Thursday, 23 February 2017

शिकवे

वक्त के बदलने का गम क्यों करते हो,
इस दुनिया में  हमने इंसान बदलते देखा है।
बेगानों से अब शिकायत कैसी,
मुसीबत में अपनों को अंजान बनते देखा है।
आबाद रहने की चाह नहीं मन में,
कई बसे घरों को श्मशान बनते देखा है।
पतझड़ से शिकवा क्या करें हम,
बहारों भरे गुलिस्तां को वीरान होते देखा है।
उनसे क्या उम्मीद रखें हम,
अपनी ही तबाही पर जिन्हें हैरान होते देखा है।
जाने कब क्या हो किसे खबर,
कभी मौत तो कभी जन्म पर परेशान होते देखा है।
न्याय पाने की उम्मीद क्यों करें,
चंद टुकड़ों की खातिर ईमान बेचते देखा है।।
लाचारों से सहारा क्या मांगें,
दर्द में भी न पिघलें ,लोगों को ऐसा चट्टान बनते देखा है।
वक्त के बदलने का गम क्यों करते हो,
इस दुनिया में हमने इंसान बदलते देखा है।।
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Written by-डॉ. दीक्षा चौबे

Tuesday, 21 February 2017

रे मन

रे मन !मत हो तू उदास ।
क्या हुआ?गर मिली न मंजिल,
आगे बढ़ना हुआ मुश्किल ,
राहें तो है तेरे पास ।।
रे मन! मत हो तू उदास।।
धरती में पड़ी दरारें ,
सूखे जल-स्त्रोत सारे,
पर क्यों तू हिम्मत हारे,
सावन की तो है आस ।।
रे मन ! मत हो तू उदास ।।

बहुत भटका तू अँधेरे में,
फँसा अवसादों के घेरे में,
सूरज  कल निकलेगा ही,
तम को हर लेगा उजास।।
रे मन ! मत हो तू उदास।।

तूफानों का मंजर है,
घेरे में लेता बवंडर है,
नाव फंसी है भँवर में,
पार उतरेगा,रख विश्वास ।।
रे मन ! मत हो तू उदास।।

दुनिया के शब्द भयंकर हैं,
दिल में चुभोते नश्तर हैं,
अपने ही घोंपते खंजर हैं,
दरिया में ढूंढ तू मिठास ।।
रे मन ! मत हो तू उदास ।।

राह भले हों पथरीले ,
काँटों में ही फूल खिले ,
निरन्तर चलता चल ,
सुख-दुख आएंगे साथ ।।
रे मन ! मत हो तू उदास ।।

गिरना है, सम्भलना है,
तुमको कहीं न रुकना है ,
चुनौतियां स्वीकार करे ,
इन्सान है तू वो खास ।।
रे मन ! मत हो तू उदास ।।
     डॉ. दीक्षा चौबे                     

Wednesday, 18 January 2017

छत्तीसगढ़ के माटी

ए छत्तीसगढ़ के माटी ए....।
पावन, मनभावन तोर अंगना ,
चित्रकूट,तीरथगढ़ तोर गहना ।
धन-धान्य भरे तोर कोरा म,
कोयला,लोहा के का कहना ।
ए जीवन-मरन  के साथी ए ।
ए छत्तीसगढ़ के माटी ए...।।
तोर पुरवइया चन्दन के खुशबू,
पानी तोर गंगाजल हे।
पबरित होगेन सब मइनखे ,
शिवनाथ,महानदी छलाछल हे।
एमन हमर जोत के बाती ए।।
ए छत्तीसगढ़ के माटी ए....।।
सोनाखान के वीरनारायण,
इही माटी मा जनमिस ।
गेंदसिंह,हनुमान वीर ह,
बिद्रोह के बिगुल बजाइस ।
अंग रेज के फाटिस छाती रे ।।
ए छत्तीसगढ़ के माटी ए...।।
नशामुक्ति अउ सत के पंथ ला,
बाबा घासीदास देखाइस।
छुआछूत अउ भेदभाव ल,
सुंदरलाल मिटाइस।
इही मन हमर थाती ए ।।
ए छत्तीसगढ़ के माटी ए....।।
डोंगरगढ़ म बिराजे बम्लेश्वरी मैया,
रतनपुर म महामाया हे ।
दंतेवाड़ा म दंतेश्वरी माता,
झलमला के गंगा मैया हे।
दामाखेड़ा कबीर के साखी ए ।।
ए छत्तीसगढ़ के माटी ए....।
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़
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Monday, 2 January 2017

