Sunday, 26 January 2020

गणतंत्र दिवस

गणतंत्र का वास्तविक अर्थ है सबको समानता के साथ जीने का अधिकार पर समानता है कहाँ  ? समानता लाने के लिए ही संविधान में आरक्षण की नीति लाई गई ताकि जिन्हें पूर्व में आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिला वे भी आगे बढ़ें । अब भी आरक्षण खत्म नहीं हुआ तो सामान्य वर्ग के लोगों को आरक्षण देना पड़ेगा क्योंकि वे अब दौड़ में पीछे रह जायेंगे । जब तक जातिगत आरक्षण खत्म नहीं होगा समानता नहीं आयेगी । परीक्षा लेने का सही मतलब तभी है जब यह योग्यता आधारित हो , उच्च अंक पाने वाले का चयन नहीं होता और कम अंक वाले चयनित हो जाते हैं फिर कैसी समानता ? फिर भी गणतंत्र दिवस की सभी को बधाई  , इस दिन हमारा संविधान लागू हुआ था जिसे बहुत परिश्रम से बनाया गया । एक दिन के लिए ही सही जोश , देशभक्ति व उत्साह सभी ओर देखने को मिलता है । नन्हें - मुन्नों के मन में देशभक्ति के बीज अंकुरित होते हैं जो आगे चलकर एक अच्छे नागरिक रूपी वृक्ष बनते हैं । भारतीय पर्व हमारे भीतर संस्कार बोते हैं , राष्ट्रीय पर्व राष्ट्रीयता की भावना । शिक्षक होने के नाते यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि हम बच्चों में राष्ट्र भक्ति व नैतिक मूल्यों के बीज रोपित व पल्लवित करें । अपने देश के लिए मर - मिटने वाले वीर जवानों को सम्मान देना सिखायें , उनमें भी वक्त आने पर देश के काम आने का जज्बा पैदा करें । आजकल के वाइरल हो रहे वीडियो में नन्हें बच्चों को  जिन्हें जाति- धर्म की समझ नहीं है उन्हें किसी के खिलाफ  अनर्गल बातें करते देखकर बहुत दुःख होता है , राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए लोग अपने बच्चों का भी इस्तेमाल करने से नहीं चूकते , उनका भविष्य बर्बाद करते हैं । जातिगत , धर्म की राजनीति करने के लिए बच्चों के मासूम दिलों में नफरत  मत भरिये , आपने अपना वर्तमान तो खराब कर ही लिया है ।
       आज का दिन बच्चों के साथ बहुत उत्साह व  खुशियों के साथ बीता । मार्चपास्ट की धुन  देशभक्ति व उल्लास का  अभूतपूर्व वातावरण पैदा करता है । मन तरंगित हो उठता है और अपने वीर जवानों के प्रति गर्व , सम्मान व श्रद्धा से सिर झुक जाता है । कर्तव्य और अधिकार  के कशमकश के बीच आप सभी को गणतंत्र दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं ।

पहचान

वसन का एक टुकड़ा नहीं यह ,
इसमें बसती हमारी जान है ।
कभी न झुकने देंगे इसे हम ,
राष्ट्र ध्वज हमारी पहचान है ।

देश की रक्षा की खातिर ,
दिलो - जान हम लुटा देंगे ।
दुश्मन गर आड़े आया तो,
उसको भी धूल चटा देंगे ।
वीर जवानों की ताकत पर ,
हम सबको अभिमान है ।

विविध वर्ण और धर्म को ,
अपने गले लगाया है ।
सदाशयिनी संस्कृति अपनी ,
स्नेह - निर्झर बहाया है ।
सबके हैं अधिकार बराबर ,
सबको मिला सम्मान है ।

शांति , अहिंसा के पोषक  हैं ,
गाते सौहाद्रता के गीत ।
राष्ट्रीयता के ताने - बाने में  ,
गुंथी हुई है अपनी प्रीत ।
एक है अपनी भारत माता ,
हम उसकी सन्तान हैं ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़






