Sunday, 11 June 2017

कैसे कैसे लोग

2o11 की जनगणना में मेरी ड्यूटी  लगी थी । लगभग तीन सौ घरों की जनगणना करनी थी,  सभी वर्ग के लोग इस वार्ड में थे ।विभिन्न बिंदुओं पर जानकारी लेनी थी ।मध्यमवर्गीय घरों में मुझे पूरा सहयोग मिला , साथ ही उन्होंने चाय - पानी के लिये भी पूछा । जिनके घर जितने बड़े थे , वे  व्यवहार में उतने ही संकीर्ण लगे ।
उन्होंने अपने ड्राइंगरूम में बिठाना भी उचित नही समझा ।घर के बाहर प्लास्टिक की कुर्सी में बैठकर
मुझे फॉर्म भरने पड़े ।जो जितने निम्नवर्ग के थे , वे
अपने घर की सबसे अच्छी कुर्सी मेरे लिये निकालते ,
चादर को झाड़ते , ठीक करते ।उ नका व्यवहार देख
कर मेरा मन प्रसन्न हो उठा । कुछ लोग सब कुछ
होते हुए भी गरीब होते है और कुछ लोग कुछ न होते
हुए भी दिल के अमीर होते हैं । अपना धन कोई किसी
को नही देता लेकिन  अच्छा व्यवहार करके हम सामने
वाले के दिल में अपनी जगह बना लेते हैं ।
       कई बार हम सामने वाले की हैसियत देखकर व्यवहार करते हैं । अगर किसी बड़े घर की शादी है , तो अरे अच्छा उपहार देना पड़ेगा । उनके लायक उपहार नही देंगे तो वो क्या कहेंगे । किसी गरीब के घर शादी हो तो कुछ भी दे दो, ऐसी सोच रखते हैं जबकि अधिक की आवश्यकता उन्हें ही है । जिसके पास कुछ नही है , वह हमारे उपहार की अधिक कद्र करेगा । जिसके पास सब कुछ है , उसे  जितना भी देंगे , कम ही लगेगा ।थोड़ी सी अपनी सोच को विस्तृत करने की आवश्यकता है ,थोड़ा सा प्रयास किसी के लिये कर देने से वह जीवन भर याद रखता है ।
           जरूरत पड़ने पर किसी की मदद कर देने से वह जीवन भर एहसान मानता है ।
     मेरे पिता जी अक्सर लोगो को विवाह योग्य वर - वधु के बारे में बताते रहते थे क्योंकि उनकी बहुत जान -
पहचान थी । वे हमारे घर आते रहते और बाकायदा दो - चार दिन रुकते भी थे । मैं बहुत नाराज होती क्योंकि
मेरी पढाई का नुकसान होता था । उन्हें खाना परोसना ,
पानी देना इत्यादि मेरा ही काम था ।माँ के तो वे जेठ ,
चाचा ससुर  इत्यादि रिश्ते में आते थे ।उस समय पापा
मुझे समझाते थे कि विवाह लगाना पुण्य का काम है ,
वैसे भी जो होना है वो तो होगा ही , हम तो मात्र एक
माध्यम हैं । लोगों की दुआएं लेते रहना चाहिये , न जाने
हमें कब उनकी आवश्यकता पड़ जाये ।
    हमारे घर आने वाला कौन सा व्यक्ति कितना महत्वपूर्ण है , ये जाने बिना सबके साथ सही व्यवहार करें । कुछ लोग प्रभावशाली , उच्च पद पर आसीन लोगों के साथ ही सम्बन्ध रखना पसंद करते हैं । इनके
दिखावे भरे व्यवहार से सभी परिचित रहते हैं और बिना
बताए समझ जाते हैं कि ये व्यक्ति काम पड़ने पर ही बात करता है । ऐसे लोगों को कोई  पसन्द नहीं करता ।
हमारे पास सब कुछ है लेकिन  हमारे सुख - दुख में
शामिल होने वाले अपने नहीं हैं तो सब कुछ बेकार है ।
कुछ लोगों के पास धन , मान , सम्मान नहीं होता पर
उनके चाहनेवाले बहुत होते हैं । दूसरों के लिये करने वाले नाम कमाकर इस दुनिया में अपनी छाप छोड़ जाते हैं ।कितने अमीर आये और धन के भंडार लेकर गुमनाम जिये और गुमनाम मरे  ।पैसे वालों की भीड़ बढ़ती जा
रही है  और दिल संकुचित होते जा रहे हैं ।काश वो
अपने धन का सही उपयोग जरूरतमन्दों की मदद में
कर पाते  और अपना नाम अमर कर जाते ।

