Saturday, 6 April 2019

बदलते रिश्ते ( लघुकथा )

उमा के पति का  पिछले कई महीनों से इलाज चल रहा था । इसमें उनकी  सारी जमापूंजी खर्च हो गई थी । मजबूरी में अपने जेठ , ननद , भाई सबके पास मदद के लिए गई...सबने अपनी असमर्थता जाहिर की । उसकी विपरीत परिस्थितियों के बारे में जानकारी होने पर उसके दोस्तों ने बिना कहे मिलकर पूरी राशि जुटा दी ..उमा के लिए यह अप्रत्याशित था...जिंदगी भर जिन्हें आदर दिया , जब जो भी आवश्यकता पड़ी , उनका साथ दिया वो रिश्तेदार वक्त पर काम नहीं आये जबकि दोस्तों के लिए कभी कुछ विशेष नहीं किया ..उनसे कभी कोई अपेक्षा नहीं रखी.. उन्होंने अपनी जिम्मेदारी निभाई थी । वक्त ने उसे सच्चे रिश्तों का मोल समझा दिया था ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

# नव वर्ष की नई सुबह #

नव वर्ष की नई सुबह #

कूक उठी कोयल
आम भी बौराये....
लद गई शाखें फूलों से
सबके मन हर्षाये...

फसलें पककर घर आईं
मेहनतकश मुस्काये...
शस्य स्यामला धरा के
आगे  अपना शीश नवाये...

धूप बत्ती की पावन गन्ध
घर - आँगन  को महकाये....
सुवासित हुआ तन - मन
मिटी मन की आशंकाएँ...

नई उमंगें  , नई चाह
राहें  सरल बनायें...
परिश्रम व दृढ़ विश्वास
लक्ष्य  तक पहुंचाएं...

नव वर्ष की नई सुबह
लेकर कई खुशियाँ आये....
सुख - समृद्धि बनी रहे
दूर  हों सब बाधाएँ ....

आप सभी को चैत्र प्रतिपदा नव वर्ष की शुभकामनाएं

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

Friday, 5 April 2019

खुद से मिल लिया करो

जीवन में  तो गम बहुत हैं...
फिर भी हँसकर जी लिया करो ।
खामोशी  की इन दरारों को...
अपनी  बातों से सी लिया करो ।
आते हैं कभी जो  बेबसी के पल...
घूँट जहर भरा पी लिया करो।
छँट जायेगी धुंध धूप आने पर..
चुपचाप कुछ दूर चल लिया करो ।
कब तक डरायेंगे तुम्हें ये अंधेरे...
हाथों में जुगनू भर लिया करो ।
खुशियों का बसेरा तो अंतर्मन में है ...
कभी - कभी खुद से मिल लिया करो ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

Tuesday, 2 April 2019

स्कूल की यादें ( संस्मरण )