नव पल्लव

शाखों पर फूटे नव पल्लव ,
कलियों  से खिले किसलय ,
आसमान में उड़ते परिंदे ,
कतारों में लग कर रहे सजदे ,
भवरों ने लो छेड़ा तान ,
कोयल की कूक ले लेती जान ,
सबके बदले अंदाज हैं ,
परिवर्तन के ये राज हैं ,
कही भीगी लकड़ी ,कही जलता अलाव है
इनका करें स्वागत यही बदलाव है  ,
स्वीकार करें जो अपने हिस्से आया ,
सच है वो  जो हमने पाया ,,
ख़ुशी अंतर्मन में  पैठी है  ,
क्या हुआ जो थोड़ी रुठी है ,
हर हाल में इसे मनाना है ,
विपरीत परिस्थिति में भी ढूढ़ लाना है ।।
नव वर्ष की शुभकामनाएं

Saturday, 26 November 2016

फिर भी

मालूम है टूटकर गिर जाएँगी ,
फिर भी कलियों को खिलने का
इन्तेजार होता है .......।
मालूम है गिरकर बिखर जायेंगे,
फिर भी काँच को ढलने का
इन्तेजार होता है .…...।
मालूम है वाष्प बन के उड़ जायेंगे
फिर भी बादल को बरसने का
इन्तेजार होता है...... ।
मालूम है शाम को डूब जाना है
फिर भी सूरज को निकलने का
इन्तेजार होता है.…... ।
मालूम है प्रभात आने पर छुप जाना है
फिर भी चाँद को उगने का
इन्तेजार होता है...... ।
मालूम है वक्त को ढल जाना है
फिर भी मुट्ठी में बाँधने का
प्रयास रहता है......।
मालूम है कल को बिछड़ जाना है
फिर भी  सनम से मिलने का
इन्तेजार होता है....।
मालूम है पतझड़ को आना है
फिर भी वृक्ष पत्तियों से
गुलजार होता है…....।
मालूम है मिट्टी में मिल जाना है
फिर भी मनुज को इतना
अहंकार होता है.....।
मालूम है एक दिन मौत आनी है
फिर भी जिन्दगी के आने का
इन्तेजार रहता है.....।।

Wednesday, 23 November 2016

सयानी बेटी

बेटी मेरी सयानी हो गई ...
दूध की धुली, चुलबुली सी
मिश्री की डली,महकी कली सी ,
वो  प्यारी ,नन्ही सी बच्ची 
बातों में सबकी नानी हो गई ।
कभी मुस्कुराती,कभी मुँह फुलाती
भाई से अपने को श्रेष्ठ बताती ,
गुड़िया,खिलौने,पकड़ा -पकड़ी ,
बचपन की बातें कहानी हो गई  ।
घर को सहेजती,सवारती
मुझे दुनिया की बाते समझाती
सही-गलत का हिसाब लगाती ,
उसकी  जवा होती नजरों में ,
अब मेरी कई बातें बचकानी हो गई ।
कहती है माँ -पापा के संग रहूँगी ,
जीवन भर उनकी सेवा करुँगी ,
बेटे होते है कुल का गौरव ,
बेटियां होती हैं पराई ,
ये सब बातें अब पुरानी हो गई ।।
बेटी मेरी अब सयानी हो गई ।
जाड़े की धूप सुहानी हो गई ।।

स्वरचित -- डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़ 😄

Tuesday, 22 November 2016

क्यो ?

दुआएं बेअसर हो रही हैं शायद
दे रहा कोई दर्द मेरा अपना ही ।
कह रही है हवा आकर कुछ कानो में
अनसुनी कर रहा कोई भीतर ही ।
सचेत कर रहे  हैं भटकते रास्ते
बहकने  लगे कदम फिर भी ।
अनजान लोग क्यों मिलने लगे हैं रोज
अपने तो चुराने लगे नज़र भी ।
सूख गये रस सारे ख्वाहिशो के
किये गए बेकदर क्योंकि ।
एहसास चलने लगे साथ -साथ
तन्हा न रहे सफ़र यूँ ही ।
मुकद्दर ने न जाने क्या लिखा है
अब करने लगे फिकर हम भी ।
दिल ने माना जबसे तेरा फ़ैसला
अपने से लगने लगे हैं सितम भी ।
भरने लगे हैं जख्म ए जिगर
वक्त ने लगा दिया मरहम वो ही ।।