स्वरचित - डॉ . दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़
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Saturday, 10 June 2017

ओ मेरे हमसफ़र

ओ मेरे हमसफ़र ....
मेरे पास शब्द नहीं ,
भावनाओं के कुछ फूल हैं ,
समर्पण के लिये ....
तुमने दिया आकार ,
मेरे बिखरते सपनों को ,
उन्हें सजाया ,सँवारा ,
प्यार के रंगों से ....
जब मद्धिम हुई रोशनी,
थरथराई दीये की लौ ,
पस्त हुई तूफानी हवा भी ,
तुम्हारी गर्म हथेलियों के घेरे से ...
जीवन के मुश्किल क्षणों में ,
तुमने हाथ थामा ,हौसला बढ़ाया ,
जीता हर गम को ,
तुम्हारे प्यार भरे साथ से ....
तुमसे है मेरी दुनिया ,
तुम ही जीवन के आधार ,
यह जीवन , ये प्यार मेरा ,
है सिर्फ तुम्हारे लिए ...
जब - जब हटूँ कर्तव्यपथ से ,
सही राह दिखाना तुम ,
ओ प्रियतम , ओ हमदम मेरे ,
जीवन भर साथ निभाना तुम ....

स्वरचित -
डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़
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आपकी बाहों में

मेरा सपना हुआ साकार ,
भूल गई बाबुल का प्यार ,
सिमट गया मेरा संसार ,
आपकी बाहों में.....।
सारे बन्धन तोड़ कर ,
जीवन के हर मोड़ पर ,
पाया मैंने प्यार ही प्यार ,
आपकी बाहों में .....।
दर्द के लगे पहरे ,
छाये जब गम के कोहरे ,
पाया स्वच्छ बृहद आकाश ,
आपकी बाहों में .....।
सम्पूर्ण हुआ जीवन ,
महक उठा तन - मन ,
आई एक नई  बहार ,
आपकी बाहों में .....।
पुलकित हुआ यौवन ,
प्रेम रस भीगा आँगन ,
कर लिया अनूठा श्रृंगार ,
आपकी बाहों में .....।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़
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सफ़र में

मुश्किल हों हालात ,
भाव भरे जज़्बात ,
कुछ न हो अपने हाथ ,
बहता चल , जीवन के लहर संग बहता चल ।
उलझे लम्हों को काटता,
सूझे न कोई रास्ता ,
मिला न कोई साथ ,
चलता चल ,जीवन की डगर मे चलता चल।
अंधेरे घनघोर बड़े ,
बाधाएं  राहों में खड़े ,
उम्मीदों के दीप जला ,
जलता चल , राहों को रोशन करता चल ।
अपनों का साथ ले,
दुःखो  को बाँट ले ,
हौसलों की बाँह थाम ,
सम्भलता चल ,औरों को सहारा देता चल ।
मन के हारे हार है ,
मन के जीते जीत ,
मन को ऐसा साध ले ,
फूटे विजय -संगीत , गाता चल ,गुनगुनाता चल ।
डूबकर समंदर में ,
मोती ढूंढ निकाल ,
उदासी के भँवर से ,
बाहर निकल ,मुस्कुराता चल ,हँसाता चल ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे ,दुर्ग , छत्तीसगढ़
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Thursday, 8 June 2017

