Wednesday, 30 October 2019

एक दोस्त बहुत खास

एक दोस्त बहुत खास
लगता बेहद प्यारा सा ।
सुर से सजा हुआ साज,
दिलकश उसका अंदाज़ ।
भटकता रहता इधर - उधर ,
एक बादल आवारा सा ।
एक दोस्त बेहद प्यारा सा ।
लगता बेपरवाह ,
पर बेहद संजीदा ।
हर किसी को कराता एहसास,
कुछ खास होने का ।
प्रकृति उसकी स्थिर पर ,
लगता है मन बंजारा सा ।
एक दोस्त बेहद प्यारा सा ।
पढ़ लेता वो आँखों को ,
उनमें छुपे जज़्बातों को ।
परवाह उसको सबकी ,
समझ लेता मन की बातों को ।
चहेता है वह दोस्तों का ,
सबकी आँखों का तारा सा ।
एक दोस्त बेहद प्यारा सा ।
डॉ. दीक्षा चौबे



Tuesday, 29 October 2019

दीपावली

चन्दन-सा हो महका ऑंगन , दीपों-सा घर-आँगन रोशन ।
पूजा के फूलों-सा पावन , जीवन जगमग हो मनभावन ।
क्लेश द्वेष से दूर रहे मन, स्नेह नीर की निर्मलता हो।
धन-वैभव से छलके दामन, माँ लक्ष्मी के चरण सुपावन।।
आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं -
समीर  , दीक्षा , शुभदा , क्षितिज

Saturday, 26 October 2019

शरारत

जब - जब शाखों के पत्ते हिलते हैं ,
दिल हवाओं के मचलते हैं ।
सहला जाते हैं  वो चुपके से गाल ,
गुलाबी फूलों के रंग निखरते हैं ।
फूल मुस्कुरा उठते हैं जब,
भौरों की गुंजार सुनते हैं ।
मादक मकरन्द महक उठते,
मदहोशी में मधुप झूमते हैं ।
मृदुल मृणाल लचक उठती ,
रवि गुलाबी अधर को चूमते हैं ।
खिल उठा सारा समां ,
मदना ( मैना )की तरह सभी कूकते हैं ।
कोकिल भी क्यों चुप बैठे ,
वो मीठे सुर में कूजते हैं ।
हरी घासों ने बिछा दी है चादर ,
पंछी आकर  यहाँ चहकते हैं ।
खुशियाँ मना रहे हैं सभी ,
फिजाओं में बहार महकते हैं ।
मेघों की सरगोशियों में ,
मनचले  मोरों के कदम बहकते हैं ।