यादें ...और वो भी बचपन की...मन को दूर कहीं उड़ा ले जाती हैं और कुछ देर के लिए अपने वर्तमान को भूलने को मजबूर कर देती हैं । बचपन की यादें होठों पर बरबस मुस्कान ला देती हैं क्योंकि उन पलों  में छुपी होती हैं ढेर सारी शरारतें...मस्ती...हुड़दंग । यूँ तो ढेर सारी बातें हैं कहने को पर यादों की पोटली से एक घटना आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ । बात उन दिनों की है जब  मेरे पापा जी की पोस्टिंग नारायणपुर में थी । वहाँ मिडिल स्कूल न होने के कारण लगभग एक किलोमीटर दूर नवागांव के स्कूल में पढ़ने जाना पड़ता था । हमारे ग्रुप में बहुत लोग थे तो साइकिल से जाते और खूब मस्ती करते हुए जाते । एक - दूसरे को चिढ़ाते , खिजाते रास्ता कैसे तय होता पता ही नहीं चलता । मुझे किताबें पढ़ने का बहुत शौक था और समाचार पत्र भी नियमित रूप से पढ़ती थी तो उनके बीच मेरा प्रभाव कुछ ज्यादा ही अच्छा था । सभी मेरी बातें ध्यान से सुनते भी थे । एक बार हम शौक में ही पैदल स्कूल गये पर थक गए थे तो लौटते समय हमने तय किया कि लिफ्ट लेकर जायेंगे। कोई गाड़ी आ नहीं रही थी... बस एक ट्रक दिखा , उसे ही रोककर हम पीछे ट्रॉली में बैठ गए ..हम सबको बहुत मजा आ रहा था तभी मुझे समाचार पत्र में पढ़ी एक घटना याद आई और मैंने अपने दोस्तों को बताया कि ऐसे ही एक ट्रक वाला एक लड़की को लिफ्ट के बहाने बिठाकर उसका अपहरण कर लिया था और दूसरे राज्य में ले जाकर बेच दिया । बस , क्या था...मस्ती वाले माहौल में भय व्याप्त हो गया...हालांकि बहुत दूर का सफर नहीं था फिर भी सभी डरने लगे । मुझे भी पछतावा होने लगा कि मैंने उन्हें अभी यह बात क्यों बता दी..हम अपने गाँव पहुँचने ही वाले थे...अपने रुकने के स्थान पर हमने हल्ला मचाया...रोको , रोको...चूंकि ट्रक स्पीड में थी तो कुछ  दूर आगे जाकर रुकी लेकिन मेरी एक सहेली डर के मारे कि ट्रक वाला नहीं रोक रहा है  ट्रक रुकने के पहले ही कूद गई और उसे सिर पर चोट भी लगी । तब मुझे महसूस हुआ कि  लोगों को डराने का गलत असर भी हो सकता है और मानसिक स्थिति सबकी भिन्न - भिन्न होती है इसलिए हम सबके साथ एक समान व्यवहार नहीं कर सकते । पर बाद में उस घटना को याद करके  हम सभी खूब हँसे और जो ट्रक से कूद गई थी उसकी खूब खिंचाई भी हुई । अगर ट्रक वाला हमें कहीं ले जाता तो क्या होता? इस विषय पर भी हमने खूब चर्चा की ....हाँ इस घटना के बाद हमें घर से समझाईश मिली कि आते - जाते ऐसा कोई भी रिस्क नहीं लेना है
।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

Monday, 25 March 2019

अरमान

भोर लिखूँ , मध्यान्ह लिखूँ .
या सिंदूरी शाम लिखूँ.....
राम लिखूँ , श्याम लिखूँ ,
या दिल पे तेरा नाम लिखूँ...
झील बनूँ ,  झरना बनूँ ,
या नदी अविराम बनूँ..
स्नेह  बनूँ , श्रद्धा  बनूँ ,
या प्यार का जाम बनूँ ...
एक पहर , दो पहर नहीं ,
साथ मैं आठों याम रहूँ..
आस बनूँ , विश्वास बनूँ ,
या अनवरत प्रयास बनूँ...
भक्ति करूँ , समर्पण करूँ ,
या खुद को अर्पण करूँ...
चाँद  बनूँ , तारे बनूँ ,
या  दीप बन जीवन में उजास करूँ...
तितली बनूँ , पंछी बनूँ ,
या  तरु बन  तेरा आवास बनूँ...
शब्द बनूँ , अर्थ बनूँ ,
या स्नेहिल भाव विचार बनूँ...
दरिया बनूँ , नदिया बनूँ ,
या समंदर विशाल बनूँ...
धूप बनूँ , बारिश बनूँ ,
या  धरा की प्यास बनूँ...
शब्द बनूँ , भावार्थ बनूँ ,
या कोमल एहसास बनूँ....
रूप धरूँ कुछ भी पर ,
सदा  पिया  तेरे साथ रहूँ....