आलेख- ***क्योंकि टूट कर पत्ते हरे नहीं होते

      समाज की धुरी होता है परिवार और परिवार का
केन्द्र होती है महिला । परिवार में रिश्तों की डोर को
मजबूत बनाये रखने में घर की स्त्रियों की विशेष भूमिका होती है , यदि  वह  लापरवाह हो जाये तो
परिवार को  बिखरते देर नहीं लगती । रिश्तों को जोड़ने
वाला प्रेम का धागा बड़ा नाजुक होता है । जरा सी
असावधानी से इसे टूटते देर नहीं लगती , यानी सावधानी हटी , दुर्घटना घटी । अर्थात सामाजिक
संरचना में रिश्तों का महत्वपूर्ण स्थान है । प्रेम के महीन
रेशों से बुने ये रिश्ते अत्यंत नाजुक होते हैं । भाई , बहन ,दोस्त , पति- पत्नी , चाचा , मां इत्यादि रिश्तों
का रुप चाहे जो भी हो , ये सभी विश्वास , आदर ,ईमानदारी एवं समर्पण की मांग करते हैं ।
रिश्तों की इस बेल को स्नेह , त्याग  एवं विश्वास के
जल से सींचना अनिवार्य है , नहीं तो  यह असमय
ही मुरझा जाती है ।
          कई बार वर्षों के प्रेम संबंध छोटी -छोटी बातों,
गलतफहमियों या अफवाहों के कारण टूट जाते हैं ।
बहुत ही सोच - समझ कर , सही - गलत का परीक्षण
कर संबंध तोड़ना चाहिये क्योंकि एक बार सम्बन्ध
खराब हो गए तो फिर वह मिठास वापस नहीं आती ।
कवि रहीम ने इसी बात पर कहा है -
  "  रहिमन धागा प्रेम का , मत तोड़ो चटकाय ।
    टूटे से फिर ना जुरे ,जुरै गाँठ पड़ जाय ।।"
          प्रेम के तारों में गुँथे रिश्तों को बहुत ही सहेजकर
रखना चाहिये , उतावलापन इन सम्बन्धों के लिए  घातक है । कुछ बिंदुओं पर गौर करें -
   मर्यादित हो व्यवहार -
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         विनीत और नीलेश बहुत अच्छे दोस्त थे । बातों
ही बातों में एक बार विनीत ने नीलेश के परिवार के
सम्बन्ध में अमर्यादित टिप्पणी कर दी , जिससे वह
आहत हो गया और उसने विनीत से मिलना , बात
करना बंद कर दिया ।
        प्रगाढ़ सम्बन्धों में खुलापन और बेतकल्लुफ
होना गलत नहीं है , लेकिन वह मर्यादा की सीमा में
होना चाहिये । बड़ों का आदर ,  स्त्रियों की निजता
में खलल नहीं पड़नी चाहिये । मजाक में भी किसी
की भावना आहत न हो , इसका हमें ख्याल रखना
चाहिये ।
एक -  दूसरे  की भावना का आदर करना -
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        कोई बात हमें अच्छी लगती है , जरूरी नहीं
कि वह सभी को अच्छी लगे । दूसरों के विचारों ,
भावनाओं का आदर करके हम उनके दिल में जगह
बना सकते हैं  और अपने सम्बन्धों को मजबूत
आधार प्रदान कर सकते हैं ।
  सहयोग की भावना -
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      सम्बन्धों के मायाजाल में कई तरह के लोग होते
हैं । रिश्तों की कसौटी तो विपरीत परिस्थितियों में ही
होती है । खुशियों में साथ देने वालों की कमी नहीं रहती
लेकिन दुःख में हमारा साथ दे , वही सच्चा दोस्त/सम्बन्धी होता है । सहयोग की भावना किसी भी रिश्ते
को प्रगाढ़ता में बदल देती है ।
  चुगलखोरों से बचें -
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    निशा  , यामिनी और रीना तीनों की खूब जमती थी ।
एक बार रीना ने गुस्से में निशा के समक्ष यामिनी के
बारे में कुछ गलत कह दिया । बाद में उसे अपने कथन
पर पछतावा हुआ लेकिन तब तक निशा यामिनी को
वह बात बता  चुकी थी । इस कारण रीना और यामिनी
के सम्बन्धों में दरार उत्पन्न हो गई । कुछ लोग इधर की
बातों को उधर करके लोगों के बीच गलतफहमियां पैदा
करते हैं । ऐसे लोगों को नजरअंदाज करना चाहिए  क्योंकि आवेश में व्यक्ति भले ही कुछ बोल दे , पर मन
शांत होने पर उसे अपनी गलती पर पछतावा होता है।
   सहना भी सीखें -
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      प्रेमपूर्ण सम्बन्धों में दोनों पक्षों को कुछ समझौते
करने पड़ते हैं । एक - दूसरे की अपेक्षाओं को पूरा
करना पड़ता है । सिर्फ अपना लाभ देखना रिश्तों के
बीच तनाव उत्पन्न कर सकता है । सीमा ,घर की
व्यवस्था न बिगड़े ,यह सोचकर अक्सर अपने घर पर
कोई भी कार्यक्रम करने में  टाल - मटोल करती रहती
थी , लेकिन उसके इस स्वभाव ने उसे दोस्तों , रिश्तेदारों
से दूर कर दिया ।
   जुलाहा जब कपड़ा बुनता है , उसके ताने - बाने में
हमें कोई गिरह या गांठ महसूस नही होती । जबकि
उसने कितने धागे जोडे होते हैं , हम रिश्तों का ऐसा
ताना - बाना क्यों नहीं बुन सकते जिसमें कोई गांठ न
हो । हमारे सम्बन्धों के ताने - बाने गाँठरहित होंगे तो
अधिक मधुर  , चिरस्थायी एवं आनंददायक रहेंगे ।
     प्रेम के धागों से बंधे इन रिश्तों को चाहिए - थोड़ी
सी देखभाल और विश्वास , फिर इनके टूटने का कभी
भय नहीं होगा । सम्बन्धों को आसानी से न टूटने  दें ,
इनका उचित उपचार करें , भरसक प्रयास करें उन्हें
चिरस्थायी बनाए रखने का । कहा भी गया है -
" सोचकर कोई ताल्लुक तोड़ना ,
  क्योंकि टूटकर पत्ते हरे नहीं होते ।"

