Wednesday, 7 August 2019

चलो आज

 चलो आज ...
बीती बातों को भूल जाते हैं ,
आज को जीते हैं ,
जी भर कर मुस्कुराते हैं ।

क्या होगा यह सोचकर कि
वो कह न पाये जो कहना था
वो सब कर न पाये जो करना था
क्यों इस बात पर वक्त गंवाते हैं ।
चलो आज बीती बातों को भूल जाते हैं ।

क्यों रोयें यह बोलकर कि
उसने मेरे बारे में ऐसा क्यों कहा
मेरी बातों को अनसुना कर दिया
क्यों दूसरों की बातों को दिल पे लगाते हैं ।
चलो आज बीती बातों को भूल जाते हैं ।

क्यों  सोचें  इस तरह कि
तुम्हें उसके जैसे ही करना है
बस  उसके पीछे ही पीछे चलना है
हम अपने लिए एक नई राह बनाते हैं ।
चलो आज बीती बातों को भूल जाते हैं।

क्या हो गया कि
एक प्यारा साथी छूट  गया
दिल से  जुड़ा  रिश्ता टूट गया
टूट जाने पर परिंदे नये  घोंसले बनाते हैं ।
चलो आज बीती बातों को भूल जाते हैं ।
आज को जीते हैं , जी भर मुस्कुराते हैं ।

स्वरचित   - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Tuesday, 6 August 2019

जन्मस्थली ( संस्मरण )

#जन्मस्थली

" जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी "
अर्थात जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होती है । मेरा जन्म दुर्ग जिले के धमधा में हुआ , उस दिन देवउठनी एकादशी थी । जन्मस्थली का आकर्षण शायद कभी खत्म नहीं होता । वहाँ से गुजरते हुए मन अतीत की गलियों में पहुँच ही जाता है । वो सुनहरा बचपन , वो प्रायमरी स्कूल और वे दोस्त । इतनी छोटी उम्र में भी मैंने बहुत सी पक्की यादें संजोकर रखी हैं । पापा जी की पोस्टिंग वहीं थी , वहाँ हम लोग लगभग  दस वर्ष रहे । उस जगह और वहाँ के लोगों से अब भी मुझे बहुत लगाव महसूस होता है । वह जमाना था जब पड़ोसियों से बहुत ही मधुर रिश्ता होता था , सब्जी की कटोरी  का आदान - प्रदान रिश्तों में भी स्वाद भर जाता था । अड़ोस - पड़ोस में  किसी के घर कुछ भी बनता तो उसके हिस्से सबके लिए होते थे । तमेरपारा में  हमारे पड़ोस के घर से मुझे बहुत प्यार मिला । मम्मी बताती थी कि मैं खूब गोल - मटोल सी थी तो डीडीबाई  (पड़ोसन )  मुझे अपने साथ घर ले जाती और वहाँ मैं घण्टों रह जाती । अपनी तुतलाती बोली में उन्हें डीडी बाई कहती तो वह प्रसन्न हो जाती और मुझ पर निहाल हो जाती । वर्षों बाद उनके बेटे के द्वारा  उनके पार्षद बनने पर अत्यंत प्रसन्नता हुई और बाद में उनके निधन का  समाचार जानकर कुछ खो देने का एहसास भी । वहीं मम्मी ने अपने एक  सहनाम के साथ गंगाजल बदा था जिनके परिवार के साथ हमारे सम्बन्ध वर्षों तक बने रहे । महज गेहूँ  के पौधे ( भोजली ) बदल कर दोस्ती को एक प्रगाढ़ रिश्ते में बदल दिया  जाता था । वहाँ मम्मी को मायके की तरह ही दुलार मिलता । कई वर्षों बाद भी वहाँ का जिक्र छिड़ने पर कुछ भावुक सी हो जाती हूँ मैं क्योंकि उन यादों के मूल में माँ की यादें भी हैं ।
        बचपन की एक सहेली लगभग बीस वर्षों बाद मिली तो हमने अपनी बातों का पिटारा खोल कर रख दिया । बचपन में तू ऐसा करती थी ..हमने क्या क्या मस्ती की थी आदि आदि ।आज न हमारे पास उतना समय है न पड़ोसियों  के पास । कभी - कभी तीज - त्यौहारों पर प्लेट्स भी आते जाते हैं पर अब वो अपनापन कहीं खो सा गया है । व्यस्तता और स्वार्थ ने एक नए समाज को जन्म दिया है जहाँ सिर्फ दिखावा है विश्वास नहीं । फार्मेलिटी है अपनापन नहीं । बनावटीपन है सहजता नहीं । वो वातावरण की शुद्धता खो गई है जहाँ अपनी खुशियाँ बाँटने के लिए कोई बंधन नहीं था और प्यार लुटाने की कोई सीमा नहीं थी । आज भी तरंगित हो उठता है मन उन बातों को याद करके ...भीतर ही भीतर कुछ रीसने लगता है और अनायास ही पलकें भीग जाती हैं । जन्मस्थली तो अब भी है पर वो लोग नहीं हैं जिनका स्नेह अपनी स्मृति में गांठ बांध कर रखा है मैंने धरोहर की तरह ।