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

Friday, 22 March 2019

उलझन ( कहानी )

माँ मैं कॉलेज जा रही हूँ... कहते हुए  विधि घर से बाहर निकली तो माँ ने अंदर से ही कई हिदायतें दे डालीं.
देर मत करना ...समय पर खा लेना आदि आदि । विधि बी. एस. सी. प्रथम वर्ष की छात्रा थी , अपनी सहेलियों के साथ वह सुबह नौ बजे घर से निकलती..उसकी क्लास चार बजे खत्म होती थी.. पहला साल होने के कारण सीनियर द्वारा उनका इंट्रोडक्शन  होता था और उनके लिए ढेर सारे नियम बनाये गए थे जैसे बिना चुनरी के सूट नहीं पहनना , स्लीवलेस कपड़े नहीं पहनना  , सीनियर्स को नाइंटी डिग्री झुककर विश करना आदि..तो उन्हें बहुत डर कर रहना पड़ता ताकि वे परेशान न करें । अंतिम वर्ष के सीनियर निनाद सर उसे बहुत अच्छे लगते थे.. उन्होंने कई बार उसकी मदद की थी और अपने साथियों की डांट पड़ने से भी बचाया था । फिजिक्स का प्रैक्टिकल समझ न आने पर वह निनाद सर से समझने गई थी.. उन्होंने बहुत अच्छे से उसे समझाया था.. वह कॉलेज के ब्रिलिएंट स्टूडेंट्स में से एक थे । कहीं भी मिलते वे बहुत अच्छी  बातें करते व विधि को सृजनात्मक कार्यों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करते । वाद - विवाद प्रतियोगिता में पक्ष में विधि और विपक्ष में निनाद सर का चयन हुआ था और उन्हें यूनिवर्सिटी में भाग लेने के लिए जाना था । कॉलेज की मैडम भी  साथ गई थी , निनाद सर के साथ दो दिन रहकर उनके बीच  अच्छी दोस्ती हो गई थी , वैसे ही विधि उनके व्यक्तित्व और प्रतिभा से  बहुत प्रभावित थी । मासूमियत  लिए  उसकी  उम्र  भी थी सपने बुनने की..वह निनाद सर के लिए आदर के साथ कुछ और भी महसूस करने लगी थी.. शायद यह  एहसास प्यार ही है.. वह सोचने लगी थी । घर में रहती तो उनके बारे में ही सोचती..पढ़ते - पढ़ते किताबों के बीच बरबस उनका चेहरा आ जाता और वह कल्पनालोक में खो जाती । उसके हर क्रियाकलाप में निनाद सर उसके साथ होते..वह पढ़ाई में ध्यान नहीं लगा पा रही थी.. कितना ही वक्त उनके बारे में सोचकर व्यतीत कर देती । परंतु बाद में पछतावा भी होता कि समय व्यर्थ बीता जा रहा है और वह पढ़ाई नहीं कर पा रही है । सबसे बड़ी बात तो यह थी कि उसका प्यार व लगाव एकतरफा था । निनाद सर के प्रति उसका लगाव बढ़ता ही जा रहा था और वह भावनाओं के मकड़जाल में फँसती ही चली जा रही थी । पल्लवित हुए नये कोंपल की तरह उसकी भावनाएँ बहुत ही मासूम थी पर यह उसके जीवन की उलझन बढ़ा रही थी । निनाद सर ने कभी अपना झुकाव उसकी तरफ नहीं दिखाया था.. वह तो सिर्फ उसकी मदद कर दिया करते थे... उसे आगे बढ़ने को प्रेरित करते थे । विधि के बदलते व्यवहार ने शायद उन्हें भी यह एहसास करा दिया था कि विधि क्या महसूस कर रही है । अचानक उन्हें अपने सामने पाकर उसका ठिठकना , अक्सर उसकी नजरों का निनाद को ढूंढना , उसका अधिक साथ पाने के बहाने बनाना...इस उम्र का प्यार महज शारीरिक आकर्षण  होता है.. समझदारी भरा निर्णय नहीं होता है वह जानते थे । लेकिन विधि को कैसे समझाया जाए वह सोच में पड़ गए थे । प्रैक्टिकल परीक्षा के बाद निनाद सर से उसकी मुलाकात हुई तो उन्होंने उसकी पढ़ाई के बारे में पूछा और परीक्षा की ठीक ढंग से तैयारी करने के लिए विधि को कुछ टिप्स भी दिये । परीक्षा की तैयारी में वे दोनों ही व्यस्त हो गये थे । विधि का मन होता उन्हें फोन कर बात कर ले पर वे भी अपनी पढ़ाई में व्यस्त होंगे  यह सोचकर नहीं कर पाई ।
विधि जानना चाहती थी कि निनाद सर के दिल में उसके लिए कोई जगह है या नहीं । न भी हो तो उसे फ़र्क नहीं
