Thursday, 21 November 2019

माँ

भारतीय परिधान में सुसज्जित नारी ,
सुकोमला,सुलक्षणा, अलंकृता ,
पोषिका, वन्दनीया , शिक्षिता ,
देश रहे सदा उस माँ का आभारी ।।
उसकी देखरेख में सबल परिवार  ,
देती  ज्ञान - विज्ञान का आधार ।
सिखाती - पढ़ाती अपने बच्चों को ..
बनाती सुयोग्य  , सुशिक्षित ,सुसंस्कारी ।।
बेटा - बेटी हैं  एक समान ,
भेद  न कोई  उनमें मान ,
परन्तु बेटी की शिक्षा बने...
निश्चित ही दो परिवारों के लिए हितकारी ।।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़


Monday, 18 November 2019

मधुर मिलन

टिम - टिम करते तारे झाँक रहे ,
व्याकुल चाँद घूमे गगन - गगन ।
चाँदनी में  वह मुखड़ा ताक रहे ,
 यामिनी कहाँ  बैठी बन दुल्हन ।।

नीरवता सखी  सदा साथ रहे ,
शीतल , पुलकित मन्द समीरन ।
चूनर में जुगनू को टांक रहे ,
खिले श्वेत पुष्प बने आभूषण ।।

पर खोल रहे गुंचे अपने ,
उड़े रंगोआब महका गुलशन ।
इंतजार में  हैं सदियाँ  बीती   ,
आस लगाये है  बैठी विरहन ।।

आ गई है बेला पूनम की ,
होगा अब तो उनका मधुर मिलन ।
निशा की प्रीत में  खिला चाँद ,
चन्द्र - स्पर्श से हुई निशा रौशन ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़







Friday, 15 November 2019

ग़ज़ल

इश्क में सरस जीवन लगता  है ,
पुष्पित सुरभित उपवन लगता है ।

यूँ तो हसीं लगते सारे नजारे ,
सबसे प्यारा साजन लगता है ।

जवां हो रही कली ख्वाहिशों की ,
पुलकित  सरसिज सा मन लगता है ।

लट उलझाये , दुपट्टा उड़ाये ,
कुछ मनचला यह पवन लगता है ।

उमंगें हुई समंदर  सी गहरी ,
हृदय नीलाभ गगन लगता है ।

उड़ते रहते पंछी के मानिंद ,
सुंदर प्यार का बंधन लगता है ।

नजरें मिला हुई बेसब्र " दीक्षा ",
चुगली न करे धड़कन लगता है ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Wednesday, 13 November 2019

करुण रस

अभी - अभी वह अस्पताल से आई है ,
देह के साथ मन भी झुलसा लाई है ।
चन्द सवाल हैं उन भीगती आँखों के ,
जो अश्कों के साथ दर्द से  भारी हैं  ।
जो सजा थी उसके खूबसूरत होने की ,
जिद अपनी इज्जत , सम्मान न खोने की ।
लड़की होना क्या गुनाह है उसका ,
या उसने ना कहने की सजा पाई है ।
कुसूर क्या था उसका ? किया था इंकार ,
उस पागल प्रेमी का प्रेम नहीं किया स्वीकार ।
एकतरफा प्रेम की भेंट चढ़ गई जिंदगी ,
छीन लिया उसका सब कुछ , उसकी खुशी ।
पीड़ा उसके हिस्से ही क्यों आती ?
वह खौफनाक मंजर अभी तक नहीं भुलाई है ।
उन करुण आँखों के सवालों के जवाब,
परिवार , समाज को  ही देना होगा ।
क्यों नहीं देते संस्कार लड़कों को कि ,
लड़की की ना भी सुनना होगा ।
सिखाओ अपने लड़कों को कि लड़की
नहीं कठपुतली  , न कोई परछाई है ।
अभी - अभी वह अस्पताल से आई है ,
देह के साथ मन भी झुलसा लाई है ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़


Monday, 11 November 2019

सजल - 3

समांत - ई
पदांत - सी है
मात्रा भार - 17
************************
आँखों में ये जो नमी सी है 
होंठों पे वो* हँसी थमी सी है 
*************************
सोचा  था जो वो पाया नहीं 
सीने में थोड़ी गमी सी है 
*************************
कोशिश तो की थी पूरी मगर
हौसलों की जरा कमी सी है 
*************************
पिघलेगी  मेहनत की तपिश से
इरादों में बर्फ जमी सी है 
*************************
जल्दी सूरत बदल जायेगी 
बदहाली ये मौसमी सी है 
*************************
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़



Friday, 8 November 2019

मुक्तक

मजहब के नाम पर लड़ना नहीं ,
धार्मिक उन्माद में भिड़ना नहीं ।
मानव धर्म  हो सबसे  ऊपर _
व्यर्थ के विवाद में पड़ना नहीं ।।

डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

शब्द सीढ़ी

विष्णुप्रिया तुलसी मनभावन ,
करती पावन घर -  आँगन ।
शाखित , विस्तृत, मंजरी शोभित ,
नित्य दीप प्रज्वलित  करूँ पूजन ।
रोगनाशिनी  तू पापनाशिनी ,
स्वच्छ कर दे पूरा वातावरण ।
धूप , दीप , पुष्प अर्पित कर,
विधि - विधान से करूँ अर्चन ।
सुख - सौभाग्य देना मुझे माता ,
सद्भाव , सुविचार ले करूँ नमन ।
 करो कृपा यही मेरी आराधना ,
श्याम संग देती रहो  मुझे दर्शन ।
वृन्दा - विष्णु की भक्ति पाकर ,
पुलकित हो गया मेरा अंतर्मन ।

स्वरचित  - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़