Friday, 31 May 2019

देते वक्त ( लघुकथा )

मधु को अपने एक रिश्तेदार के विवाह की वर्षगांठ में जाना था । व्यस्तता के कारण वह उपहार खरीदने जा नहीं पाई थी । घर पर साड़ी और पेंट शर्ट का कपड़ा रखा हुआ था उसे ठीक लगा तो उसने वही दे दिया । बाद में उसे पता चला कि  शायद उन्हें वह कपड़ा पसंद नहीं आया था ..उन्हें इसके बारे में बात करते हुए उसने सुन लिया था ।
       वह उसकी  क्वालिटी  खराब होने की शिकायत कर रहे थे ..सुनकर मधु को हँसी आ गई थी क्योंकि वह भूल गये थे  कई वर्ष पहले  यही उपहार उन्होंने मधु को गृह - प्रवेश में  दिया था । देते वक्त शायद उन्होंने कपड़ों की  क्वालिटी नहीं  देखी  थी ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Thursday, 30 May 2019

सीखा मैंने जीना ( कहानी )

  सीखा  मैंने जीना (कहानी)

      निवास जी की आँखों से आँसू बहने लगे थे..आज वह लड़का उनकी मुसीबत में साथ दे रहा था जिससे   उन्हें हमेशा चिढ़ होती थी... हर गणपति पूजा और दुर्गा पूजा के पहले वह अपनी टोली के साथ उनके दरवाजे पर पहुँच जाता था और  जिद कर उनकी जेब ढीली करवा जाता था । वह बिंदास अपनी  ही दुनिया में मस्त रहता , उसके लिए दोस्ती  सबसे अधिक महत्व रखती थी.. दो चार  दोस्त उसके साथ दिखते ही रहते । निवास जी अपने बच्चों को उससे दूर  रहने की सलाह देते । उन्हें कभी मोहल्ले के दूसरे बच्चों के साथ घुलने -मिलने नहीं दिया उन्होंने  ताकि वे उनकी संगति में बिगड़ न जायें । अपने दोनों बेटों को पढ़ाई और ट्यूशन में ही उलझाये रखा । कभी - कभी एक कसक सी उठती है उनके दिल में । बच्चों को कभी  बचपन का मजा नहीं लेने दिया उन्होंने... बेचारे..उनके कड़े अनुशासन में  बेबस से  बालकनी से नीचे दूसरे बच्चों को खेलते  देखते रहते थे । खैर , उन्होंने जो भी किया उनका भविष्य सँवारने के लिए किया  ..इसीलिए तो वे आज अच्छे पदों पर हैं , अमेरिका में रह रहे हैं । बड़े गर्व से बात करते हैं वे अपने बच्चों की सफलता के बारे में ।