पड़ता क्योंकि चकोर का काम चाँद को चाहते रहना है ..चाँद को यह खबर भी नहीं तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता..वह तो अपने प्रेम के मधुर एहसास में डूबा रहता है । प्रेम कभी प्रतिदान नहीं चाहता.. विधि प्रेम की मधुरता से सराबोर थी...यथार्थ के ठोस धरातल पर उसने कदम ही नहीं रखा था ।
      निनाद बेहद समझदार व सुलझे व्यक्तित्व का लड़का था.. वह नहीं चाहता था कि विधि के साथ कभी कुछ गलत हो..इस उम्र में सही दिशा निर्देश मिलना अत्यंत आवश्यक होता है नहीं तो कदम भटकने की पूरी गुंजाइश रहती है । कम उम्र में ही मोहब्बत में नाकाम युवा मौत को गले लगा लेते हैं.. अति भावुकता सोचने - समझने की क्षमता को खत्म कर देती है । निनाद ने विधि को परीक्षा के बाद उससे बात करने का निश्चय किया और उसे मिलने के लिए बुलाया । विधि बेहद प्रसन्न थी उसके लिए तो "अंधा क्या चाहे दो आँखें" वाली कहावत सार्थक हो रही थी । उसका दिल जोरों से धड़क रहा था पता नहीं क्या कहने बुला रहे हैं निनाद सर...कहीं उन्हें भी तो...इससे आगे सोचने में भी उसे शर्म आ रही थी । खैर , हल्के गुलाबी सूट में तैयार होकर वह निनाद सर से मिलने लायब्रेरी गई । पेपर के बारे में बात करने के बाद निनाद ने उससे कहा..विधि , मैं आगे की पढ़ाई करने के लिए बाहर जा रहा हूँ... मैं चाहता था उससे पहले तुमसे बात करूँ । तुम एक बहुत अच्छी लड़की हो..पढ़ाई में भी अच्छी हो । अभी का समय बहुत महत्वपूर्ण रहता है  , इधर -  उधर ध्यान दोगी तो अपने करियर पर  फोकस नहीं कर पाओगी ।
प्रेम और श्रद्धा में थोड़ा सा ही अंतर होता है... कई बार किसी के प्रति हमारे मन में श्रद्धा या आदर भाव प्रेम का एहसास कराता है... पर वह प्रेम नहीं होता है ।श्रद्धा में कोई बुराई नहीं है ,हम ईश्वर के प्रति भी श्रद्धा रखते हैं पर उन्हें सिर्फ अपना कहकर अधिकार नहीं जताते । प्रेम एकाधिकार चाहता है.. कई ख्वाहिशें जगाता है.. और उन ख्वाहिशों के पूरे न होने पर मन में निराशा घर कर लेती है और हम जिंदगी में बहुत पीछे रह जाते हैं ।
मैं यह सब तुम्हें इसीलिए बताना चाहता हूँ कि कुछ वर्ष पहले मेरी एक कजिन ने प्रेम में निराश होकर खुदकुशी कर ली थी । शायद उसे कोई समझा नहीं पाया कि जीवन में और भी राहें हैं.. जीने के हजार तरीके हैं । निराशा और तनाव ये दो बातें हमारे मन को कुंठाग्रस्त कर देती हैं और हमें कुछ भी सोचने नहीं देती..हम अच्छे - बुरे का फर्क नहीं कर पाते । मैं एक बड़े और दोस्त के रूप में तुम्हें समझा रहा हूँ इसे अन्यथा मत लेना और बहुत सोच समझ कर जीवन की राहें तय करना । मैं यहाँ नहीं रहूँगा पर फोन के जरिये तुम अपनी बातें मुझसे शेयर कर सकती हो..एक सीनियर , दोस्त के रूप में मैं हमेशा तुम्हारी मदद करूँगा ।
विधि समझ गई थी निनाद सर क्या कहना चाह रहे थे.. नहीं सर मैं भावुकता में कभी भी कोई गलत कदम नहीं उठाऊंगी.. क्योंकि मुझे आप जैसे समझदार और दूसरों का भला सोचने वाले सर मिले हैं । आप बिलकुल सच कह रहे हैं , अभी अपने करियर के बारे में सोचने का वक्त है.. मैं इस पर पूरा ध्यान दूँगी । शुक्रिया  ! आपने मुझे जीवन की एक  बहुत बड़ी उलझन से बाहर निकाला.. अब मैं किसी बात से बहकने वाली नहीं । पर आप मुझसे बात करने व मुझे दिशा निर्देश देने के लिए समय जरूर निकलेंगे , वादा कीजिये । निनाद सर के मुस्कुराते हुए हाँ  सुनकर विधि की आँखे खुशी से नम हो गई थी ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Tuesday, 12 March 2019

