वे भी व्यग्र हो उठीं कि कुछ दिन शहर के कोलाहल , नौकरी की चिखचिख और व्यस्तताओं के बीच कुछ सुकून के पल चुरा लिया जाये  । भीड़ भरे हिल स्टेशन जाना कोई नहीं चाहता था इसलिए आनन -फानन प्रोग्राम बन गया ।
        विंध्याचल  की खूबसूरत  शिखरों के बीच एक छोटा सा गाँव था   रामपुर  जिसकी आबादी बमुश्किल ढाई सौ होगी । हाँ थोड़ा मालगुजार लोगों का गाँव था तो बड़े - बड़े मकानों के नक्काशीदार  दरवाजों  , मण्डपों के खंडहर आज भी उस वक्त की  सम्पन्नता की कहानी कह रहे थे । अब तो लगभग खाली हो चुका था यह , सभी शहरों की ओर पलायन कर गये । दो - चार लोग जिनकी जिंदगी  मजदूरी व खेती  के सहारे  चलती थी  , वे ही  रुके हुए थे ।अनुभा के दादा के घर में उनका एक बहुत पुराना नौकर पीढ़ियों से घर की देखभाल कर रहा था और अपने परिवार के साथ वहीं रहता था ।  चूंकि पापा ने खबर भिजवा दी थी तो उन्होंने घर की सफाई व अन्य व्यवस्था ठीक कर दी थी ।
        गाँव  के संघर्ष भरे , झुर्रीदार चेहरों के बीच   कोई पहचाना चेहरा ढूँढना अनुभा के लिए मुश्किल था , पापा का नाम बताने पर कुछ किस्से निकल पड़ते । दादाजी को सभी जानते थे ।  गाँव के आस - पास के कई मंदिर और दर्शनीय स्थल देखकर वे भावाभिभूत थे । नैसर्गिक सौंदर्य  वहाँ के कण - कण में विद्यमान था । जंगली हवा के झोंके की तरह वे इधर - उधर डोलते रहे । एक दिन अनुभा को याद आया कि बचपन में उसे और सभी बच्चों को एक बावड़ी की तरफ जाने की सख्त मनाही थी । बच्चे क्या बड़े भी उधर झाँकने नहीं जाते थे । कहा जाता था कि वह बावड़ी अभिशप्त है । उसका स्वच्छ जल देखकर कई लोगों ने कोशिश की उसे खुलवाने की पर वह जीवित नहीं बचा । क्या आज भी उसे खोला नहीं गया है -अनुभा ने उसकी पड़ताल की तो पता चला कि अब भी उस खूनी बावड़ी के बारे में कोई बात नहीं करना चाहता । उनके नौकर की पत्नी ने बताया कि वर्षों पहले उस बावड़ी में  नैना की खुदकुशी करने के बाद वह बावड़ी अभिशप्त है और अब उसमें झाँकने वाला हर शख्स दूसरे दिन मरा हुआ मिलता है इसलिए उस बावड़ी को  तारों से घेर कर बन्द कर दिया गया है ताकि अब और कोई जान न जाये ।
       अनुभा और उसकी सहेलियाँ उस कहानी को जानने को बेचैन हो उठीं जो रोंगटे खड़े कर देने वाली थी ।  किसी पहाड़ी नदी की तरह चंचल व निश्छल थी नैना , बेहद खूबसूरत ।  उसका सरस् चितवन चर्चा का विषय बन चुका था , यौवन के आरंभ में ही उसे पाने को कई लोग बेताब हो उठे थे । बड़े - बड़े घरों के रिश्ते आने लगे थे पर वह पगली अपने बचपन के साथी श्रवन से मन ही मन प्यार करने लगी थी ।  एक मालगुजार की बेटी , हजारों बंदिशों के बीच  पलती रही और अपने घर काम करनेवाले  रामू काका के बेटे श्रवन को दिल फे बैठी । पिता को जब यह जानकारी हुई तो खानदान की इज्जत बचाने की जिद ने सही - गलत भुला दिया । श्रवन की हत्या कर उसी बावड़ी में डाल दिया गया । दुःख और प्रेम के वियोग में पागल हो गई नैना । वह अपनी सुध - बुध भूल बैठी ,सच्चाई मालूम होने पर उसी बावड़ी में कूदकर उसने अपनी जान दे दी । उसके बाद तो गाँव में मौत का तांडव होने लगा । न जाने कितनी जानें ली उस खूनी बावड़ी ने ।  भूलकर भी कोई उधर चला गया तो जिंदा नहीं बचता इसलिए लोग अपना घर बार , खेती - बाड़ी बेचकर यहाँ से निकलते गये और कभी लौटकर नहीं आये । अनुभा को अब समझ आया कि पापा जी इसीलिए गाँव जाने के नाम से ही सहम जाते थे और उदास हो जाते थे । अब वे शीघ्र वहाँ से निकल जाना चाहते थे क्योंकि अनुभा जानती थी पापा तब तक चिंतित रहेंगे जब तक वह वापस घर नहीं पहुँच जाती । कुछ सोचकर उसके होठों पर मधुर मुस्कान खिल गई थी .....जिंदगी  के कठोर अनुशासन में रहे पापा जी ने उसके प्रेम - विवाह को स्वीकार कर लिया था शायद यह उस अभिशप्त खूनी बावड़ी का उसे उपहार था ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