   यह मोहल्ले छाप , आवारा घूमने वाला लड़का यहीं रहा हमेशा । हर साल गणपति , दुर्गा पूजा धूमधाम से मनाता , तरह - तरह के आयोजन करवाता , घर - घर याद से प्रसाद बँटवाता । दिसम्बर की छुट्टियों में क्रिकेट प्रतियोगिता करवाता । दिन भर वह घर के बाहर ही दिखता , पता नहीं कभी पढ़ता भी है  कि नहीं.. निवास जी उसे देखकर हमेशा सोचते । पर  वह हर साल जैसे तैसे पास हो ही जाता । अभी भी शायद कोई छोटी - मोटी नौकरी कर रहा है और फिर भी वैसा ही खुश दिखता है जैसे पहले दिखता था । ये कैसे लोग हैं जो कम सुविधाओं के बीच रहकर भी हमेशा सन्तुष्ट दिखते हैं । किसी से  आगे बढ़ने की कोई होड़ नहीं , कोई महत्वाकांक्षा नहीं .. सरिता की जलधार जैसे जो राह मिली बहती जाती है वैसे ही ये जिंदगी की प्रवाह में बस बहते चले जाते हैं बिना किसी विरोध के ।  रिश्तेदारों की शादी , जन्मदिन इत्यादि कार्यक्रमों में पूरे उत्साह के साथ शिरकत करना  जैसे इनका प्रथम कर्तव्य होता..अपने पड़ोस के उस परिवार का इतना अधिक सामाजिक होना कई बार उन्हें  कचोटता भी था क्योंकि उनके यहाँ  इतने आने - जाने वाले , उनका ख्याल रखने वाले थे । निवास जी स्वयं कहीं आये गये नहीं तो अब उनके घर कौन आयेगा । जिंदगी भर अपना स्वार्थ ही देखा उन्होंने , सामाजिक दायित्वों को कभी महत्वपूर्ण समझा ही नहीं । लाभ-हानि की तुला में तौल-तौल कर संबंध बनाए ।आज जब बेटे बाहर सेटल हो गये और पत्नी भी  जीवन की राह में अकेला छोड़ गई तब अपनों की कमी महसूस हो रही है । " अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत "  जिंदगी बीत जाने के बाद जीने का सलीका सीखा भी  तो किस काम का ।
       दरवाजे पर हुई आहट उन्हें स्मृतियों के गलियारे से वर्तमान के दायरे में ले आई थी.. शायद यह वही लड़का था जिसके बारे में वो सोच रहे थे, उनके पड़ोसी का लड़का रमन । "अंकल उठिए मैं आपके लिए खाना लाया हूँ.."अपने हाथ के टिफिन को टेबल पर रखते हुए उसने कहा तो आँखें भर आईं थी उनकी --' अरे ! बेटा तकलीफ करने की क्या जरुरत थी ..मैं कुछ भी खा लेता , कमला कल  वापस आ जायेगी  फिर कोई दिक्कत नहीं है ।' मेरी मेड एक विवाह समारोह में गई हुई थी और उसी बीच  मैं बाथरूम में  फिसल कर गिर पड़ा था... मेरे पैर में फ्रैक्चर हो गया था । पता नहीं किसने रमन तक यह खबर पहुँचा दी थी और अस्पताल ले जाने से लेकर मेरे  पैर में प्लास्टर बंधने तक वह मेरे साथ लगा रहा । मुझे घर छोड़कर शायद वह खाना बनवाने के लिए अपने घर चला गया था  , आज उसने अपने ऑफिस से छुट्टी ले ली थी  ...मेरे लिए यह सब अद्भुत था..मुझे याद नहीं मैंने जीवन में किसी और के काम के लिए कभी छुट्टी ली हो । रमन मुझे खाना खिलाकर चला गया था यह ताकीद करके कि मुझे कोई भी जरूरत होगी तो मैं उसे तुरंत फोन करूँगा । अपना फोन नम्बर उसने मेरे स्मार्टफोन में सेव कर दिया था ...और अपनी मीठी मुस्कान की छाप मेरे जेहन में । उसके जाने के बाद भी मैं उसके बारे में ही सोचता रहा ।
         मुझे अपनी छोटी सोच पर ग्लानि हो रही थी ।  बच्चों को  पढ़ा लिखाकर उनके कैरियर बनाने  में जीवन की सफलता ढूँढने वाला मैं.. क्या सच में सफल हूँ , खुश हूँ । बच्चे मुझे ,  अपनी माँ को छोड़कर क्या विदेश जाना चाहते थे । उसकी माँ अंतिम समय में अपने बच्चों को देखने की साध लिए हुए ही चली गई । परिवार की खुशी साथ रहने में होती है , हम कभी कोई त्यौहार  का मजा नहीं ले पाये ..बस अपनी खुशियों से समझौता ही करते रहे । अब सब कुछ मिल भी गया तो किस काम का..जो समय बीत गया अब वो वापस तो नहीं आयेगा । कुछ बड़ा पाने के लिए हम न जाने कितनी छोटी - छोटी ख़ुशियों को नजरअंदाज करते हैं ।  रमन भले ही बहुत आगे न जा पाया पर वह अपने परिवार के साथ है... अपने माता - पिता की सेवा कर रहा है.. उन्हें वो सब खुशियाँ दे रहा है जो उन्हें चाहिए । अपने पोते - पोती के लाड़ - दुलार , देखरेख में उनका दिन कैसे बीतता है पता ही नहीं चलता और एक तरफ वो घड़ी के काँटे देखते रहते हैं जो बीतने का नाम ही नहीं लेते । बेटे चाहते हैं कि पिता  उनके साथ रहें पर पता नहीं क्यों विदेश में वे एक माह से ज्यादा नहीं रह पाते.वहाँ का साफ - सुथरा परिवेश  भी उन्हें बाँध नहीं पाता..दम घुटता सा लगता है.. अपने देश सी स्वतंत्रता महसूस नहीं होती । यहाँ  अड़ोस - पड़ोस सब अपने हैं , उनके मन  में जमा कुछ पिघल सा गया था ।
     परिवर्तन प्रकृति का नियम है । मौसम बदलते हैं भीषण गर्मी के बाद प्यासी धरा बारिश का महत्व जान पाती है । पतझड़ के बाद ही बहारों का आगमन जीवन में उत्साह भर जाता है । यदि दुःख का एहसास न हो तो शायद हम सुख का आनंद न ले पायें । बिस्तर पर रहे वो पैतालीस दिन निवास जी की  विचारधारा में बदलाव ले आये थे । रमन और उसका पूरा परिवार उनकी देखरेख में लगा रहा । जिन्हें कभी नजर भर देखा भी नहीं वे बिना किसी अपेक्षा के उनका ख्याल रख रहे थे ।  सचमुच जीना इसी  का नाम है  , अपने लिए नहीं दूसरों के लिए । सरल होना भी कई लोगों के लिए इतना कठिन क्यों हो जाता है ।   अपने बड़प्पन में इंसान दूसरों के मन की अच्छाई नहीं देख पाता  । मन की तरलता ही सारे भेद भुला  सकती है और सबको अपना बना सकती है ।
        पैर ठीक होने के बाद निवास जी बाहर घूमने , लोगों से मिलने , सामाजिक कार्यक्रमों में आने - जाने लगे हैं । रमन का घर तो उनका दूसरा घर हो गया है और उसके बच्चों के वे छोटे दादा बन गये हैं ...रमन को उन्होंने कभी प्यार से न देखा था पर अब उसके बच्चे उन्हें जान से अधिक प्यारे हो गये हैं । उन्होंने गणपति की तैयारी के लिए रमन को छुट्टी लेने से मना कर दिया है और अपनी एक टोली बना ली है । जिंदगी के अंतिम प्रहर में ही सही , उन्होंने जीना सीख लिया है ।