होली का उपहार ( लघुकथा )

अमन थोड़ा शर्मिला ...शांत स्वभाव का लड़का था.. उम्र यही कोई दस बरस की होगी...अभी इस शहर में नया - नया आया था । कॉलोनी में अभी कोई दोस्त नहीं बने थे..हाँ स्कूल में कुछ दोस्त जरुर बन गए थे ।अपनी बालकनी से नीचे अपने हमउम्र लड़कों को खेलते देखकर उसकी भी  इच्छा होती कि उनके साथ जाकर खेले...पर वह पहल नहीं कर पाता । माँ ने कई बार कहा जा बेटा जाकर उनसे दोस्ती कर..कब तक ऐसे अकेले रहेगा ।  दिन निकलते जा रहे थे ...होली पास आ रही थी.. कॉलोनी के सारे बच्चे होलिका दहन के लिए लकड़ियाँ इकट्ठा कर रहे थे.. होली अमन का फेवरेट त्यौहार था..उसकी भी इच्छा हो रही थी कि वह उनसे घुले - मिले , दोस्तों की मदद करे ।  होली का त्यौहार तो समूह में ही अच्छा लगता है । आखिर उसे एक उपाय सूझा... घर की छत पर कुछ पुराने फर्नीचर और गत्ते के डिब्बे पड़े हुए थे जो मकान शिफ्ट करते वक्त पैकिंग के लिए लाए गए थे । अमन उनमें से कुछ गत्ते लेकर होलिका के पास गया ...उसे देखकर लड़कों की टोली का उत्साह बढ़ गया और उन्होंने खुशी से उसका अपनी टीम में स्वागत किया । अमन ने उनसे बाकी सामान नीचे उतारने के लिए मदद करने को कहा और पूरी वानर सेना जुट गई छत का सामान नीचे लाने में... उनकी होलिका काफी ऊँची हो गई थी और मम्मी भी खुश हो गई थी छत की सफाई हो जाने पर । सबने होलिका की पूजा करके होलिका जलाई और दूसरे दिन खूब होली खेली...रंगों से एक - दूसरे को सराबोर कर दिया...मम्मियों को अपने बच्चे को पहचानना मुश्किल हो रहा था...फिर सबने एक - दूसरे के घर जाकर मनपसन्द व्यंजन के मजे लिए । सबसे अधिक खुश अमन था...उसकी झिझक दूर हो गई थी और अपना मनपसन्द त्यौहार होली के मजे के साथ -  साथ उसे ढेर सारे दोस्त भी मिल गए थे । इस होली का यह सबसे खूबसूरत उपहार था ।

स्वरचित -- डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़