छत्तीसगढ़ की पौराणिक कथाओं का महत्व

छत्तीसगढ़ की पौराणिक लोककथाओं का महत्व

           छत्तीसगढ़ की संस्कृति पौराणिक , धार्मिक लोकगाथाओं से समृद्ध है । यहाँ की वसुंधरा बहुमूल्य खनिजों के साथ साथ तीज - त्यौहार , रीति - रिवाज व परम्पराओं की सोंधी  महक से सुवासित है । छत्तीसगढ़ में त्यौहारों का विशेष महत्व है । सूखी धरती पर बारिश की फुहार की तरह हैं ये त्यौहार जो हमारे अंतर्मन को भिगो जाते हैं । तीज - त्यौहार और परम्पराएं लोक के मानस से जुड़ी हैं और जीवन को अद्भुत रस प्रदान करती हैं । आस्था , पवित्रता , भक्ति
और विश्वास जनमानस को अपनी परम्पराओं से जोड़े रखती हैं । अगर ये त्यौहार न होते तो हमारा जीवन बेरंग हो जाता । इनके बहाने मिलना - जुलना , आपसी प्रेम , भाईचारे की भावना में वृद्धि होती है , पारिवारिक रिश्ते प्रगाढ़ होते हैं , सामाजिक संरचना मजबूत होती है।
      हमारे सारे त्योहारों , परम्पराओं के पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं जो मनुष्य को नैतिक मूल्यों की शिक्षा प्रदान करती हैं , परिवार में बुजुर्गों की महत्ता प्रतिपादित करती हैं , साथ ही स्वास्थ्य व पर्यावरण की सुरक्षा के लिए प्रेरित करती हैं । इन पौराणिक कथाओं का संसार अत्यंत वृहद है जो पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से स्थानांतरित होती आई हैं । ये देवी देवता , ऋषि मुनि , दैत्य , राजा रानी , परी , जीव जंतु , पेड़ पौधे , सूर्य , चाँद , वायु , जल , अग्नि , नदी , पर्वत इन सभी अवयवों से सम्बंधित हैं और मानव - प्रकृति सम्बन्ध को पुष्ट करती हैं ।
      इन्हें पढ़कर , सुनकर सहज ही जीवन - मूल्यों की शिक्षा प्राप्त होती है  तथा बदलते मौसम के साथ स्वास्थ्य की देखभाल के महत्वपूर्ण सुझाव भी मिलते हैं। मौसम के अनुकूल व्यंजन बनाने की परम्परा हमें अपने पूर्वजों की वैज्ञानिक सोच पर स्तम्भित कर देती हैं। औषधीय पौधों जैसे तुलसी , नीम , हल्दी , आँवला का प्रयोग , ऑक्सीजन प्रदान करने वाले वृक्षों जैसे पीपल , बरगद आम , बेल की अधिकाधिक  अनुष्ठानों में अनिवार्यता लोगों को इनके संरक्षण को बढ़ावा देती है । तालाब , कुंआ खोदवाने , पेड़ लगाने , धर्मशाला बनवाने जैसे कार्यों को पुण्य - प्राप्ति के साधन बताकर
लोक कल्याण की भावना को सबल बनाती हैं ये कथाएं । लगभग सभी कथाओं में बुराई पर अच्छाई की जीत का वर्णन व्यक्ति को कुछ अच्छा करने व बनने को प्रेरित करता है । सभी पौराणिक कथाओं की चर्चा करना असम्भव है पर कुछ प्रचलित कथाओं का वर्णन अपरिहार्य है ।
      छत्तीसगढ़ में मनाए जाने वाले वट - सावित्री ( बरसाइत ) की कथा में सावित्री अपने पति की प्राणरक्षा के लिए यमराज से लड़ जाती है और सफल होती है । इस व्रत में स्त्रियाँ बरगद की पूजा कर अपने पति के दीर्घायु जीवन की प्रार्थना करती हैं । देवउठनी एकादशी की कथा में वृन्दा ( तुलसी )  और विष्णु के विवाह की कथा है जिसमें विष्णु वृन्दा के पति दैत्य बाणासुर की  मृत्यु के लिए उसका रूप लेकर वृन्दा के पास जाते हैं और  इस छल के लिए वह उन्हें पत्थर बनने का श्राप देती है
इसलिए विष्णु अगले जन्म में उनसे विवाह का  वचन देते हैं । देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी और विष्णु का विवाह होता है जिसमें गन्ने का मंडप बनाया जाता है । इस अवसर पर कृष्ण द्वारा सत्यभामा के गर्व को तोड़ने की भी कहानी कही जाती है जो कृष्ण को सोने चाँदी से तौलने चली थी परन्तु सब कुछ चढ़ाने पर भी तुला सम पर नही आया था , अंत में जब रूखमणी ने तुलसी का एक पत्ता चढ़ाया तो तराजू झुक गया । इसी
प्रकार सोमवती अमावस्या में पीपल व शीतला अष्टमी में नीम की शाखा का महत्व बताया गया है। हलषष्ठी भाद्र पक्ष की षष्ठी को  मनाया जाता है जिसमें  तालाब ,
दूध - दही , छः प्रकार की भाजी व अनाज का महत्व है । इसकी कथाओं में ईमानदारी , प्रेम , सहयोग सहित अनेक मानव -  मूल्यों की रक्षा की प्रेरणा मिलती है।
     भादो माह में मनाये जाने वाले पोला में बैल की पूजा की जाती है जो कर्मशीलता को महत्व प्रदान करती है ।
हरितालिका तीज में विवाहित पुत्री को मायके लाने की परम्परा है । पति की लंबी उम्र या अच्छे वर की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले इस व्रत में माता पार्वती व शिव
विवाह की कथा सुनाई जाती है । तीज की पूर्व संध्या पर करुभात (करेला) खाने का रिवाज है जो स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम है । इसमें ठेठरी और खुरमी नामक व्यंजन बनाया जाता है जो पौष्टिक होता है ।
     अश्विन माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी को बेटा जुतिया मनाया जाता है जिसमें सन्तान प्राप्ति या उसकी रक्षा के लिए व्रत रखा जाता है । इसकी कथा में एक ब्राह्मण के अल्पायु  सन्तान की उम्र बढ़ने की कहानी है । इसमें पीपल वृक्ष की पूजा , जलाशय के पास जाकर सूर्य को अर्ध्य देना , फलाहार इत्यादि नियम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी उचित माना जाता है । सूर्य की रोगनाशक शक्ति और विटामिन डी देने की क्षमता के बारे में सभी जानते हैं ।
     भादो माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला व्रत बहुला चौथ में राजा द्वारा ब्राह्मण को भेंट किये गए गाय की कहानी है जिसकी सच्चाई व ईमानदारी वनराज को अपना फैसला बदलने को मजबूर करती है । इसी प्रकार कृष्ण जन्माष्टमी , हरेली ,
रक्षाबंधन , नागपंचमी , दशहरा , दीपावली , होली प्रत्येक त्यौहार की अपनी विशिष्ट कथा है जो परस्पर प्रेम , सौहार्द , स्नेह के रेशमी धागे से हमें बांधती है।
   इन सभी कथाओं का अंत एक वाक्य से होता है " जइसे वोखर दिन बहुरिस , तइसे सबके बहुरय ।" अर्थात जैसे कहानी के पात्र के साथ अच्छा हुआ वैसे हमारे साथ भी हो । पौराणिक कथाओं का हमारे जीवन पर , संस्कारों पर बहुत गहरा प्रभाव है क्योंकि ये हमारी आस्था से जुड़ी हैं साथ  ही पर्यावरण संरक्षण , मानव मूल्यों की रक्षा और सम्बन्धों की प्रगाढ़ता को पोषित करती हैं ।
     ये हमें विपरीत परिस्थितियों से लड़ना सिखाती हैं , अपने मनोमालिन्य को दूर कर विशालहृदयी बनने को प्रेरित करती हैं तथा प्राकृतिक स्त्रोतों के संरक्षण को बढ़ावा देती हैं । आधुनिक पीढी के पास इन्हें पढ़ने ,सुनने का समय नहीं है परन्तु यही किस्से किसी मोटिवेशनल गुरु की स्पीच का हिस्सा बनते हैं तो वे इन्हें बड़ी खुशी से सुनते हैं । वर्तमान में व्हाट्सएप या फ़ेसबुक में इन कहानियों को पढ़ती हूँ तो खुशी होती है कि किसी माध्यम से इनका प्रसार तो हो रहा है । कुछ
ऐसे प्रयास अवश्य किये जाने चाहिए कि इन पौराणिक कथाओं का संरक्षण किया जा सके तथा युवा पीढ़ी के आगे सरलतम रूप में रखा जा सके ताकि वे इन्हें अक्षुण्ण बनाये रख सकें और इनसे लाभान्वित होते रहें ।
     -----०---
प्रस्तुति --डॉ. दीक्षा चौबे
W/O  समीर कुमार चौबे
आदित्यनगर  , दुर्ग , छत्तीसगढ़