आपकी अपनी
डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Monday, 5 August 2019

सिर्फ तुम

इन आँखों ने देखे ख्वाब कई ,
उन ख्वाबों की ताबीर हो तुम ।
संजोकर  रखा है जिसे बरसों ,
वो अनमोल जागीर हो तुम ।
बाँध लिया मुझे जन्मों के लिए ,
प्रीत की वो जंजीर हो तुम ।
मोल न चुका सकूँ कभी भी,
वो बेशकीमती बेनजीर हो तुम ।
खुदा ने तराशा तुम्हें मेरे लिए ,
हाथों में किस्मत की लकीर हो तुम ।
सिर्फ तुम मेरे मन - मंदिर के देव ,
दिल में मढ़ी सुन्दर तस्वीर हो तुम ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

दोस्ती बनी मिसाल

बोलती  तस्वीर - 91
तिथि - 4 अगस्त 2019
वार - रविवार

मोरपंख  शीश धरे , गले वैजयंती माल ,
स्याम वर्ण पीताम्बर धारी नन्द के लाल ।
छुपकर बैठे हरी घास पर ले कदम्ब की छांह ,
लड्डू लिये हाथों में सामने मिष्ठान्न की थाल ।
एक - दूजे की आँखों में रहे प्यार से झाँक ,
डाल बाँह गले में श्रीदामा संग बैठे गोपाल ।
पग पैंजनी कर्ण कुण्डल गले स्वर्ण माल ,
जनेऊधारी सुदामा को गले लगाते दीनदयाल।
भेद नहीं ऊंच - नीच का , हृदय  है विशाल ,
कृष्ण - सुदामा की दोस्ती  बनी एक मिसाल ।
नेह , विश्वास  के रिश्ते में भक्ति हुई निहाल ,
बिना कहे जो पढ़ लेते सखा के दिल का हाल ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Sunday, 4 August 2019

दोस्ती

मोरपंख  शीश धरे , गले वैजयंती माल ,
स्याम वर्ण पीताम्बर धारी नन्द के लाल ।
छुपकर बैठे हरी घास पर कदम्ब की छांह ,
लड्डू लिये हाथों में सामने मिष्ठान्न की थाल ।
एक - दूजे की आँखों में रहे प्यार से झाँक ,
डाल बाँह गले में श्रीदामा संग बैठे गोपाल ।
भेद नहीं ऊंच - नीच का , हृदय  है विशाल ,
कृष्ण - सुदामा की दोस्ती  बनी एक मिसाल ।
नेह , विश्वास  के रिश्ते में भक्ति हुई निहाल ,
बिना कहे जो पढ़ लेते सखा के दिल का हाल ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Thursday, 1 August 2019

