Friday, 3 July 2020

मेरी अमरकंटक यात्रा ( संस्मरण )

        मेरी अमरकंटक यात्रा
मध्यप्रदेश के हृदयांचल में स्थित अमरकंटक यूँ तो कई बार जाना हुआ पर शायद अब भी जाने का अवसर मिले तो मैं ना नहीं कह पाऊँगी । नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर अमरकंटक के बड़े - बड़े शिखर मानो अपनी बाहें फैलाकर आमंत्रित करते हों । पेंड्रारोड़ से अमरकंटक का रास्ता सघन वन प्रान्त से होकर जाता है ।हरे - भरे वनों के बीच से गुजरना  मन को स्निग्ध ,शीतल एहसास से भर देता है । अपने आसपास घूमते बादल सरई , साल के ऊँचे - ऊँचे पेड़ों की शाखों पर रुककर बातें करते प्रतीत होते हैं । रुई के फाहों से नाजुक बादल पत्तों , वस्तुओं के साथ मन को भी भिगोते चलते हैं । विंध्य और सतपुड़ा पर्वत का मिलन यहाँ होता है जो मेकल पर्वत कहलाता है । मेकल पर्वत की अँजुरी से नर्मदा नदी का पावन जल  बहता है और हरियाली से ओत प्रोत करता है ।
      यह सोन नद  की भी जन्मस्थली है जो सोनमुडा से निकलकर पूर्व में चला जाता है । नर्मदा के ग्यारहकुंडीय उद्गम स्थल के पास बहुत सारे छोटे मंदिर बने हुए हैं । यहाँ अमरेश्वर शिव का मंदिर है जिसके कंठ से नर्मदा निकलकर कुंड में गिरती है । माई की बगिया ऋषि मार्कण्डेय की तपोभूमि भी एक पवित्र और मनोरम स्थल है जो गुलबकावली के फूलों के लिए प्रसिद्ध था ।  कपिलधारा और दुग्ध धारा जल प्रपात का अनुपम सौंदर्य मनमोहक है । यहाँ भीगे बिना निकलने का मन ही नहीं करता । पहाड़ों, हरे वनों के बीच कल्लोलिनी नर्मदा मानो हाथ पकड़कर अपने करीब बिठा लेती है  और  कुछ देर और रुकने का मनुहार करती है । बिना बुलाये मेहमान की तरह बारिश यहाँ कब आ जाये कुछ कह नहीं सकते पर यह आकर अमरकंटक के सौंदर्य को द्विगुणित कर देती है । अपनी आँखों से इस नयनाभिराम दृश्य को हृदय में सँजो कर मैं लौट आई पर अब भी उस नैसर्गिक सौंदर्य के दर्शन की प्यास अधूरी ही लगती है ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़

कुमायूं डायरी

दुर्ग से 31 मई  को सुबह सात बजे हम लोग दुर्ग - हजरत निजामुद्दीन हमसफ़र एक्सप्रेस में बैठे और  1 जून सुबह 4.30 बजे हजरत निजामुद्दीन स्टेशन में उतरे । हल्दवानी के लिए हमारी ट्रेन नई दिल्ली स्टेशन  से थी तो तुरंत ही हमें टैक्सी के द्वारा वहाँ जाना पड़ा । सुबह साढ़े पाँच बजे ही दिल्ली के ट्रैफिक जाम का सामना स्टेशन पर करना पड़ा और स्टेशन से कुछ दूर पहले ही  टैक्सी छोड़कर अपना सामान लेकर हम पैदल ही चल पड़े ।नई दिल्ली से  सुबह छः बजे हम शताब्दी एक्सप्रेस में  हल्दवानी के लिए निकल पड़े । ट्रेन में नाश्ता, चाय ,कोल्ड ड्रिंक्स वगैरह के द्वारा शानदार मेहमानवाजी की गई ।  सुबह साढ़े दस बजे हम लाल कुंआ स्टेशन में उतरे । वहाँ हमारे परिचित गिरीश जी हमें लेने आये थे ।  उनके परिवार के  साथ बिताया वह एक दिन उनकी मेहमानवाजी के नाम रहा । उन्होंने बहुत ही खुशी के साथ हमारा स्वागत सत्कार किया । हमारी ननद गीता ने एक दिन में ही पहाड़ की सारी खूबियों से हमारा परिचय करा दिया । वहाँ के फल खुबानी , आड़ू , आम ,वहाँ की स्पेशल दाल व खाना का आनंद लिया हमने । पहाड़ों का सौंदर्य दर्शन करने से पहले हमने वहाँ के लोगों के खूबसूरत दिलों  का सौंदर्य दर्शन किया जो अपनेपन और प्यार से लबरेज़ था । वो ही  नहीं उनका पूरा परिवार हमसे बड़ी प्रसन्नता से मिला मानों हम कब से परिचित हों । उन चेहरों में कोई अजनबियत नहीं थी बल्कि मिलने की ललक थी , ढेर सारा लगाव था । शाम को हम गीता की बड़ी बहन उमा दीदी के घर गये जहाँ से हम खाना खाकर  स्नेहाभिभूत होकर वापस लौटे । गिरीश जी ने न सिर्फ  हमारे लिए टैक्सी की व्यवस्था कर दी थी , बल्कि पूरी यात्रा की योजना बना दी थी कि हमें क्या क्या देखना है , किस रूट  से जाना है इत्यादि क्योंकि वे वहीं के रहने वाले हैं सारे महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थलों की सूची उन्होंने हमें दे दी थी । चूँकि यह बहुत भीड़ वाला सीजन था तो उन्होंने सभी जगह होटल भी बुक कर दिया था । इससे बड़ी सुविधा और क्या चाहिए, हम निश्चिंत होकर यात्रा पर निकल पड़े । दो जून की सुबह गीता के हाथों की बनी स्वादिष्ट पूरी सब्जी खाकर हम हल्दवानी से पहाड़ों के लिए निकले और हमारी रोमांचक यात्रा प्रारंभ हुई ।
        
