आँखों को खुशियों का छलकता शराब होने दीजिए ,
गालों को महकता हुआ सुर्ख गुलाब होने दीजिए ।
उम्र को सीमाओं की तंग गलियों में मत बाँधिये _
उन्मुक्त, स्वच्छंद जिंदगी को लाजवाब होने दीजिए ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़
आसमान में उड़ते बादलों की तरह भाव मेरे मन में उमड़ते -घुमड़ते रहते हैं , मैं प्यासी धरा की तरह बेचैन रहती हूँ जब तक उन्हें पन्नों में उतार न लूँ !
आँखों को खुशियों का छलकता शराब होने दीजिए ,
गालों को महकता हुआ सुर्ख गुलाब होने दीजिए ।
उम्र को सीमाओं की तंग गलियों में मत बाँधिये _
उन्मुक्त, स्वच्छंद जिंदगी को लाजवाब होने दीजिए ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़