Saturday, 14 March 2020

सजल - 11

माता - पिता की थी लाडली 
नाज - नखरों के साथ पली 
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कल तक जो चंचल हिरनी
घूमती थी वह गली - गली
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खिल न पाई पूरी तरह से 
अभी तो थी नादान कली
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छोड़ कर बाबुल का आँगन
पिया का दामन थाम चली
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वेदना से झुलसा तन - मन
करना स्नेह की छांव अली
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भोलापन था दोष उसका
दहेज अग्नि में देह जली
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Monday, 9 March 2020

होली

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रहे न मन में  मलाल होली में ,
लगाओ अबीर , गुलाल होली में ।
प्रेम के रंग में रंग जाये जीवन_
हो खुशियों की बौछार होली में ।।
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होली त्यौहार की ढेर सारी शुभकामनाएं - 
समीर , दीक्षा , शुभि , क्षितिज
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Sunday, 8 March 2020

काफी है ( लघुकथा )

 रविवार छुट्टी होने के कारण गृहणियों का काम कुछ ज्यादा
ही हो जाता है । रमा सुबह से ही भिड़ी थी नाश्ता , खाना , बच्चों का यूनिफॉर्म धोना , प्रेस करना  उन्हें पढ़ाना  ..सब करने के बाद शाम को लेटी तो उठने की हिम्मत नहीं हुई । लगभग आधा - पौन घण्टे आराम करने के बाद वह अनमनी सी उठी ..रसोई में कुछ खटपट हो रही थी झांककर देखा तो देखती ही रह गई ।  पतिदेव और दोनों बच्चे खाना बना रहे थे
उसे देखते ही  उसके पति बोले - "अरे ! तुम क्यों उठ गई , तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही , तुम लेटी रहो ।" " हाँ मम्मी आप आराम कीजिए आज हम खाना बना रहे हैं " - उसके नन्हें से लाड़ले बेटे ने कहा तो स्नेहसिक्त हो गया उसका अंतर्मन  । भीगे हुए शब्दों में बस इतना ही कहा - " तुम लोगों को परेशान होने की क्या जरूरत थी , मैं तो आ ही रही थी ।"
बिना कहे उसके प्रियजन उसकी तकलीफ समझ लें , बस ...इतने में ही वह अपनी सारी तकलीफें भूल जाती है  । इतना ही काफी है उसके लिए ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Saturday, 7 March 2020

पूर्वजों ने यही कहा

 पूर्वजों ने यही कहा 
नारियों की पूजा होती है जहाँ ,
देवता निवास करते हैं वहाँ ।।
जब हार मान लेते सभी ,
ब्रह्म , विष्णु , शिव , ऋषि ,
राक्षसों का संहार करने  को ,
लेती जन्म दुर्गा , काली यहाँ ।।
भगिनी वह , जननी वह ,
संस्कारों की वाहिनी वह ।
रीत , व्यवहार , कुल की मर्यादा ,
प्रिय की अंकशायिनी वह ।
वह नीर सी सरल -  तरल ,
उसका निश्चित कोई स्थान कहाँ ।।
दायित्व जब जो भी मिला ,
उसने खुद को साबित किया ।
युद्ध लड़ी भीतर  - बाहर ,
सन्तुलन स्थापित किया ।
अपने हक की खातिर ,
पीड़ा उसने क्या - क्या न सहा ।।
व्रती , तपस्वी , साधुजन ,
करते नव - कन्या का पूजन ।
माँ की कोख में ही कर देते ,
कन्या - भ्रूण का विसर्जन ।
कुदृष्टि से अपनी करते रोज ,
स्त्री का चीर हरण !अहा ।।
अपने - आप को भूलकर ,
हमेशा दूसरों के लिए जिया ।
परम्परावादी  हो या आधुनिका ,
कर्तव्य अपना पूरा किया ।
सुख की गगरी भरते - भरते ,
मन तो उसका  रीत रहा ।।
जीवन यूँ ही बीत रहा ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़