      हल्दवानी से कुछ दूर आगे बढ़ने के साथ ही पहाड़ों के दर्शन प्रारंभ हो गये.. हरे - भरे पेड़ों युक्त ऊँचे - ऊँचे पहाड़ मानो आसमान से बातें कर रहे हों । सर्पिलाकार सड़कों और उनके कई खतरनाक मोड़  को देख कर हम सांस रोक लेते थे कि अब क्या होगा लेकिन ड्राइवर किसी कुशल मदारी की तरह आसानी से उन स्थितियों से गाड़ी बाहर निकाल ले जाते थे । प्रकृति की खूबसूरती यहाँ वहाँ छिटकी पड़ी थी जो आँखों को बाँध लेती थी । एक तरफ ऊँचे पहाड़ तो दूसरी ओर गहरी खाई ...जिंदगी के उतार - चढ़ाव का सच बयान करते नजर आ रहे थे । पहाड़ों के साथ चलती चौड़ी पहाड़ी नदी दृश्यों को मनोरम बना रही थी । स्थानीय ड्राइवर के द्वारा अनेक पहाड़ी फलों व पेड़ों के बारे में हमें ढेर सारी जानकारी मिली । काफल तोड़ कर खाये जो छोटे बेर की तरह दिखते थे पर रसदार थे । नासपाती के पेड़ की हरेक शाखाओं को छोटे - छोटे फलों से लदा हुआ देखना सुन्दर अनुभव रहा..काश ! ये थोड़े और बड़े होते तो अपने हाथों से तोड़कर इन्हें खाना और भी मजेदार होता । हरे - हरे आड़ू के फल छोटे पेड़ों पर फले हुए थे  । तरह - तरह के पहाड़ी फूल पहाड़ों के सौंदर्य में वृद्धि कर रहे थे ,  साथ ही समीर की शीतलता चेहरे के साथ मन को भी  स्निग्ध किये जा रही थी । खूबसूरत नजारों ने आँखों को बाँध सा लिया था और हम मंत्रमुग्ध हो यहाँ-  वहाँ नजरें फिराते रहे ।
        रानीखेत के रास्ते में पड़ा भवाली जहाँ अंग्रेजों के जमाने का बना  हुआ  एक T. B. Sanitorium  मिला
क्योंकि यहाँ चीड़ों के घने जंगल हैं । कहा जाता है कि चीड़ के फूलों की खुशबू से टी. बी. के मरीज अपने आप ठीक हो जाते थे । मुझे लगता है आधी बीमारी तो यहाँ की खूबसूरती व
मनभावन दृश्य को देखकर ही दूर हो जाती होगी ।
चीड़ के ऊँचे पेड़ मानो आसमान में  झाँकने का प्रयास कर रहे हों , उनके साथ बादल भी लुकाछिपी का खेल खेल रहे थे । कभी बगल में , कभी ऊपर तो कभी उनसे गलबहियाँ लगते हुए  ...घुमावदार रास्तों , घाटियों के बीच कैंचीधाम मंदिर पड़ा जो नीमकरौरी बाबा का समाधिस्थल है । नदी पर बने पुल के उस पार यह स्थल अत्यंत आकर्षक व मनोरम है और लोगों की आस्था का प्रतीक है ।  उनकी मूर्ति जीवंत सी लग रही थी ।  रास्ते में नदी पर बने लौह ब्रिज  पर जाकर नदी व पहाड़ का विहंगम  दृश्य  देखनाा अद्भुत था । यहाँ पर  एडवेंचर के प्रेेमी