मैं डॉ. दीक्षा चौबे यह प्रमाणित करती हूँ कि यह कहानी मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित है।

- डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़
       
   

Wednesday, 29 May 2019

ग़ज़ल

काफ़िया - आने
रदीफ़ - लगे हैं

तसव्वुर में वो ऐसे छाने लगे हैं ,
आईना देख हम मुस्कुराने लगे हैं ।

देखने लगे अपनी आँखों में उनको ,
बेवक्त बेसबब गुनगुनाने लगे हैं ।

ख्वाबों में थी कल तक जिनकी आमद ,
निगाहों में वो झिलमिलाने लगे हैं ।

मुनव्वर हुई उनकी मुस्कान से महफ़िल,
शमा की तरह हम थरथराने लगे हैं ।

दीद हो गई उनके रुख- ए - रौशन की ,
पंछियों की तरह चहचहाने लगे हैं ।

आँखों की नमी सी थम गई थी हँसी ,
बातों बातों में खिलखिलाने लगे हैं ।

राह- ए - वफ़ा में चलना 'दीक्षा ' संभलकर ,
तूफ़ानों में वो डगमगाने लगे हैं ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Tuesday, 28 May 2019

ये बेटियाँ ही हैं

इक्कीस वर्षों तक ,
किसी आँगन में लगा वृक्ष ,
उखड़कर किसी दूसरी जगह
हरगिज पनप नहीं सकता ।
ये बेटियाँ ही हैं जो ,
पलकर , बढ़कर खुशी से ,
अपनी संस्कारों की जड़ सहित
किसी नये आँगन में
पल्लवित पुष्पित हो जाती हैं ।
ये बेटियाँ ही हैं ।
कभी महकती चहकती थी यहाँ
वो दूसरे उपवन में
तिनका तिनका जोड़ ,
आशियाना बना लेती है।
ये बेटियाँ ही हैं ।
माँ के हाथों से खाती ,
बाबा के कंधों पर चढ़ती
एक नये माहौल में जाकर ,
अन्नपूर्णा बन खाना खिलाती है
सबका सहारा बन जाती है ।
ये बेटियाँ ही हैं ।
यहाँ पाती है शिक्षा , संस्कार ,
खेलती गुड़ियों के संग ,
एक नये परिवार की होकर
गुड़िया की माँ हो जाती है
संस्कारों के बीज बो जाती है ।
ये बेटियाँ ही हैं ।
जो अपना अस्तित्व भुलाकर
दूसरों के लिए
मुस्कुराती है ।
ये बेटियाँ ही हैं ।