शशश....कोई है ( कहानी )

प्रशांत के फोन आते ही रवि की नजर घड़ी पर चली गई । रात के एक बजे उसे क्या काम आ गया । रवि समझ नहीं पा रहा था कि प्रशांत ने उसे तुरंत अपने घर आने के लिए क्यों कहा । शायद उसकी तबीयत ठीक नहीं,  ऐसा  लगता है । वैसे भी वह मम्मास बॉय ही रहा शुरू से , वो तो नौकरी के कारण उसे  घर से दूर रायपुर आना पड़ा नहीं तो वह मम्मी पापा को छोड़कर कभी नहीं आता । शुक्र है यहाँ उसके बचपन का दोस्त रवि था , उसके घर कुछ दिन रहकर वह एक किराये के घर में शिफ़्ट हो गया था । रवि और उसकी पत्नी तो यही चाहते थे कि वह उनके साथ रहे , पर कितने दिन कोई किसी के साथ रहे .. दो- चार दिन की बात तो थी नहीं ।
       उन दोनों ने न जाने कितने सारे घर देखे पर कोई पसन्द ही नहीं आ रहा था । रवि का एक दोस्त था सुमित जो न्यूयार्क में रहता था । उसका बंगला खाली पड़ा था और उसने रवि को यह जिम्मेदारी दी थी कि वह उसके लिए किरायेदार ढूँढे ताकि बंगले की उचित देखभाल होती रहे । हालांकि प्रशांत का बजट इतने बड़े बंगले के लायक नहीं था , लेकिन रवि के कहने पर बंगले के आधे हिस्से को बंद करके आधे हिस्से में  प्रशांत को रहने की अनुमति सुमित ने दे दी थी । 
            रवि तुरंत प्रशांत के घर जाने के लिए निकल पड़ा । रात्रि की नीरवता और अंधेरे में  पूरा शहर किसी बच्चे की भाँति निश्चिंत  सो रहा था । प्रशांत घर के बाहर ही रवि की प्रतीक्षा कर रहा था । वह बहुत घबराया सा दिख रहा था , इस कड़ाके की ठंड में भी वह पसीने से तरबतर था । हाथ - पैर कांप रहे थे और वह कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था । रवि  प्रशांत को  साथ लेकर अपने  घर आ गया था और  उसे  दवा देकर सुला दिया था ।
           दूसरे दिन सुबह प्रशांत की हालत सामान्य हुई तब रवि ने उससे रात की घटना पर प्रश्न किया  - "आखिर वह कौन सी घटना हुई जिसने तुम्हें स्तब्ध कर दिया प्रशांत ?"
प्रशांत ने बताया  -  जब से मैं वहाँ रहने गया था मुझे  कुछ न कुछ अजीबोगरीब घटनाएँ होते दिखाई दी पर मैंने  उन्हें उतनी गम्भीरता से नहीं लिया । रात को अजीब सी आवाजें सुनाई देतीं पर कल पहली बार मैंने बंगले के बन्द वाले हिस्से की खिड़की में किसी को बैठे देखा । वह एक औरत थी जिसका चेहरा बहुत डरावना था ,उसके बाल लंबे व बिखरे हुए थे ।आँखें बड़ी - बड़ी और लाल दिखाई दे रही थी मानो उनमें अंगारे भरे हों । मैं वह सब देखकर बहुत डर गया था , बड़ी मुश्किल से तुझे फोन कर पाया । आगे का हाल तो तू जानता ही है ।
         मुझे तो  बहुत अचरज हो रहा है ऐसा सुनकर क्योंकि मैंने उस बंगले के बारे में कोई बात नहीं सुनी । हो सकता है यह तुम्हारा  भरम हो । उस घर को जब सुमित ने लिया तब भी उसके बारे में हमें कुछ गलत नहीं कहा किसी ने । सुमित के विदेश जाने के बाद उसकी मम्मी वहाँ अकेली बहुत वर्षों तक रही । उनके निधन के बाद कई लोग वहाँ रहे तो भी किसी ने कुछ नहीं कहा । यदि तुम्हारे मन में कोई शंका है तो तुम अब वहाँ मत जाओ । अभी यहीं हमारे साथ रहो , फिर कोई दूसरा मकान देख लेते हैं । 