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़
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Monday, 5 June 2017

* मत फाड़ो हरियाली की चादर *

नम आँखों से देख रही थी मैं ,
स्कूल प्राँगण के सामने कटता हुआ ..
वह विशाल आम का पेड़  ...
या टूटते  हुए कई परिवार  ।
उसकी गिरती शाखाएँ ,
कर रही थीं चीत्कार ।
जैसे माँ से बिछड़ा बच्चा ,
रो रहा हो जार - जार ।
रह - रह कर गिरते पत्ते ,
रोते और बिलखते ।
मुँह छुपा कर धरती में ,
ढूंढ रहे आधार ।
टूटा वह चिड़िया का घोंसला ,
गिरे कुछ अंडे , दो बच्चे ।
माँ गई होगी लाने दाना ,
यहाँ खाक हुआ आशियाना ।
नहीं आयेंगे कौए , तोते ,
अब न होगी छाँव की ठंडक ।
नहीं हो पाएगी अब यहाँ ,
चिड़ियों की भी बैठक ।
थके - हारे पथिक ,
ढूंढेंगे एक अदद छाँव भी ।
भौतिकता की अंधी दौड़ से ,
अछूते न रहे गाँव भी ।
कटते जा रहे पेड़ निरन्तर ,
बढ़ रहा आबादी का कहर ।
फैलता जा रहा सर्वत्र ,
गन्दगी व धुंए का जहर ।
कृत्रिमता ओढ़ने के लिए ,
मत फाड़ो हरियाली की चादर ,
नहीं तो पछताओगे ।
प्राप्त कर ली सारी सुविधाएं ,
गाड़ी , कपड़े ,घर....
खड़े कर लिए बड़े - बड़े कारखाने..
लेकिन ...
साँस लेने किधर जाओगे ।
     ---/---
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

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Thursday, 1 June 2017

गुमनाम सी मोहब्बत

गुमनाम सी मोहब्बत पर ,
अंधेरों का साया है ।
ख्वाहिशों की कब्र को ,
आँसुओं  से सजाया है ।
न रसमें  हैं , न कसमें हैं ,
न रिश्तों का बन्धन है ।
अनकही बातों को,
लबों पे ठहराया है ।
न बातें हैं , न वादे हैं ,
न शिकवे हैं , न  शिकायतें ,
बस नजरों ने मिलकर,
एक अफ़साना बनाया है ।
थोड़ी सी फिक्र है,
एक - दूजे का थोड़ा ख्याल है ।
खामोश  सरगोशियों  ने ,
अपनापन बढ़ाया है ।
न जिस्मों की चाह है ,
न स्पर्श का आकर्षण ।
न जाने किस बन्धन ने ,
दो रूहों को एक बनाया है।
मासूम  सा रिश्ता है,
एहसासो का खुशनुमा दर्पण है।
न लेना है , न देना है ,
बस भावनाओं का समर्पण है।
न जाने किस मिट्टी से खुदा ने ,
प्रेमियों  का  दिल  बनाया है ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़
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