स्वरचित -डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Sunday, 26 May 2019

मेरी लाडो सुनो

मेरी प्यारी लाडो सुनो ,
खूबसूरत ,बेहद खास हो तुम ।
मधुबन की पुरनम खुशबू का ,
एक खुशनुमा एहसास हो तुम ।
मेरी लाडो बेहद खास हो तुम ।

ढूँढती हूँ..पाती हूँ मैं तुझमें ,
अपनी ही शख्सियत ।
उड़ने को खुला आसमान ,
सब कुछ सौंप देने की चाहत ।
कभी नींद में देखा था जो ,
वो मुकम्मल ख्वाब हो तुम ।
मेरी लाडो बेहद खास हो तुम ।

पाला है तुझे नाजों से मैंने ,
रूढ़िगत बातों  को भुलाकर ।
दिये शिक्षा और सुविचार ,
ताकि बन सको आत्मनिर्भर ।
सुनकर भूल न जाना मेरी ,
अंतर्मन की आवाज हो तुम ।
मेरी लाडो बेहद खास हो तुम ।

जीवन के सफर में मिलेंगे ,
तुम्हें भले और बुरे लोग ।
छल , फरेब , झूठे प्रेम की ,
अंधेरी दुनिया बसाते  लोग ।
न भटकना इन बंद गलियों में ,
मेरे हौसलों की परवाज़ हो तुम ।
मेरी लाडो बेहद खास हो तुम ।

दर्पण देख न रीझना खुद पर ,
अपने अस्तित्व को निखारना ।
सौंदर्य - शृंगार न बने कमजोरी ,
अपने भविष्य को संवारना ।
सजग होकर आगे बढ़ना ,
नये युग का आगाज़ हो तुम ।
मेरी लाडो बेहद खास हो तुम ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Tuesday, 21 May 2019

नरेंद्र मोदी

प्रार्थना को हुए करबद्ध, शिव के लिये पुष्पहार  ,
गले रुद्राक्ष की माला , तिलक केसरी भाल ।

आकर्षक व्यक्तित्व वृहद सोच - विचार ,
उन्नत माथा , चौड़ा सीना चलते शेर- सी चाल ।

सुनिश्चित  कर विकास ,राष्ट्र को दिया संवार,
लोकतंत्र की रक्षा को संकल्पित हर हाल ।

गरिमामयी वस्त्र ,ओजस्वी वाणी से करे प्रहार,
मिला सम्मान भरपूर , विदेशों ने किया निहाल ।

जनता करती प्यार , भीतरघाती करते वार ,
संयमित होकर सहते सब , हृदय उनका विशाल।

योग , नियम , अनुशासन प्रिय बने रहे खुद्दार ,
देश का चौकीदार मोदी ,बना भारत माँ का लाल ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

डर ( संस्मरण )

उस दिन मैं जनगणना के लिए मैत्री कुंज रिसाली में एक घर में बैठे जानकारी भर रही थी कि मेरे  बेटे का फोन आया कि मम्मी घर के अंदर एक बड़ा सा साँप आया है । तब वह दस वर्ष का रहा होगा...मैं डर के मारे थर - थर काँपने लगी..माँ को अपनी जान से अधिक अपने बच्चे की जान की फिक्र होती है । मैने उसे रसोई घर का दरवाजा बंद करके दूसरे कमरे में बिस्तर पर बैठने की हिदायत दी और तुरंत वहाँ से निकल गई । मेरे घर से मैत्री कुंज लगभग दस या बारह किलोमीटर की दूरी पर होगा पर उस दिन मुझे वह दूरी बहुत अधिक लग रही थी.. पूरे रास्ते मन में गलत ख्याल आ रहे थे । जैसे - तैसे घर पहुँची तो देखा कि बहादुर रसोई के दरवाजे के नीचे एक चादर को ठूंसे उसके सामने कुर्सी पर पहरा देते  बैठे हैं और उसके हाथ में एक डंडा है मानो साँप अंदर की ओर आता तो वह उसे मार ही देता । उसकी
ऐसी स्थिति देखकर मेरा डर उड़न छू हो गया और मैं हँस पड़ी ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़