  अरे नहीं यार ! ऐसी भी कोई बात नहीं , रहकर देखते हैं.. वैसे कोई भूत हो तो भी रह लेंगे एक से भले दो - प्रशांत ने हँसते हुए कहा । अच्छा बच्चू , कल की हालत भूल गया क्या  , अभी  इतनी हिम्मत आ गई कि भूत के साथ रहने की इच्छा हो रही है । चल देख लेते हैं , यह किसी की बदमाशी भी हो सकती है , ध्यान रखना । उस घर पर बहुत लोगों की नजर थी खरीदने के लिए , पर सुमित की ढेर सारी यादें जुड़ी हैं उस घर से इसलिए वह बेचना नहीं चाहता । परदेश में आखिर कब तक रहेगा हो सकता है कभी लौट भी आये ।
      उस दिन के बाद प्रशांत पुनः अपनी दिनचर्या में सामान्य हो गया । पर कभी - कभी कई घटनाएं उसे चौंका देती थीं , मानो कोई उसका बहुत ध्यान रख रहा हो । प्रशांत को कई बार माँ की याद आ जाती थी और वह वीडियो कॉल करके उनसे मिलने की अपनी इच्छा पूरी कर लेता । पिताजी का स्वास्थ्य खराब होने के कारण वह उसके साथ नहीं आ सकती थी । प्रशांत  सुबह कुछ नाश्ता कर ड्यूटी चला जाता और वहीं कुछ खा लेता , शाम को फल , दूध लेकर घर आता और रात का खाना स्वयं बना लेता । अकेले टी वी देखकर कितना टाईम पास करता तो इसी बहाने थोड़ा व्यस्त भी रहता , वैसे वह मम्मी का लाडला था तो किचन में चक्कर लगाता रहता । कभी - कभी मम्मी की मदद भी कर देता । यहाँ घर की सफाई व अन्य कार्यों के लिए उसे एक नौकर  शिव भी मिल गया था ।कई बार रात का खाना बनाते हुए उसका आधा -अधूरा छोड़ा हुआ काम उसे सुबह खत्म हुआ मिलता , उसे घर में किसी की उपस्थिति महसूस होती थी एक छाया सी ,....पर उसने प्रशांत को कभी कोई चोट नहीं पहुंचाई ।  कुछ दिन पहले शिव काम पर नहीं आया था तो उस दिन ऑफिस जाने में प्रशांत को देर हो गई और हड़बड़ी में वह दूध गैस पर चढ़ाकर  बन्द करना भूल गया । ऑफिस में अचानक याद आने पर दौड़ा -  भागा वापस आया तब तक तीन  - चार घण्टे बीत चुके थे । दूध के जलने से अधिक उसे गैस के खुले रहने का डर था कि कहीं कोई अनहोनी न हो जाये , पर जब वह घर पहुँचा तो उसने गैस बंद पाया मानो किसी ने बंद किया हो । एक - दो बार ऐसी कई दुर्घटनाएं होते - होते बचीं । भूत प्रेत तो नहीं पर यहाँ उसकी सहायक कोई दिव्य - शक्ति जरूर है , उसने  सोचा ।
                  उस रात की तरह  खिड़की पर उस औरत की परछाई उसे कई बार दिखी पर अब उसे डर नहीं लगता था  हाँ वह सच  जरूर जानना चाहता था  । वह परछाई अक्सर उसे रात के वक्त दिखती थी खिड़की पर कोहनी टिकाये मानो उसे किसी के आने का इंतजार हो । एक दिन शिव को सफाई करते हुए एक डायरी मिली जिसे वह प्रशांत  को देकर गया । यह प्रशांत की डायरी नहीं थी पर उसे पढ़ने का मोह वह छोड़ नहीं पाया ।
          दिव्याभा ...हाँ यही नाम लिखा था उस पर । पढ़ना शुरू किया तो पढता ही चला गया ।  उसने अपनी पूरी जिंदगी उन पन्नों में उतार दी थी । एक स्त्री जीवन के विभन्न पक्षों का सजीव चित्रण  था ।  उसके मन की गहराइयों में डूबी पीड़ा शब्दों में उभर आई थी । उन पन्नों से लगाव हो गया था प्रशांत को , इतना अधिक कि उसे न खाने की सुध रही न पीने की । वीकेंड कैसे बीता पता ही नहीं चला । वह एक प्यारी व अपने माता - पिता की चिंता करती बेटी थी तो एक आज्ञाकारी  जिम्मेदार पत्नी भी  । फिर बेटे के जन्म के बाद डायरी के पन्ने खाली छूट गए थे जो उसका अपने बच्चे की देखभाल की व्यस्तता बता रहा था । कुछ वर्षों के बाद पुनः डायरी लिखना प्रारंभ हुआ शायद बेटे के बड़े होने के बाद उसने फिर से लिखा  हो । उसके बाद बेटे के विदेश जाने के बाद के पन्ने  एक माँ के दर्द से लिखे हुए थे । कितनी करुणा थी उन शब्दों में , मानो वे