Monday, 4 May 2020

मुक्तक

लघु होकर  अस्तित्व का  भान कराती है ,
कर्मठता , गतिशीलता का ज्ञान कराती है ।
बाधाओं के आगे कभी हार नहीं मानती_
 लगनशीलता चींटी का मान बढ़ाती  है ।।
स्वरचित -डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

रात चाहे जितनी भी काली हो

रात चाहे जितनी भी काली हो , सूरज जरूर निकलता है ।उसी प्रकार  चाहे जीवन में  जितना भी अंधेरा आये , मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़े परन्तु उनका अंत होना ही है । कभी न कभी तो यह अंधेरा दूर होगा और एक उजला , मुस्कुराता हुआ दिन हमारा स्वागत करेगा । हमारे आस और विश्वास की अवश्य जीत होगी  ,हमारी चाहतें पूरी होंगी , ख्वाहिशों को हौसलों व साहस के पर लगेंगे ।आँखों में ख्वाब होंगे और दिल में उन्हें पूरा करने का  जज़्बा होगा । अपने सपने , अपनी  मंजिल को पाने की कोशिशें होंगी  । वक्त के कदमों से कदम मिलाते हुए हम अपने लक्ष्य को पाने में सफलता प्राप्त करेंगे ।  जीवन - सरिता बह निकलेगी अपने उसी  तीव्र प्रवाह के साथ समंदर से मिलने को । अभी कुछ पल के लिए रुक गए हैं तो झील की तरह निर्मल और मीठे जल का स्त्रोत बने रहें , अपने मन की  तलहटी में निराशा , अविश्वास रूपी कीचड़  को न जमने दें । अपने जीवन को सक्रिय , उपयोगी बनायें ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

बेबस मानव

किस बात का अहंकार है
किस बात पर उछलता है
बेबस हुआ है मौत के आगे
रे मानव ! तेरा कहाँ वश चलता है ।।

ज्ञान - विज्ञान में खूब बढ़ा
तरक्की की सीढियाँ चढ़ा
चाँद के पार जाने वाले
बेदम हो धरा पर गिरता है ।

खोज ली रोगों की दवा
फिर भी प्रिय को न रोक सका
नदियाँ रोकी , बाँध बनाये
पर अब भी बाढ़ में सब बहता है ।

खत्म किये वन्य जीव ,जंगल
खड़े किए कंक्रीट के महल
कारखानों के कसैले धुँए में
अब तेरा दम क्यों घुटता है ।

प्रकृति से किया छेड़छाड़ 
जिंदगी से किया खिलवाड़ 
डरकर विषाणु महामारी से
क्यूंअब  कैद घरों में रहता है ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़



मुक्तक

खत्म न हो ऐसी कोई रात नहीं है ,
छुपा सकें ऐसी कोई बात नहीं है ।
रिश्ता तोड़ने से पहले सोचना जरा_
टूट कर जुड़े ऐसा कोई पात नहीं है ।।

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सागर की विशालता में हर बूँद का योगदान है
इस अथाह जलागार में हर प्रवाह का सम्मान है ।
आकर विविध पर्वत , प्रान्त से मिलती जलधाराएँ_
चख लो कहीं पर से जल का स्वाद एक समान है ।।
तिरोहित कर स्वयं को सब हो जाती एक समान हैं ।।
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़

मुक्तक

हो जाओ सावधान भाई
सामने आपदा जो आई
जीवन बचाने है जरूरी
स्वास्थ्य , सुरक्षा व सफाई ।।

डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

मुक्तक मई दिवस

मजदूरों के हाथ में है दुनिया की डोर ,
उसके कठिन परिश्रम का न कोई ओर- छोर।
उसके कंधे पर ही है नव - निर्माण का भार_
कर्मशील इंसान वह न कभी मचाये शोर ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

पिंजरे में बंद तोते

पिंजरे में बंद तोते आपस में गुफ़्तगू कर रहे ,
क्या हो गया  इंसान को  जो कमरे में बंद रह रहे ।
बदला हुआ व्यवहार है , दिखा रहे कुछ प्यार है ,
कुदरत ने सिखा दिया  मीठे बोल मुँह से झर रहे ।
शोर थम गया है वाहनों का ,सड़कें हो गई सूनी  ,
नीर , वायु स्वच्छ हुए ,गगन में पंछी विचर रहे ।
जान रहे संस्कृति को  , मान रहे विधि - विधान ,
योग , शाकाहार अपना वे एकांत मनन कर रहे ।
मान लिया उसने कि  प्रकृति का किया शोषण ,
रुक गई है दौड़ साधन की , मानव अब सुधर रहे ।

स्वरचित - डॉ.  दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़