 के लिये नदी के आर - पार तार बाँध कर उन्हें स्लाइड कराया जा रहा था ।     
           

कुमायूँ डायरी 2

रानीखेत पहुँचते ही देवी माँ का भव्य झूला देवी मंदिर दिखाई दिया जहाँ हजारों की संख्या में लोगों ने मन्नत की घण्टियाँ बाँध रखी थीं ।देवी दर्शन कर  हम रानीखेत के नयनाभिराम सौंदर्य का रसपान करने निकल पड़े । पहाड़ की सुदूर चोटी पर विशाल पठार की उपलब्धता  उस सृष्टिकर्ता की कला पर मानव को चकित कर देता है । इस मैदान को गोल्फ मैदान बना दिया गया है । रानीखेत के पास सेना का  एक रेजीमेंट है , उनके द्वारा इस मैदान का नियमित उपयोग होने के बारे में जानकारी हुई । समीप ही अंग्रेजों के जमाने का थियेटर बना हुआ था जिसका मनोरंजन के लिए उपयोग होता था ।
वहाँ पर एक बड़ा संग्रहालय है जहाँ कुमायूँ रेजीमेंट का इतिहास , हथियारों , तोप वगैरह को बहुत सम्भाल कर रखा गया है । लाइट साउंड शो के द्वारा वहाँ लड़ी लड़ाइयाँ तथा इतिहास के बारे में बहुत सुंदर जानकारी दी जाती है । ऊँचे - ऊँचे चीड़ के वनों के बीच झाँकता आसमान अद्भुत छटा बिखेर रहा था । जानकारी हुई कि चीड़ के फूलों की सुगंध से टी. बी.के मरीज अपने - आप ठीक हो जाते हैं । प्रकृति के अनुपम सौंदर्य को आँखों और  तस्वीरों में भर कर भी मन नहीं भर रहा था । ठंड के समय यहाँ बर्फ पड़ी रहती है तब ढेर सारे सैलानी यहाँ स्केटिंग के लिए आते हैं । मन तो वहीं रुक जाने का कर रहा था पर हमें अपने अगले पड़ाव कौशानी   के लिए निकलना था अतः अपने मन को समझा कर आगे बढ़े । लगभग पाँच छः घण्टे लगातार सफर कर शाम के धुंधलके में हम कौशानी पहुँचे । वहाँ पहुँचते ही बारिश की बूंदों ने हमारा स्वागत किया । यहाँ से हिमालय की अधिकतम चोटियों के एक साथ दर्शन होते हैं , वह दृश्ग बहुत ही अद्भुत , मनोरम होता है । इस दुर्लभ नैसर्गिक सौंदर्य को देखने के लिए ही लोग यहाँ आते हैं । यहाँ के लगभग सभी होटल ऊँचाई पर बने हुए हैं ताकि अपने कमरे की बालकनी से ही वह अद्भुत नजारा देख सकें । अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें जब इन बर्फीली चोटियों पर पड़ती हैं तो वह बचपन में पढ़े सोने के पहाड़ों वाली कहानियाँ याद दिला जाती हैं । रुपहले बादलों , हल्की बारिश के बीच धुंधली सी दिखती बर्फीली चोटियों को देखकर हम मंत्रमुग्ध हो गए थे । बारिश और बदली के कारण अधिक चोटियाँ ( पीछे की ) नहीं देख पाए पर  इंटरनेट द्वारा प्राप्त जानकारी और देखे गए दृश्यों को मन में बसाते हुए उस पूरे सौंदर्य का अनुमान तो कर ही लिया कि जब बादल न हों तो कैसा अद्भुत विहंगम दृश्य रहता होगा । दूसरे दिन की भोर में उठकर हम अपनी खिड़कियों, बॉलकनी में खड़े हो गए थे ताकि कौशानी के अनुपम सौंदर्य को अपने चित्त में भर सकें । बिल्कुल नाउम्मीद तो नहीं हुए  , बहुत सारे मनमोहक दृश्य भिन्न - भिन्न आकार बनाते हुए दिखाई पड़े ।  पहाड़ों के मौसन के बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता , कभी भी बारिश और कभी भी आसमान साफ , परन्तु प्रकृति का हर रूप मनभावन होता है । तरह - तरह के फूलों व फलों से भरपूर पहाडों के हर रूप में जीवन खिल उठता है । पहाड़ों के बीच सूर्यदेव को उगते और डूबते देखने का अलग ही आनन्द है , ऐसा लगता है कि हम उनके अधिक करीब आ गए हैं । बादल सहचर बन हमारे आस - पास क्रीड़ा करते रहते हैं और कभी हाथों , गालों को भी सहला कर अपना एहसास दिला जाते हैं । पहाड़ों के ऊपर रुई के फाहे रख दिये हों किसी ने , चोटियों पर ठहरे बादल कुछ ऐसा ही दृश्य सृजित करते हैं । जगह - जगह फूटते झरने , चाय के बागानों व नाशपाती के छोटे - छोटे फलों से लदे पेड़ों को छूना भी एक नया अनुभव था । उत्तराखंड के पहाड़ों का हर पड़ाव अपने विशेष नैसर्गिक सौंदर्य के कारण हृदय में एक स्थायी ,अविस्मरणीय यादें सँजोता जा रहा था ।
क्रमशः
डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