स्याही से नहीं  आँसुओं से लिखे गए हों । इंतजार का हर पल कितना लम्बा होता है , दिव्याभा  ने हर पल अपने बेटे  का इंतजार किया था , उसकी शादी , बच्चे के जन्म पर मिलने की इच्छा बड़ी शिद्दत से  व्यक्त की थी । बेटा बहाने ही बनाते रहा , काम की व्यस्तता  क्या मनुष्य को अपने प्रियजनों से अधिक प्रिय हो सकता है । लोग क्यों भूल जाते हैं कि सुख - सुविधाएं इंसान के लिए है पर इंसान उसके लिए अपना सब कुछ भूल जाता है । जिंदगी क्या इंतजार करती है मनुष्य के सफल होने का , वह तो अपना कार्य करती रहती है । कहाँ कितनी देर रुकना है यह तो मनुष्य को ही तय करना रहता है।
प्राथमिकता किसे देनी है यह तो  उसके हाथ में है ,मनुष्य अपनी मुट्ठी में वक्त को भर कर रख लेना चाहता है और कल के लिए अपनी खुशियों को स्थगित करते रहता है जो कभी आता ही नहीं । अपने बेटे और उसके परिवार का इंतजार करते एक माँ की आँखें पथरा गई , काया हड्डी के ढाँचे में बदल गई और वह उन अस्थियों के विसर्जन के लिए भी नहीं आ पाया । माँ का शरीर तो चला गया पर आत्मा यहीं रह गई ।
     प्रशांत की आँखों से आँसू अनवरत बह रहे थे ...तो वह एक माँ है । माँ तो माँ होती है चाहे वह सदेह हो , भूत - प्रेत हो या उसकी रूह ..वात्सल्य से भरी । प्रशांत की नजरें उस खिड़की पर लगी थी...आँसुओं के धुंधलके के पार  आज वह उस माँ को देखना व नमन करना चाहता था ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़


   

Wednesday, 29 April 2020

सीख (संस्मरण )

बात उन दिनों की है जब मैं बारहवीं कक्षा में पढ़ती थी । उस समय मेरे पापा के रिश्ते के बड़े  भाई जो गाँव में रहते थे वो अक्सर आया करते थे  । वे अपनी बेटी की शादी तय करने के सिलसिले में आते थे , हमारे घर पर रुकते । चूँकि मम्मी के वे जेठ लगते थे अतः उन्हें खाना , नाश्ता मुझे ही परोसना पड़ता था । अपनी पढ़ाई को छोड़कर उनके कार्य से मुझे कई बार उठना पड़ता था इसलिए मैं चिड़चिड़ा जाती थी । बड़े पापा कितने स्वार्थी हैं , बस अपनी ही सुविधा देखते हैं दूसरों के बारे में नहीं सोचते । मैं पापा जी से यही शिकायत करती थी , वे मुझे बड़े प्यार से समझाते कि थोड़ी बहुत तकलीफ होती है तो उठा लेना चाहिए लेकिन दूसरों की सेवा , सहायता करना बहुत पुण्य  का कार्य है । उनकी मजबूरी है इसलिए आते हैं नहीं तो अपना घर छोड़कर कौन आयेगा । पापा बहुत शांत स्वभाव के है । उन्हें क्रोध करते मैंने बहुत कम ही देखा है  , वे स्वयं कभी किसी से  कोई अपेक्षा नहीं रखते थे  और दूसरों की सहायता करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे । मुझे ऐसा लगता था कि लोग उनके सरल स्वभाव का फायदा उठाते हैं और अपना काम पूरा होने के बाद  भूल जाते हैं । कुछ वर्षों के पश्चात जब उन बड़े पापा की बेटी की शादी तय हो गई   उसके बाद वे जब भी मिलते पापा जी की बहुत प्रशंसा करते । उन्होंने जीवन भर उनका एहसान माना कि पापा के कारण उनकी बेटी की शादी तय हो पाई । हम सबकी वे खूब तारीफ करते , मुझे  बाद में बहुत पछतावा हुआ कि मैंने उनको गलत समझा । पेड़ पर जब फल लगते हैं तब हमें उसकी उपादेयता समझ आती है उसी प्रकार पिता के किये गए अच्छे कार्यों का प्रभाव जब हमें दूसरों के सहयोग द्वारा मिला तब समझ आया कि पापा क्यों दूसरों की मदद करने के लिए बोलते थे । उनके कारण हमारे कई कार्य बड़ी सहजता से पूरे हुए  और हमने दूसरों की मदद करने का  सबक आसानी से सीख लिया ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़