बदलते रिश्ते ( लघुकथा )


        उमा के पति का  पिछले कई महीनों से इलाज चल रहा था । इसमें उनकी  सारी जमापूंजी खर्च हो गई थी । मजबूरी में अपने जेठ , ननद , भाई सबके पास मदद के लिए गई...सबने अपनी असमर्थता जाहिर की । उसकी विपरीत परिस्थितियों के बारे में जानकारी होने पर उसके दोस्तों ने बिना कहे मिलकर पूरी राशि जुटा दी ..उमा के लिए यह अप्रत्याशित था...जिंदगी भर जिन्हें आदर दिया , जब जो भी आवश्यकता पड़ी , उनका साथ दिया वो रिश्तेदार वक्त पर काम नहीं आये जबकि दोस्तों के लिए कभी कुछ विशेष नहीं किया ..उनसे कभी कोई अपेक्षा नहीं रखी.. उन्होंने अपनी जिम्मेदारी निभाई थी ।बदलते रिश्तों ने उसे बहुत दुःखी किया था पर देर से ही सही  वक्त ने उसे सच्चे रिश्तों का मोल समझा दिया था ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़
साहित्य सागर

सुरता

मोर छत्तीसगढ़ के माटी ,
तोला बन्दथव..मैं तोला सउरत हंव ।

छलकत  रहय तलाव
पीपर अउ नीम के छांव
तरिया पार के महादेव
सुरुज देवता ल अर्धांव
तोला बन्दथव ..तोला सउरत हंव ।

खुमरी पहिरे सियान
नाव झन ले मितान
गाय गरू के बरदी लेके
बिहनिया पहुँचय दइहान
तोला  गोहरावथव  ..

बासी अउ चटनी के स्वाद
धुस्का चीला फरा हे याद
नूनचरा अउ अथान
खावै लइका अउ सियान
तोला सुरता वत हंव ...

चूल्हा म चुरत भात
बरी जिमिकांदा के साग
बटलोही के दार
सिंघाड़ा तिखुर के फरहार
ओ सुवाद बर तरसथव...

तीजा पोरा तिहार
ठेठरी खुरमी के इंतजार
बहिनी फूफू के लेवाल
खुसी के वो भंडार
तोला खोजत हंव...

कथरी चिथरा फरिया
कोनो रहय न दूरिहा
छोटे बड़े के न भेदभाव
जम्मो रहय एके ठाव
ओला सुमिरत हंव....

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

सृष्टिकर्ता

मूर्तिकार गढ़ रहा विघ्नहर्ता को ,
जिसने जग को रचा उस सृष्टिकर्ता को ।

माया उसकी कैसी निराली ,
कितनी बारीकी से मूरत बनाई ।
हर इंसान है एक - दूजे से जुदा ,
खासियत सबमें कुछ न कुछ समाई ।

नमन है उस सृष्टि रचयिता को ।
जिसने जग को रचा उस सृष्टिकर्ता को ।

बाजार में बिकने  सज गये हैं आज ,
बिककर भक्तों का करते उद्धार ।
बच्चे की आँख में आस - विश्वास ,
दिखा दे ईश्वर कोई चमत्कार ।

अनुग्रहित करें इनकी कर्मशीलता को ।
जिसने जग को रचा उस सृष्टिकर्ता को ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़