गणतंत्र दिवस

गणतंत्र का वास्तविक अर्थ है सबको समानता के साथ जीने का अधिकार पर समानता है कहाँ  ? समानता लाने के लिए ही संविधान में आरक्षण की नीति लाई गई ताकि जिन्हें पूर्व में आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिला वे भी आगे बढ़ें । अब भी आरक्षण खत्म नहीं हुआ तो सामान्य वर्ग के लोगों को आरक्षण देना पड़ेगा क्योंकि वे अब दौड़ में पीछे रह जायेंगे । जब तक जातिगत आरक्षण खत्म नहीं होगा समानता नहीं आयेगी । परीक्षा लेने का सही मतलब तभी है जब यह योग्यता आधारित हो , उच्च अंक पाने वाले का चयन नहीं होता और कम अंक वाले चयनित हो जाते हैं फिर कैसी समानता ? फिर भी गणतंत्र दिवस की सभी को बधाई  , इस दिन हमारा संविधान लागू हुआ था जिसे बहुत परिश्रम से बनाया गया । एक दिन के लिए ही सही जोश , देशभक्ति व उत्साह सभी ओर देखने को मिलता है । नन्हें - मुन्नों के मन में देशभक्ति के बीज अंकुरित होते हैं जो आगे चलकर एक अच्छे नागरिक रूपी वृक्ष बनते हैं । भारतीय पर्व हमारे भीतर संस्कार बोते हैं , राष्ट्रीय पर्व राष्ट्रीयता की भावना । शिक्षक होने के नाते यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि हम बच्चों में राष्ट्र भक्ति व नैतिक मूल्यों के बीज रोपित व पल्लवित करें । अपने देश के लिए मर - मिटने वाले वीर जवानों को सम्मान देना सिखायें , उनमें भी वक्त आने पर देश के काम आने का जज्बा पैदा करें । आजकल के वाइरल हो रहे वीडियो में नन्हें बच्चों को  जिन्हें जाति- धर्म की समझ नहीं है उन्हें किसी के खिलाफ  अनर्गल बातें करते देखकर बहुत दुःख होता है , राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए लोग अपने बच्चों का भी इस्तेमाल करने से नहीं चूकते , उनका भविष्य बर्बाद करते हैं । जातिगत , धर्म की राजनीति करने के लिए बच्चों के मासूम दिलों में नफरत  मत भरिये , आपने अपना वर्तमान तो खराब कर ही लिया है ।
       आज का दिन बच्चों के साथ बहुत उत्साह व  खुशियों के साथ बीता । मार्चपास्ट की धुन  देशभक्ति व उल्लास का  अभूतपूर्व वातावरण पैदा करता है । मन तरंगित हो उठता है और अपने वीर जवानों के प्रति गर्व , सम्मान व श्रद्धा से सिर झुक जाता है । कर्तव्य और अधिकार  के कशमकश के बीच आप सभी को गणतंत्र दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं ।

Thursday, 23 January 2020

गाथा

भारतीय संस्कृति की गाथा बड़ी पुरानी है ,
वेद और उपनिषद की बातें सबने मानी है ।

 शूरवीर , योद्धाओंने इस धरती पर जन्म लिया ,
राष्ट्र की खातिर मृत्यु का हँसकर वरण किया ।
बैरियों को सबक सिखाने की मन में ठानी है ।

यहाँ अतिथि को देवतुल्य माना जाता है ,
सारा संसार ही अपना कुटुंब कहलाता है ।
घर - घर  पढ़ी जाती रामायण की कहानी है ।

वचन निभाने को राम ने राज सुख छोड़ा ,
धरा की ओर भगीरथ ने गंगा का रुख  मोड़ा ।
लोकहित के लिए दधीचि ने दी  कुर्बानी है ।

राजधर्म को अहिल्या ने बखूबी सम्भाला ,
दुर्गावती ने  शौर्य  से दुश्मन को निकाला ।
अंग्रेजों के छक्के छुड़ाती झाँसी की रानी है ।

 गौतम बुद्ध ने विश्व को शांति का संदेश दिया ,
 गुरुओं ने स्नेह और सौहाद्र का उपदेश दिया ।
गली - गली में गूँजती दादू , कबीर की बानी  है ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़












Friday, 17 January 2020

ग़ज़ल

काफ़िया - अन
रदीफ़ - देखता रहा

अनुराग से भरा मन देखता रहा  ,
मैं फूलों से भरा चमन देखता  रहा ।

तारे  टूटकर जमीं पर आ गये ,
मैं रात भर स्याह गगन देखता रहा ।

दुनिया ने उसे हारते ही देखा ,
मैं उसके जीत की लगन देखता रहा ।

ठूँठ देखकर  नजर फेर लिया ,
मैं काष्ठ में छुपा अगन देखता रहा ।

लोग तरक्की के ख्वाब बुनते रहे "दीक्षा "
मैं ख्वाब में भी अपना वतन देखता रहा ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग  छत्तीसगढ़