Wednesday, 4 March 2020

जीवन में संगीत

जीवन में संगीत के मायने

जिस प्रकार शरीर बिना प्राण के व्यर्थ  है , उसी प्रकार संगीत के बिना जीवन  अधूरा है । संगीत के बिना जिंदगी बेरंग हो जायेगी । एक थकाहारा इंसान जब घर आकर संगीत के आगोश में खो जाता है तो अपनी थकान , तनाव , चिंता सब भूल जाता है । संगीत हमें जीने के लिए ऊर्जा प्रदान करता है । जीने का उत्साह और उमंग जगाता है । संगीत में इतनी ताकत है कि बेजान शरीर में जान फूंक  दे इसलिए बहुत सी बीमारियों के इलाज के लिए मधुर संगीत भरा वातावरण बनाया जाता है ।  आँखें बंद कर कुछ पल  संगीत सुनकर  बोझिल दिमाग को शांति मिल जाती है , परीक्षार्थी के सिर से परीक्षा का तनाव चला जाता है । मुश्किलों भरी सुनसान राहों का सफर संगीत के संग आसान हो जाता है  । ध्यान लगाने के लिए भी संगीत एक बड़ा व महत्वपूर्ण माध्यम है । संगीत में सम्मोहन का गुण होता है जो  इंसान को अपना वर्तमान भुला देता है । इंसान तो इंसान यह जानवरों को भी अपने वश में कर लेता है । उत्सवों , पर्वों , त्योहारों का रंग संगीत के बिना फीका है । भारतीय संस्कृति में संगीत रचा - बसा है । खेतों में काम करते स्त्री पुरूष जब लोकगीतों की तान छेड़ते हैं तो  प्रकृति भी पुलकित हो उठती है   , परम्पराओ  और पर्वों के लोक संगीत सबके मन को तरंगित कर देते हैं । हाथों में रंग - अबीर लिए हुरियारे जब नगाड़े पर थाप लगाते हैं तो पैर थिरक उठते हैं और दिलों की धड़कन तेज हो जाती है । ढोलक की मधुर पुकार दुल्हन के कपोलों पर  लाज की गुलाल फैला जाती है तो युवा दिलों में सुखद भविष्य की उमंगें छलका जाती हैं । प्रत्येक प्रान्त की अपनी संस्कृति और विशेष संगीत व परम्पराएं हैं ,भारत विविधताओं का देश है । इसके कोने - कोने में  मधुर संगीत लहरियों की कई दास्तानें हैं जो इसे विशिष्ट और अन्य देशों से भिन्न बनाता है ।  सबके अपने साज और आवाज हैं , इतिहास के  धरोहर  , घराने हैं । संगीत मनुष्य के व्यक्तित्व की चरम अभिव्यक्ति है , सुकूनभरी साँस है और जीवन में खुशियों की रंगीन फुहार है । आइये जिंदगी के मधुर संगीत में सराबोर हो जायें ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे 
दुर्ग , छत्तीसगढ़

वो गर्माहट ( संस्मरण )

