Saturday, 13 June 2020

गीत 4

साँसों के मोती गुँथे आशा के तार में ,
तन - मन रंग गया स्नेह और प्यार में ।
मधुरिम भावों से पुलकित रोम - रोम _
जीवन यह बह गया प्रीत की धार में ।।
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जीवन सुमन  खिल जाते हैं खार में ,
जीत का सूत्र  मिला जीवन के सार में ।
मदमाते सौरभ से छलक उठा यौवन_
उमंगों की लहर उठीं जीवन के ज्वार में ।।
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भाव सारे बह गये अश्कों की धार में ,
मनमीत से मिलन  झील के उस पार में  ।
दिल में बसा ली छबि  प्यारे सजन की_
बाकी अब क्या रहा नश्वर संसार में ।।
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बदलाव न कर  रीतियों के आकार में ,
रिश्तों को दाँव पर न लगा अहंकार में ।
अधूरा नहीं  है सौंदर्य उपमान बिन_
आभूषित  वनिता लाज के अलंकार में ।।
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़




Thursday, 11 June 2020

सुरता

सुरता
रिमझिम बरसात म , तोर सुरता आथे
मुंधियारी रतिहा हा अड़बड़ डरवाथे ।
कुहू कुहू कोइली के जियरा भरमाथे
मया के आगी म  तन भुर भुर जर जाथे ।।

सुन्ना सुन्ना लागय गली खोर अउ कुरिया
आँखि  ले आंसू ह मोर रहि रहि चुचुवाथे ।
काम बुता म एकोच कन मन नई लागय
तोर रद्दा देखत देखत मा मोर बेरा पहाथे ।।

बाहरत पोंछत तोरे धियान करत रहिथव
बेचैन जिवरा द्वारी म नजर  गड़ियाथे ।
साज सिंगार करके बइठे हंव तोर अगोरा 
 घेरी बेरी दरपन म मुँह देखत लाज आथे ।।

तोर संग पाय के सेतिर  तरसत हावव
मोर मन के मैना तोर तीर उड़ि उड़ि जाथे ।
 कमाय खाय के मजबूरी म दुरिहा होगेंन ,
  मया के मछरी ह पानी बिन  छटपटाथे ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़




Wednesday, 10 June 2020

व्यवहार ( लघुकथा)

   बेटे के विदेश चले जाने के बाद मनोरमा ने घर के ऊपरी हिस्से को किराये पर दे दिया था । वृद्धावस्था में घर की देखभाल के साथ कुछ आमदनी भी हो जाती थी । वे अपने - अपने कार्यों में व्यस्त रहते थे , सामान्य बातचीत  का व्यवहार बना रहा । ऊपरवाली सिलाई मशीन का उपयोग करती थी , यह जानकर मनोरमा कभी - कभार  पुराने पेंट के कपड़े को काटकर उससे एक थैला सिलने के लिए  उसे  दे दिया करती थी और वह सिलाई कर वापस कर देती थी । उन्हें रहते चार - पाँच वर्ष हो गए थे पर मनोरमा ने कभी उनका किराया नहीं बढ़ाया था । इस बार कपड़ा देने गई तो  उसकी किराएदार ने मशीन खराब होने की बात कहकर थैला सिलने से इंकार कर दिया था । अगले दिन मनोरमा को मशीन की खड़ - खड़ सुनाई दे गई थी  । 
             इस बार उसने घर का किराया बढ़ा दिया था , जहाँ छल हो वहाँ व्यवहार कैसा ?

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Monday, 8 June 2020

गीत 3

कोकिल कंठी कूक उठी है , मौसम हुआ सुहाना है ।
मन के पावन तटबन्धों पर , सुंदर सपन सजाना है ।।

झंकृत हो उठी देह - तन्त्री , अधरों लिखा फसाना है ।
प्रेमभाव के अनुबंधों पर , हिय का लुटा खजाना है ।।

ख्वाबों के उड़ते पंछी ने , पाया नया ठिकाना है ।
प्रेमपूरित सरल हृदय में , अनुपम गेह बसाना है ।।

पद्मपुंज के सिंहासन पर , साजन तुम्हें बिठाना है ।
मिलने को आतुर नयनों को , तेरी राह बिछाना है ।।

उमड़ - घुमड़ रहे मोद अम्बुद , प्रेम धार बरसाना है ।।
पावक सम पावन बन्धन को , सातों जनम निभाना है ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

गीत 1

दया धर्म शुचि मानवता का ,
भाव हमें जो नित्य दिया ।
तुलसी , मीरा , संत कबीर ने ,
अनुपम वह साहित्य दिया ।

प्रबुद्ध , प्रगल्भ ,प्रभाकर ने ,
नव - जीवन का स्तुत्य किया ।
कर्मशीलता के भावों ने ,
जीवन को औचित्य दिया ।

साधु , सन्तों , उपासकों ने ,
 रीति , नीति  और सत्य दिया ।
भक्तिकाल के सरस भाव ने  ,
प्रचंड प्रखर पांडित्य दिया  ।

मर्यादा के आदर्श राम ने ,
 तप से देह आवृत्त किया ।
त्याग ,समर्पण की आभा ने ,
प्रभास सा लालित्य दिया ।

भक्ति  की पावनी गंगा ने ,
मानव को धर्म प्रवृत्त किया ।
सद्भावों की पुण्य सलिला ने  ,
 मानस  को  कृतकृत्य  किया ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Saturday, 6 June 2020

ईमानदारी का थर्मामीटर ( लघुकथा)

         स्वाति आज पहली बार सीमा के साथ बाजार गई थी ।  उसने देखा सीमा  कुछ चुनिंदा दुकानदारों से ही खरीदारी कर रही थी । उसके कई काम की चीजें उनके पास न होने पर  वह किसी और से वह सामान नहीं खरीद रही थी बल्कि उन्हें ही अगली बार मँगाकर रखने के लिए कह रही थी । स्वाति ने सीमा को किसी भी दूसरे दुकानदार से वह सामान खरीदने  को कहा तो उसने मना कर दिया यह कहकर कि वे ईमानदार नहीं हैं ।
   " थोड़ी देर में किसी का चेहरा देखकर तुम कैसे कह सकती हो कि यह ईमानदार है या बेईमान ?" स्वाति  ने अपनी शंका प्रकट करते हुए कहा । " मैं जान - बूझकर कई बार उन्हें दो - चार रुपये अधिक दे देती हूँ जो ईमानदार होते हैं वे  सच बताते हुए पैसे वापस कर देते हैं  , खोटी नीयत वाले चंद रुपयों के लाभ का मोह नहीं छोड़ पाते और ग्राहकों का विश्वास खो देते हैं । बस , यही है मेरा ईमानदारी परखने का थर्मामीटर "।स्वाति को भी भा गया था यह थर्मामीटर ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Tuesday, 2 June 2020

सजल

सजल
समांत - अ अती
पदांत - है
मात्रा भार - 20
मात्रा पतन - **
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स्त्री है नदी ,वह अविरल बहती है
 संस्कृति को साथ लेकर चलती है
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 पालती और  दुलारती है  सबको
 सीने में उसके  ममता पलती  है
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 देख नहीं सकती किसी को दर्द में
 पीड़ा में भी वह हँसती  रहती है 
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त्याग तप धैर्य की मूरत है नारी
परिवार के लिए सब दुख सहती है
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अपने बच्चों में भेद नहीं  करती  
  अनहोनी होने से  वह डरती है
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़