हरेली पर्व

सावन कृष्ण पक्ष की अमावस्या को छत्तीसगढ़ में हरेली पर्व मनाया जाता है । कृषक खेती का प्रारंभिक कार्य पूर्ण कर इस दिन अपने हल , कुदाली , फावड़ा व अन्य कारीगर अपने औजारों को साफ कर उनकी पूजा करते हैं तथा गुलगुला , बबरा का प्रसाद चढ़ाते हैं जो गुड़ व आटे से बनता है । कहा जाता है कि इस दिन नकारात्मक शक्तियां प्रभावी होती  हैं इसलिए घर के दरवाजे पर नीम की पत्तियां खोंसी जाती हैं और पहले लुहार घर की  चौखट पर कील गड़ाते थे । इसके लिए उन्हें  चावल या रुपये के रूप में दान दिया जाता है। इस दिन से हिंदुओं के त्यौहार की शुरुआत होती है  । घर के बाहरी दीवार पर मानव आकृतियां बनाई जाती हैं । बांस से गेड़ी बनाई जाती है तथा पारम्परिक खेल जैसे फुगड़ी , बिल्लस , कबड्डी , पिट्ठुल खेला जाता है । यह हरियाली का त्यौहार है जो प्रकृति के साथ साथ मनुष्य के जीवन में खुशियों व उमंगों का नव संचार करता है ।

डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

सवनाही ( कहानी )


