Monday, 8 June 2020

गीत 3

कोकिल कंठी कूक उठी है , मौसम हुआ सुहाना है ।
मन के पावन तटबन्धों पर , सुंदर सपन सजाना है ।।

झंकृत हो उठी देह - तन्त्री , अधरों लिखा फसाना है ।
प्रेमभाव के अनुबंधों पर , हिय का लुटा खजाना है ।।

ख्वाबों के उड़ते पंछी ने , पाया नया ठिकाना है ।
प्रेमपूरित सरल हृदय में , अनुपम गेह बसाना है ।।

पद्मपुंज के सिंहासन पर , साजन तुम्हें बिठाना है ।
मिलने को आतुर नयनों को , तेरी राह बिछाना है ।।

उमड़ - घुमड़ रहे मोद अम्बुद , प्रेम धार बरसाना है ।।
पावक सम पावन बन्धन को , सातों जनम निभाना है ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

गीत 1

दया धर्म शुचि मानवता का ,
भाव हमें जो नित्य दिया ।
तुलसी , मीरा , संत कबीर ने ,
अनुपम वह साहित्य दिया ।

प्रबुद्ध , प्रगल्भ ,प्रभाकर ने ,
नव - जीवन का स्तुत्य किया ।
कर्मशीलता के भावों ने ,
जीवन को औचित्य दिया ।

साधु , सन्तों , उपासकों ने ,
 रीति , नीति  और सत्य दिया ।
भक्तिकाल के सरस भाव ने  ,
प्रचंड प्रखर पांडित्य दिया  ।

मर्यादा के आदर्श राम ने ,
 तप से देह आवृत्त किया ।
त्याग ,समर्पण की आभा ने ,
प्रभास सा लालित्य दिया ।

भक्ति  की पावनी गंगा ने ,
मानव को धर्म प्रवृत्त किया ।
सद्भावों की पुण्य सलिला ने  ,
 मानस  को  कृतकृत्य  किया ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Saturday, 6 June 2020

ईमानदारी का थर्मामीटर ( लघुकथा)

         स्वाति आज पहली बार सीमा के साथ बाजार गई थी ।  उसने देखा सीमा  कुछ चुनिंदा दुकानदारों से ही खरीदारी कर रही थी । उसके कई काम की चीजें उनके पास न होने पर  वह किसी और से वह सामान नहीं खरीद रही थी बल्कि उन्हें ही अगली बार मँगाकर रखने के लिए कह रही थी । स्वाति ने सीमा को किसी भी दूसरे दुकानदार से वह सामान खरीदने  को कहा तो उसने मना कर दिया यह कहकर कि वे ईमानदार नहीं हैं ।
   " थोड़ी देर में किसी का चेहरा देखकर तुम कैसे कह सकती हो कि यह ईमानदार है या बेईमान ?" स्वाति  ने अपनी शंका प्रकट करते हुए कहा । " मैं जान - बूझकर कई बार उन्हें दो - चार रुपये अधिक दे देती हूँ जो ईमानदार होते हैं वे  सच बताते हुए पैसे वापस कर देते हैं  , खोटी नीयत वाले चंद रुपयों के लाभ का मोह नहीं छोड़ पाते और ग्राहकों का विश्वास खो देते हैं । बस , यही है मेरा ईमानदारी परखने का थर्मामीटर "।स्वाति को भी भा गया था यह थर्मामीटर ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Tuesday, 2 June 2020

सजल

सजल
समांत - अ अती
पदांत - है
मात्रा भार - 20
मात्रा पतन - **
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स्त्री है नदी ,वह अविरल बहती है
 संस्कृति को साथ लेकर चलती है
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 पालती और  दुलारती है  सबको
 सीने में उसके  ममता पलती  है
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 देख नहीं सकती किसी को दर्द में
 पीड़ा में भी वह हँसती  रहती है 
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त्याग तप धैर्य की मूरत है नारी
परिवार के लिए सब दुख सहती है
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अपने बच्चों में भेद नहीं  करती  
  अनहोनी होने से  वह डरती है
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Friday, 29 May 2020

मुक्तक

आँखों को खुशियों का छलकता शराब होने दीजिए ,
गालों को महकता हुआ  सुर्ख गुलाब होने दीजिए ।
उम्र को सीमाओं की तंग गलियों में मत बाँधिये _
उन्मुक्त, स्वच्छंद  जिंदगी  को लाजवाब होने दीजिए ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे

दुर्ग ,छत्तीसगढ़

मजदूर

जीता है वर्तमान में सुखद भविष्य के सपने सजाता है ।
मजदूर है वह दुनिया को तरक्की की राह दिखाता है ।।

जूझता वह जीवन भर रोटी , कपड़ा , मकान के लिए ।
उसका खून - पसीना हरदम दूसरों के काम आता है ।।

बाँध देता नदियों को  , निर्मित करता बड़े - बड़े  पुल  ।
टाट का उसका झोपड़ा पहली बारिश में ढह जाता है ।।

खोदकर धरती को वह निकाल लाता कोयला , हीरा  ।
भूख , बेबसी, अभावों के अंधेरे से निकल नहीं पाता है ।।

उसके लिए नहीं हैं ये  सारे सुख - साधन , सुविधाएं ।
वह हवाई जहाज , कार ,आलीशान महल बनाता है ।।

बुनता है वह रंग - बिरंगे रेशमी  धागों के ताने- बाने ।
चीथड़ों में पलते  बच्चे , पैबन्दों में जीवन बिताता है ।।

हाहाकार मच जायेगा दुनिया में उसके न होने पर ।
पर उसकी दयनीय दशा पर  आँसू कौन बहाता है ।।

ईमानदारी उसके सीने में परिश्रम उसके माथे पर ।
थक जाता  पर कभी न मेहनत से  जी चुराता है ।।

मजदूर के खुरदुरे हाथों में केवल हैं  कर्म की  लकीरें  ।
काँटों में खुद रहता पर गुलशन में फूल खिलाता है ।।

दुनिया खड़ी कर्मशील मजदूर के मजबूत कंधे पर ।
नाली के कीड़े सा घिसट वह जीता और मर जाता है ।।


स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़








Wednesday, 27 May 2020

सजल

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सजल
समांत - आर
पदांत -  नही
मात्राभार - 16
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जीवन इतना दुश्वार नहीं 
मंजिल सीमा के पार नहीं 

लेने देने की बात न कर
यह प्यार कभी व्यापार नहीं 

राहें बहुतेरी जीवन में
रोने में कुछ भी सार नहीं 

अपमान बड़ों‌‌ का ‌कर पाएँ
अपना तो‌ यह संस्कार नहीं

चलने से इंकार किया है/ साथी बनने इंकार किया 
छोड़ा तुमको मझधार नहीं

स्वरचित -  डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़
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