Saturday, 17 March 2018

थोथा चना बाजे घना ( लघु कथा )

        अरुणिमा की कॉलोनी में दो  नये परिवार  शिफ्ट हुए थे । नये वर्ष की पार्टी में परिचय हुआ था उनसे ..
निमिषा बहुत ही चंचल और बातूनी थी , जल्दी ही सबसे घुलमिल गई ...एक दो मुलाकात में ही सबको अपने रुतबे , ऊँचे खानदान के किस्से  , धन - सम्पत्ति के ब्यौरे दे डाली । उसकी साड़ियों , आभूषणों  का कलेक्शन  चर्चा का विषय बन गया था ...परन्तु दूसरी
रीमा शांत स्वभाव की  पर आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी थी । उसने कभी अपने बारे में कुछ विशेष नहीं
कहा..कभी - कभार मिलने पर सामान्य बातें ही होती
वह अपने घर और नौकरी में व्यस्त रहती । उसमें 
कॉलोनी की औरतों को प्रभावित करने वाली कोई बात नहीं थी ।
     कुछ  समय बाद अरुणिमा की सास को दिल का दौरा पड़ा तो रीमा ने उसकी बहुत मदद की ..अपनी व्यस्त दिनचर्या के बावजूद उसका साथ दिया तथा जब वह अस्पताल में रही तो बच्चों के खाने की व्यवस्था भी
की ....जबकि बड़े बोल बोलने वाली निमिषा कहीं नहीं थी ।  विपरीत परिस्थितियाँ ही हमें व्यक्ति की सही पहचान कराती हैं .. अच्छे लोग अपने बारे में नहीं बोलते ,उनके काम बोलते हैं... अरुणिमा सोच रही थी...इसीलिए कहा गया है थोथा चना बाजे घना ।

  स्वरचित  -- डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़
       

Tuesday, 6 March 2018

जवाब दो ना

क्यों मार देते हो मुझे ,
कोख के भीतर ही...
दुनिया में क्या नहीं है ,
मेरे लिए एक कोना...
जवाब दो ना...।

क्या है अपराध मेरा ,
कुचल देते हो मेरा बचपन...
कुछ पाने से पहले ही ,
पड़ता है मुझको  खोना....
जवाब दो ना....।

अल्हड़ सा मेरा यौवन ,
अभी ही देखा था एक सपना...
पा न सका पागल प्रेमी ,
रूप - रंग मेरा क्यों छीना.....
जवाब दो ना....।

अग्नि के समक्ष लिए थे फेरे ,
किया था तुमने वादा...
क्यों भूल गये उन्हें तुम ,
घूँट जुदाई का पड़ा पीना....
जवाब दो ना....।

सींचा था अपने लहू से ,
ममता  से तुझको पाला...
माता को क्यों तू भूला ,
बातों से छलनी किया मेरा सीना...
जवाब दो ना...।

उंगली थामकर  तेरी ,
चलना मैंने सिखाया...
आज कदम मेरे लड़खड़ाये ,
पर साथ खड़ा तू कहीं ना...
जवाब दो ना....।।

स्वरचित  -- डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

मया दया ( लघुकथा )

थोरकिन घुचबे का बेटा..बस म चढ़ के एक झिन डोकरी दाई ह सीट म बइठे टुरा ल किहिस । ओ हा मुंह ल इति ओती करे लागिस फेर ओला जगहा नइ दिस..बपुरी दाई हर  ..सियान  सरीर , तेमा जर ले उठे राहय खड़े नई होय सकिस ..सीट के बीच म भुइया म बइठ गे । दुसर गांव म बस ह रुकिस त अब्बड़ खबसूरत मोटियारी टूरी हर चढिस... ए ददा , दु तीन झन टुरा मन खड़े होगे.. तै एमेर बइठ जा किहि के । डोकरी दाई ल अब्बड़ रिस लागिस..बखानहु कहिते रिहिस के ..ओ नोनी हर ओखर हाथ ल धर के ओला उठाइस अउ एक ठन सीट म बइठार दिस । जुग - जुग जी नोनी ...कइके अब्बड़ असीस दिस ओला अउ  ओ
टुरा  कती निहार के किहिस  , एखरे आय के अगोरा म
बइठे रहे का बाबू .. डोकरी  बर तोर मन म मया दया न इ आइस ...मया दया ह तको आदमी देख देख के आथे ...छोकरी ल देखके आइस ..ले कहिं नइ होय , कोनो ल होय  अपन सीट ल त देय ...तहूं जियत रही बेटा ...ओ टुरा हर  लाज के मारे   अपन  आँखि ल नई उठाय सकिस ।

स्वरचित -- डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

प्राइस टैग ( लघुकथा )