मर्यादा ( लघुकथा )

पिता अपनी नव - विवाहिता बेटी शुभा से मिलने एक दिन अचानक पहुँच गए थे । साड़ी के आँचल से लगभग पूरे चेहरे को ढकी शुभा बाहर आई । यह क्या ? जिस बेटी को बाईस वर्ष अपने घर - आँगन में फूल की तरह सँवार कर रखा ,वह कुम्हला सी गई थी । "बिटिया ! सच बताओ , तुम खुश तो हो यहाँ ? "  " जी पापा ! सब ठीक है , कहते हुए शुभा चाय देने झुकी तो पीठ और गले पर खरोंच का निशान देख लिया था
उन्होंने । पिता की आँखें तो बेटी के मन के घाव पढ़ लेती हैं ,यह चोट तो ऊपर से ही दिख रहा था ।
         " बिटिया ! मैं जानता हूँ ससुराल व रिश्तों की मर्यादा तुम्हें सच कहने से रोक रही है पर तुम्हारे पति सुयश ने मनुष्य होने की मर्यादा भंग कर दी है इसलिए अब तुम्हें कोई और रस्म निभाने की आवश्यकता नहीं है । चलो बेटा , तुम अपने घर चलो ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

मद्धिम आँच ( लघुकथा )

आज सुबह से आँचल महसूस कर रही थी कि सासु माँ कुछ नाराज सी लग रही हैं । पति आशीष की ओर देखकर इशारों में पूछा - "बात क्या है ?" प्रत्युत्तर में उसने भी कंधे उचका दिये शायद इस बार उन्हें माँ से मिलने आने में देर हो गई थी । आँचल ने बात शुरू की  -  " मम्मी जी आपके हाथों के बड़े कितने अच्छे लगते हैं , मैंने बनाये थे तो कच्चे- कच्चे से  लगे "।  " अरे , तूने तेज आँच में जल्दी - जल्दी सेंक दिया होगा । चल आज दाल भिगा , तुझे बड़े बनाना सिखाती हूँ । " और शाम को  आशीष सास - बहू दोनों  को बातें करते हुए देख रहा था .....चूल्हे की मद्धिम आँच पर बड़े सिंक रहे थे , स्नेह और आदर की मद्धिम आँच में रिश्ते भी .. ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

सजल 18

समांत - आरे
पदांत -  ×
मात्रा भार - 16
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आकर बरसो बादर कारे
सूखी धरा तुम्हें पुकारे
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कोठी हुई खाली अन्न की
कृषक साथी बाट निहारे
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भीग गई यह श्यामल वसुधा
झूमी सृष्टि नीर बरसा रे
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सुवर्णमयी धान की बाली
धानी रंग रंगे नजारे
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आई  खुशी फसलों के संग
मस्ती में खिले लोग सारे
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अंधेरों से डरकर न बैठ
राह दिखाने आये तारे
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

मुक्तक

मौसम आया सावन का , तन - मन को भिगा लो ।
इस सूखी बंजर धरती को , हरा - भरा बना लो ।
महकेगी घर - आँगन में सुख - संतोष की बेल_
प्रेम से सिंचित करो मन , बीज नेह के डालो ।।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़