उसने कहा -"मुझे सुनो,"
वह नकार दी गई ।
उसने कहा- "मुझे जाने दो "
बंदिशें और बढ़ा दी गईं ।
उसने कहा- "मुझे उड़ने दो "
उसके पर कतर दिए गये ।
उसने कहा मुझे जीने दो,
वह मिटा दी गई।
उसने कहा - "मुझे आज़ाद करो"
वह संस्कारों से बाँध दी गई।
उसने कहा - "मुझे खड़े होने दो"
वह सलीब पर लटका दी गई।
उसने कहा - "मुझे निकलने दो "
दहलीज पर लक्ष्मण -रेखा खींच दी गई।
उसने अब कहना या पूछना छोड़ दिया है
और निकल पड़ी एक अंतहीन सफर पर,
करने चली अपने मन की।
ढूँढने निकली अपना अस्तित्व,
चल दी जिधर ले गये कदम,
राहों में मिली बाधाएँ कईं ।
मुश्किल था बंदिशों को तोड़ पाना,
पर उससे भी मुश्किल था,
अपने- आप से लड़ना,
अपने -आप को पाना।।
-----०-----
- डॉ. दीक्षा चौबे,दुर्ग
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