शर्मा आंटी आज जमीन पर लेटी हुई थी ...लाखों की सम्पत्ति होते हुए भी...महंगे कारपेट्स , नक्काशीदार पलंग ...वास्तुकला की  बेजोड़ कलाकृतियाँ ...जिन पर
वह अभिमान करती रहीं जिंदगी भर ... मृत्यु के बाद इनका क्या मोल  ? इंसान का मोल समझा नहीं कभी उन्होंने ।
   उनसे किसी भी चीज के बारे में बात करने पर उसका अंत उस वस्तु की कीमत पर ही होता था । सस्ती चीजें लेने वालों को बड़ी हिकारत भरी नजरों से देखती थी वो ...और अपनी हर चीज का प्राइस बताना नहीं भूलती थी ।
    अधिकांश लोग कन्नी काटने लगे थे उनसे ...सामने पड़ने से बचते थे ताकि उनके सामने  न पड़कर अपने - आपको अपमानित होने से बचा लें । सब चीजों के प्राइस टैग देखती रहीं ...काश जिंदगी का प्राइस टैग भी देख लेतीं ...। जब कुछ यहीं छोड़कर जाना है तो अहंकार किस बात का । बहुमूल्य जीवन के आगे भौतिक वस्तुओं की क्या कीमत ?

स्वरचित --- डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

Monday, 5 March 2018

आगे हे मड़ई तिहार

आगे  हे मड़ई तिहार

माघी पुन्नी ह आगे ,
दुरिहा होगे मुंधियार ।
सगा मन  जम्मो जुरियागे ,
आगे हे मड़ई तिहार ।
किसिम किसिम के खाई खाबो ,
रहिचुली , झूला के मन्जा उडाबो ।
ओनहा पहिरबो आनी बानी ,
बरा सोंहारी सब्बो ल खवाबो ।
नाचा के घलो परे हे गोहार ।।
आगे हे मड़ई तिहार ।।
घरों घर आहि पहुना ,
फूफू , बहिनी , भाटो हि ,
लीपाय पोताय अंगना  ,
दवारि म चउक पुराही  ।
करहु सबला जोहार ।।
आगे हे मड़ई तिहार ।।
हमन्  हन चिक्कन खवइया ,
जिमीकांदा , इडहर ममहाही ।
ठेठरी खुरमी  खाजा पीडिया ,
बबरा अनरसा दाई बनाही ।
लाई बरी पापड़ अउ अचार ।।
आगे हे मड़ई तिहार ।।

स्वरचित -- डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

Sunday, 4 March 2018

सपने ....ख्वाहिशें

अक्सर गहरी नींद में  ,
मुझे आते हैं मीठे सपने ...
खूबसूरत वादियों में ,
अपने हाथों को पसारे ...
बटोर रही हूँ मैं ,
रुई से हल्के बर्फ के फाहे ..
भिगो रहे हैं मेरे गालों को ,
बादलों के  अनजान साये...
देखती हूँ एक भव्य महल ,
जिसकी नक्काशीदार खिड़कियों से...
झाँकती हूँ मैं सजी - धजी ,
गोटेदार लहंगे में....
मेरे आँगन में उतरे हैं ,
चाँद और सितारे...
रवि की रश्मियाँ ,
दौड़कर घर मेरा बुहारे...
तितलियों ने सजाये हैं ,
दालान और दीवारें...
उपवन ने बिछा दी है ,
फूलों की रंगीन चादरें....
इठलाती  बलखाती नदी ,
चली आती है  किनारे....
साथ - साथ चलने को ,
बाहें खोल पुकारे ...
आसमान तकते हरसिंगार ,
मुझ पर फूल बरसाते...
सौरभ ये भीने से ,
फिजां में घोल मुस्कुराते....
आलिंगन को आतुर धरा ,
मेघ को बाहें खोल बुलाये ....
मिट्टी की सोंधी गन्ध ,
नस - नस में बस जाये ....
सपने नहीं ख्वाहिशें मन की ,
नींदों में जो सताये ..
दिल ने वो महसूस किया ,
जो देख न पाती निगाहें....

स्वरचित --डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

प्रकृति के उपहार

प्रकृति ने दिये कई अनमोल उपहार ,
ताकि जीवन का मूल्य समझ सकें हम ।
खूबसूरत हरी - भरी  वादियों को देख ,
अनुपम  आभा रुचिर बटोर लें हम ।
उषाकाल में पंछियों की कलरव सुन ,
खुशियों  को महसूस करना सीख लें हम ।
खिलखिलाते फूलों  की क्यारियों  से ,
होठों पे मुस्कुराहट संजो लें हम ।
स्वच्छंद  , विस्तृत व्योम को निहार के ,
मन के परिंदे को उड़ान दे सकें हम ।
नदियों के कल कल प्रवाह को छूकर ,
जीवन की तरलता को महसूस करें हम ।
भानु की उष्णता को अंगीकार कर ,
व्यक्तित्व की प्रखरता को बढ़ाएं हम ।
अनिल की बहाव  के संग - संग चल ,
जीवन के उतार - चढ़ाव को पार करें हम ।
शशि की  शीतलता  को अंजुरी में भर ,
तन की अतृप्त प्यास दूर करें हम ।
वसुंधरा के गर्भ में छिपे रत्नों की तरह ,
सद्गुणों को आत्मसात कर लें हम ।
ईश्वर प्रदत्त इन अमूल्य उपहारों को ,
भविष्य के लिए सहेजते चले हम ।।

स्वरचित -- डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग  , छत्तीसगढ़🌲🌲