Wednesday, 15 January 2020

हाय राम ! मैंने सच क्यों बोला

 बहुत दिनों बाद एक दोस्त से मेरी मुलाकात हुई । हम दसवीं कक्षा तक सहपाठी थे तो स्वाभाविक है कि एक - दूसरे के बारे में भली - भाँति जानकारी रखते थे । उसने मुझे बताया कि उसे  " शिक्षा श्री " सम्मान प्राप्त हुआ है । मेरे मुँह से अनायास ही  निकल गया "- कितने का पड़ा ? " बस वह भड़क गई  ।बरसों पुरानी दोस्ती टूट गई मैंने अपना सिर पीट लिया - हाय राम ! मैंने सच क्यों बोला ? यह सच बोलने की आदत किसी दिन मुझे बहुत बड़ी मुसीबत में डालने  वाली है । आज से कई वर्ष पहले कबीर दास भी कह गये थे -
साधो , यह जग भया बौराना ।
सांच कहो तो मारन धायो , झूठे जग पतियाना ।
    सचमुच यह संसार बौरा गया है । कोई भी सच सुनना नहीं चाहता , झूठ  पर सभी विश्वास कर लेते हैं । ऐसा झूठ जो उन्हें  पसन्द है , लोग बार - बार सुनना पसन्द करते हैं । एक महोदय अपनी कविताएं किसी पत्रिका  में प्रकाशित करने की खुशी फेसबुक में साझा करते हैं । उनकी  प्रत्येक रचना मात्रा , लिंग और वचन सम्बन्धी अशुद्धियों से भरी होती है । मुझसे हिंदी की दुर्दशा देखी नहीं गई और मैंने कमेंट्स लिख दिया - " 
आपके भावों की अभिव्यक्ति के लिए शब्द असमर्थ हैं । " पर अफसोस ! उन्होंने  लिखना बन्द नहीं किया और न ही उस पत्रिका ने छापना । 
           पड़ोसन के गाने के शौक ने हमें बड़ा परेशान किया था वो तो भला हो अपनी स्पष्टवादिता का , पूरे मोहल्ले को उनके आलाप से मुक्ति मिल गई अलबत्ता उसके दण्ड स्वरूप हमारे घर आने वाली स्वादिष्ट व्यंजनों की आवक बन्द हो गई और अपनी सत्यवादिता पर मुझे घरवालों की डाँट सुननी पड़ी । " तुमने ही सारे जमाने को सुधारने का ठेका लिया है क्या ? 
पर क्या करूँ , आदत से मजबूर हूँ  न चाहते हुए भी सच मुँह से निकल ही जाता है । झूठमूठ लोगों की तारीफ करना आता तो  सफलता की न जाने कितनी  सीढ़ियां  चढ़ जाती । अपनी कमियों के बारे में जानना कौन पसन्द करता है  । कबीर जी ने  निंदक को अपने आँगन में कुटी बनाकर रखने की सलाह दी थी परन्तु आजकल बुजुर्गों की सलाह कौन मानता है ।
     यह दिखावे की दुनिया है , कम करके अधिक दिखाना भी एक कला है । ऐसे लोग जल्दी फलते - फूलते हैं । दूसरों के किये कार्यों का श्रेय लेकर कई लोग मजे करते हैं और  काम करने वाले हमेशा बैल की तरह जुते ही रहते हैं , गाली भी खाते हैं । सच कह - कह कर मैंने बहुत सारे रिश्ते बिगाड़ लिये हैं , अब कोशिश करती हूँ कि जबान पर काबू रखूँ और सच बोलने से परहेज करूँ । झूठ बोल कर दूसरों को खुश करने का अभ्यास बदस्तूर जारी है ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़
          

Wednesday, 8 January 2020

भारत माँ की रक्षा करने

सीमा पर जाते सैनिक का अपनी पत्नी से संवाद
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भारत माँ की रक्षा करने ,
सीमा पर जाना तुम ।
दुश्मनों को मार भगाना ,
पीठ नहीं दिखलाना तुम ।

अपनी बाहों में कसकर ,
मुझको गले लगाना तुम ।
विदा करो हँसकर मुझको ,
आँख में आँसू न लाना तुम ।

सूरज को जब अर्ध्य करूँ तो ,
अपना हाथ लगाना तुम ।
रात में चन्दा को निहारूँ ,
अपनी झलक दिखाना तुम ।

फूलों का दीदार करूँ जब ,
यादों में महक जाना तुम ।
नींद अगर मुझको आये तो ,
ख्वाबों में मिलने आना तुम ।

दर्पण देख शृंगार करूँ जब ,
बिंदिया में छबि दिखाना तुम ।
माटी का कर्ज चुकाकर ,
पास मेरे लौट आना तुम ।
पास मेरे लौट आना तुम ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़