   बचपन के बीतने के बाद ही उसकी अहमियत समझ आती है । उन दिनों माता - पिता के प्यार की ठंडी छाँव में दिन कैसे बीतते हैं पता ही नहीं चलता । हँसते - खेलते , पढ़ते वक्त गुजर जाता है और बचपन की मौज - मस्ती रेत की मानिंद मुट्ठी से फिसल जाती  है । दो भाईयों के बीच की अकेली बहन होने के कारण मुझ पर मम्मी - पापा का विशेष स्नेह था । विशेषकर पापा की मैं लाडली थी , उनकी और मेरी जुगलबन्दी अच्छी जमती थी  । वे कहते - " रे मिनी "। मैं उन्हें उत्तर देती - "रे पापा " जिस सुर में वे बोलते मैं उन्हें वैसे ही उत्तर देती । लाड़ में पापा मुझे कई नामों से पुकारते -  गुड्डी ,मिनी , मुनी , कुनी मुनि आदि । पापा बहुत सुबह उठ जाते थे और योग करते रहते । जब हम छत पर सोते तो सुबह थोड़ी ठंड हो जाती । पापा उठने के बाद अपनी चादर मुझे ओढ़ा देते , यह गर्माहट मुझे बहुत प्यारी लगती । कई बार मैं नींद खुलने पर भी पापा के चादर की गर्माहट के लिए आँख बंद किये पड़ी रहती । उनके स्नेह रूपी चादर की उत्तराधिकारी मैं हूँ , यह बात मुझे गौरवान्वित कर जाती । अपने भाईयों से झगड़ने पर यह मेरा सुरक्षा कवच भी होता कि पापा मुझे ज्यादा प्यार करते हैं ।                          छः बजे पापा जबरन मुझे उठाकर पैर से पकड़ कर उल्टा कर देते और सीधे बाथरूम के पास ले जाकर छोड़ते  । मैं कुनमुना कर उठती पर इसी वजह से मुझे जल्दी उठने की आदत पड़ गई । जल्दी उठकर , नहाकर पहले योग करने की प्रवृत्ति उनके कारण बनी । भाई लोग भले उनकी बात टाल जाते पर मैंने उन्हें कभी मना नहीं किया । उन्होंने मुझे जब भी , जो भी जिम्मेदारी सौंपी , मैंने पूरे मनोयोग से वह कार्य पूर्ण किया । पापा अक्सर लोगों के सामने मेरे गुणों की तारीफ किया करते , हर छोटी बात के लिए उनकी प्रशंसा मेरे लिए प्रेरणा बनती और मैं उनकी नजर में अधिक अच्छा बनने के लिए प्रयास करती । मेरे रचनात्मक लेखन की शुरुआत भी उन्हीं की प्रेरणा से हुई । उन्होंने मुझे चाचा , दीदी , मामा इत्यादि विभिन्न रिश्तेदारों को पत्र लिखने के लिए प्रोत्साहित किया । तब मैं मिडिल स्कूल में थी , उस उम्र में मेरी लेखन शैली की सभी रिश्तेदार खूब तारीफ किया करते । सभी का प्रोत्साहन पाकर हमेशा लिखते रहने का अभ्यास बढ़ा ।                       पापा जी के कहने पर मैंने आकाशवाणी रायपुर और विभिन्न समाचार पत्रों में अपनी रचनाएं भेजना प्रारंभ किया  और इस प्रकार मेरा साहित्यिक जीवन प्रारंभ हुआ । अच्छी किताबें पढ़ने के लिए उनकी प्रेरणा ने मेरा जीवन बदल दिया क्योंकि स्वाध्याय की प्रवृत्ति हमें एक नई दुनिया का दीदार कराती है । जानकारी का भंडार हमारे सामने खुल जाता है , जीवन की बहुत सी समस्याएं भी सुलझ जाती हैं क्योंकि किताबें अकेलेपन की सबसे खूबसूरत व विश्वसनीय साथी होती हैं । कई बुराईयों की तरफ हमारा ध्यान नहीं जाता और हम एक स्वस्थ मानसिकता के स्वामी बनते हैं ।  पिता के विचार , मानसिकता , संस्कार बच्चों को वसीयत में मिलते हैं । अनजाने ही कब उनकी आदतों , बातों को बच्चे अपना लेते हैं पता ही नहीं चलता इसलिए पिता की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।
सुव्यवस्थित रहने की आदत मैंने अपने पिता से अनायास ही पाई है । उनका लाड़ - दुलार  वायुमण्डल के ओजोन परत की तरह है जो हानिकारक विकिरणों से हमारी सुरक्षा करता है । वो स्नेह भरी गर्माहट मेरी स्मृति पटल पर  हमेशा बनी रहेगी उम्र भर । शुक्रिया पापा 🙏🙏

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Tuesday, 3 March 2020

फाल्गुन

कूक उठी कोयल ,
भृमर गुनगुनाया ।
टेसू की गंध घुली पवन में ,
आम भी बौराया ।
फाल्गुन मास आया ।।

नगाड़े की थाप ने ,
मन को गुदगुदाया ।
होलिका - दहन की तैयारी ,
मस्ती का आलम छाया ।
फाल्गुन मास आया ।।

बिखरे रंग खुशी के ,
अबीर ने चेहरों को रँगाया ।
पुलकित , उमंगित प्रकृति ने ,
फूलों का सेज बिछाया ।
फाल्गुन मास आया ।।

ढोल - नगाड़ों के संग ,
रंग - गुलाल बरसाया ।
फ़ाग की मस्ती में सब झूमे - नाचे ,
प्यार के रंगों ने दिलों को मिलाया ।।
फाल्गुन मास आया ।।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़