          इस बार वर्षों बाद गाँव जाना हुआ....दरअसल दादा जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण उन्हें देखने की प्रबल इच्छा हुई इसलिए छुट्टी लेकर बच्चों के साथ  गाँव चली  आई....वरना सावन के  इस  महीने में कभी आना नहीं हुआ । किसी खूबसूरत तस्वीर की तरह लग रहा था गाँव... खेतों से घिरे पच्चीस - तीस छोटे - बड़े मकान  ...उत्तर दिशा में एक बड़ा सा तालाब गाँव के सौन्दर्य में वृद्धि कर रहा था....पानी से भरे  तालाब के चारों तरफ ऊँचे - ऊँचे ताड के पेड़ ,
बरगद , पीपल , नीम की सुहानी छाँव  मन को मुग्ध कर रही थी । तालाब के किनारे महादेव का छोटा सा मन्दिर इस खूबसूरत वातावरण को  पावन बना रहा था । प्रकृति के संरक्षण के साथ आस्था का  संगम  भारत के गाँवों में ही दिखाई देता है । भारतीय संस्कृति  व परम्पराओं में वैज्ञानिकता  रची - बसी  है ।
               वैसे हर मौसम का विशेष प्रभाव होता है परन्तु बारिश का मौसम  बहुत खास होता है । प्रकृति के नवीन स्वरूप के साथ मानव मन भी सक्रिय हो उठता है । कृषक अपनी कर्मस्थली में जुट जाते हैं , वणिक व्यवसाय में तथा श्रमिक श्रम - साधना में तल्लीन हो जाते हैं । जब मैं गाँव में थी तभी कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाने वाला हरेली त्यौहार पड़ा । छत्तीसगढ़ का यह प्रथम त्यौहार है ,  इसके बाद ही बाकी सभी त्यौहार आते हैं... यह कर्म की पूजा का त्यौहार है... खेतों में धान की रोपाई  , निराई - गुड़ाई हो चुकी होती है  । हल , कुदाल आदि कृषि उपकरणों को विश्राम देने का अवसर आ जाता है ।  कृषि के प्रथम चरण की पूर्णता का उत्साह पकवानों की महक की तरह सम्पूर्ण वातावरण में बिखर जाता है । छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल में यह त्यौहार विशेष रूप से मनाया जाता है ।  शहरों में कार्मिकों  के अलावा अन्य लोगों में इसके लिए उतना उत्साह नहीं देखा जाता ।
       बहुत  वर्षों  के बाद  इस अवसर पर मैं गाँव आ पाई हूँ । मेरे बच्चों के लिए तो यह प्रथम अवसर  था और वे बड़े उत्साह के साथ  गाँव की परम्पराओं से  रूबरू हो रहे थे  और उनमें शामिल भी  हो रहे थे  । सबसे पहले हल , फावड़ा , कुदाल , गैती इत्यादि को अच्छी तरह साफ किया गया , फिर उन्हें गोबर की लिपाई किये हुए पवित्र स्थान पर रखकर अक्षत  , पुष्प , धूप अगरबत्ती जलाकर उनकी पूजा की गई  । नारियल ,  मीठे गुलगुले और मीठे  चीला का भोग लगाया  गया  और सबको वितरित किया गया । इस अवसर पर पारम्परिक खेलों का आयोजन किया जाता है जैसे कबड्डी , फुगड़ी , गिल्ली - डंडा आदि । बाँस की दो खपच्चियों को जोड़कर गेड़ी बनाई जाती है जिस पर चढ़ने का अपना ही मजा है । बच्चों ने  गेड़ी पर चढ़ने का भी असफल प्रयास किया और दूसरे बच्चों की गेड़ी की मच - मच करती धुन का  आनंद लिया ।  अचानक उनकी नजर  कुछ घरों की बाहरी दीवार पर बनी आड़ी  तिरछी लकीरों पर पड़ी जिसे गोबर व सिंदूर से बनाया गया था  । प्रतीकात्मक मानव आकृतियों सी यह रचना  सवनाही   कहलाती है ।  स्थानीय मान्यता के अनुसार अमावस्या की काली रातों को बुरी शक्तियों के जागृत होने की  कहानियों से जोड़ा जाता रहा है । विशेषकर हरेली अमावस्या को जादू टोना करने वाली काली शक्तियां प्रबल हो जाती हैं इसलिए उनसे बचने के लिए दीवारों पर सवनाही बनाई जाती है । बचपन में दादी इससे जुड़ी कई कहानियाँ सुनाती । रात को भूत - प्रेत आवाज लगाते हैं यदि उन्हें उत्तर दे दो तो वे अपने साथ ले जाते हैं , सुनकर डर के मारे हम कानों पर कपड़ा लपेटकर सोते । गोबर की बनी यह  सवनाही उन्हें घर से दूर रखती है ऐसा कहा जाता था । गर्मी की रातों में हम सभी छत पर सोते और ऐसे कितने ही किस्से  मोती की लड़ियों की तरह खुलने लगते । कुछ सुनी - सुनाई बातों और कुछ मनगढ़ंत किस्सों  को जोड़कर कई कहानियाँ बुनी जातीं और भय से हमारे हाथों के रोयें खड़े हो जाते , तब भी उन कहानियों को सुनने की दिलचस्पी खत्म न होती ।
        गाँव के घर - आँगन , छत , अडोस - पड़ोस , तालाब , खेत - खलिहान सब अपनी गोद में न जाने कितने ही अतीत के किस्से छुपाये हुए थे ।  उन पर नजर पड़ते ही धान की खड़ी फसल की तरह मन की भीगी धरा पर लहलहा उठे । मधुर स्मृतियों  के पन्ने उलटते - पलटते  मैं कब नींद के आगोश में पहुँच गई पता ही नहीं चला ।
         दूसरे  दिन सुबह सोकर उठी तो वहाँ का माहौल बिल्कुल ही बदला हुआ था ।  कल तक त्यौहार के रंग में रंगा  गाँव आज दुःख , शोक में  डूबा हुआ था । पन्द्रह वर्ष  की  एक बच्ची जो दैनिक कार्यक्रम निपटाने मैदान की ओर गई थी.... उसके साथ अनाचार हो गया था ।  बड़े शहरों में  ही ऐसी अमानवीय घटनाएं होती सुनी थी ...अब गाँव में भी । यह समाचार  सुनकर मन खिन्न हो गया था , गाँव की स्वच्छ , सोंधी हवा में यह कैसा जहर घुल गया ...यहाँ के  भोले - भाले शांत लोगों के बीच ऐसी कलुषित प्रवृति कैसे पनप गई । यहाँ की पावन  माटी  में बुराई का बीज कैसे अंकुरित हो गया । संस्कृतियों , परम्पराओं की धरा में ये कैसी प्रदूषित आंधी चली है जिसने मानवीय मूल्यों को क्षत -  विक्षत कर  दिया । जहाँ सिर्फ और सिर्फ सद्भावना व सहृदयता थी वहाँ नशा , दुष्प्रवृत्तियों  , पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण युवा पीढ़ी   को दिग्भ्रमित कर रहा है । मन में बस एक ही सवाल बार - बार उठ रहा है... हमारे बुजुर्गों ने भूत- प्रेत व बुरी आत्माओं से बचाने के लिए सवनाही बनाने की परम्परा बनाई थी । उन्हें क्या मालूम था कि  इंसान उनसे कहीं  अधिक  खतरनाक साबित होंगे ...काश !  दुष्प्रवृत्ति रखने वाले इन शैतानों को  दूर रखने के लिए भी  कोई सवनाही बनाई जा सकती ?

डॉ. दीक्षा चौबे ,
दुर्ग , छत्तीसगढ़