Monday, 27 April 2020

नमन माँ शारदे

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नमन करूँ मैं माँ शारदे को ,
मुझको नित ही ज्ञान मिले ।
चलती रहे यह कलम निरन्तर,
जग में विशिष्ट पहचान मिले ।।
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बढ़ती रहूँ सत्य के पथ पर ,
राह में न कोई तूफान मिले ।
हृदय विशाल बने सागर सा ,
लहरों सा सबल उत्थान मिले ।।
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स्नेह मिले सदा स्वजन का ,
पथ के साथी ज्ञानवान मिले ।
सुंदर , सरल , सहज हो जीवन ,
कभी भी न कोई अपमान मिले ।।
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महके सदैव मेरी बगिया ,
प्यार , मान - सम्मान मिले ।
सौभाग्य का वरदान दे माँ ,
चरणों में तेरे स्थान मिले ।।
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Thursday, 23 April 2020

सजल

             *सजल* 
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समांत     --- आद
पदांत      --- किया है
मा०भा०  ---  22
मात्रापतन -- * चिह्नित है
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रूढ़ियों  से  देश  को आजाद किया है
नीतियों से चमन को‌ आबाद किया है
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भूलना उन्हें नहीं जो देश हित मरे
उनकी जय का उच्च शंखनाद किया है
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कठिनाइयों ने जिंदगी आसान बना दी
पुरुषार्थ ने ही जीत से संवाद किया है
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वेदना की थाह तुम तो भाँप न पाए
आँसुओं ने दर्द का अनुवाद किया है
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ये साँप आस्तीन के सगे नहीं कभी
देश को जयचंदों* ने बर्बाद किया है
जयचंदों* ने ही देश को बरबाद किया है
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Wednesday, 22 April 2020

सजल

सजल

सबकी नित नई कहानी  है
लहरों   में  मौज  रवानी  है
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मदमस्त पवन का झोंका है
जो   जीते  वही  जवानी  है
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उड़ने  को  है  अम्बर  सारा
कदमों में दुनिया* झुकानी है
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यादें  ही  जग में रह जातीं
साँसें  तो आनी - जानी है
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कोशिश है दुनिया कहे मुझे
सूरत   जानी   पहचानी  है
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स्वरचित - डॉ.  दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Sunday, 19 April 2020

शिक्षक के लिए

सोंचें , समझें , सीखें , विस्तृत करें अपना ज्ञान ।
शिक्षा के इस महायज्ञ में , करना है हमको अंशदान ।।

विचलित न हों कर्तव्य - पथ से ,अपने - आप को लघु मान ।
सागर की विशालता में ,हर बून्द का होता योगदान ।।

लीक पुरानी छोड़ चलें अब , नवाचार की बाहें थाम ।
छँट गई बदली भ्रांतियों की , विज्ञान को मिला खुला आसमान।

छिड़ जाने दो जमकर , अंधेरे - उजाले का महा संग्राम ।
तैयार खड़े हैं अक्षर बाँकुरे , करके सारे इन्तजाम ।।

सद्भाव की श्यामल धरा पर , बीज उगायें कर्मवान ।
स्नेह , प्रेरणा के सिंचन से , फसल बनायें निष्ठावान ।।

गर्व करें हम शिक्षक हैं , है यह कार्य बड़ा महान ।
निभाकर अपना दायित्व , कर्म को अपना दें सम्मान ।।

स्वरचित -डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Thursday, 16 April 2020

सीख प्रकृति की

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काँटों में खिले फूल ने हँसना  सिखलाया ,
कठिन परिस्थितियों में जीना  सिखलाया ।
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पशु , पंछी , पौध के जीवन से सीखो ,
गतिरोधों से लड़कर बढ़ना सिखलाया ।
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पर्वत जो खड़े हुए हैं गर्व से सीना ताने ,
जीवन के उद्दाम वेग में अड़ना सिखलाया । 
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धैर्य और संयम का पाठ पढ़ाता सागर ,
विशालता में छुपी उदात्तता सिखलाया ।
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राह के रोड़ों को बहा ले जाती सलिला ,
रुकना नहीं है  चलते  जाना सिखलाया ।
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Wednesday, 15 April 2020

बेटा बड़ा हो गया (संस्मरण )

एक माँ के लिए उसके बच्चे सदैव छोटे ही रहते हैं और वह बच्चा छोटा हो तो वह कभी बड़ा होता ही नहीं । अपने बेटे के 
उन्नीसवें वर्ष में प्रवेश होने के बाद भी वह मुझे हमेशा छोटा ही महसूस होता है । वह जब कोचिंग के लिए कोटा में पढ़ने गया तो मुझे कुछ ढाढस हुई कि अब वह अपना ख्याल रख सकता है । जीवन में आने वाली परिस्थितियों का सामना कर सकता है , साथ ही दोस्त चुनना व अपने कार्यों को स्वयं पूरा करना इत्यादि जिम्मेदारी निभा सकता है । एक साल वहाँ अकेले रहकर वह काफी आत्मविश्वासी हो गया और मैं उसकी बातें सुनकर आनन्द  और निश्चिंतता के सागर में गोते लगाने लगी ।
   उसके अगले वर्ष उसका नागपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला हो गया ।  पहली बार उसे सामान सहित हॉस्टल छोड़ने गई और भरे मन से वापस दुर्ग आ गई । दो माह के बाद उससे मिलने हम लोग नागपुर गये तो उसमें बहुत परिवर्तन दिखा । ऐसा लगा मानो वह बड़ा हो गया है , सबसे पहले उसने हमें शेगाँव की मशहूर कचौरियां खिलाई , सबसे बड़ी बात उसने पेमेंट करते वक्त पापा की ओर नहीं देखा , खुद ही किया । उसके बाद उसने हमें वहाँ के दर्शनीय स्थलों को घुमाया । वह पूरे समय अपनी जिम्मेदारी के प्रति सजग रहा कि मम्मी - पापा उसके पास आये हैं तो वह विशेष ख्याल रखता रहा । उसकी हरकतें देखकर अच्छा लग रहा था पर कभी - कभी हँसी भी आ जाती थी और मैं इन्हें देख कर मुस्कुरा देती थी । बेटे का बड़ा होना , हमारा इतना ख्याल रखना अच्छा लग रहा था , एक माँ के लिए अपने बच्चे के विकास का हर चरण आनन्दित करने वाला होता है । बच्चे का उठ कर बैठना , घुटने चलना ,  खड़ा होना और चलना... बढ़ने का हर कदम माँ के मन को वात्सल्य के रस से भर देता है । परिवर्तन के ये पल आहलादित करने वाले होते हैं । माँ तो यही चाहती है कि उसका बच्चा खूब आगे बढ़े , कहीं भी रहे बस उसके दिल के करीब रहे ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

सजल

मुझ पर हक अपना  जताने लगे हैं ,
अपना  सब कुछ वो लुटाने लगे हैं ।

मिट्टी लगी है त्याग और विश्वास की , 
घर को बनाने में जमाने लगे हैं ।

हो गया भरोसा पंछियों को मुझपे ,
घोंसला मेरे घर बनाने लगे हैं ।

पाला है जिनको खून - पसीने से ,
दवा न लाने के बहाने लगे हैं ।

दिल में जगह थोड़ी दे दी उन्होंने ,
रूठने पर मुझे अब मनाने लगे हैं ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़