Saturday, 13 May 2017

अब हमारी बारी


माता - पिता हमें जन्म देते हैं
हमें पालते हैं , शिक्षा देते हैं ।
अपना सुख - दुख भूल जाते हैं,
हमारी हर ख्वाहिश पूरी करते हैं।
अपनी खुशियों को होम कर देते हैं
ताकि हम खुश रहें , आगे बढ़ें ।
वो कर्ज लेते हैं हमारी पढ़ाई के लिए ,
फिर जिंदगी भर उसे चुकाते रहते हैं ,
अपनी इच्छाओं को मार के ।
उनके दिल को कितनी भी चोट लगे,
पर वो हमें नही रोकते दूर जाने से ।
उनकी दुनिया में कितने भी अंधेरे हों,
वो हमें उजाले देना चाहते हैं ।
बच्चों का भविष्य ,
जिसके लिए वो इतना त्याग करते हैं ,
बनने के बाद , हम क्या करते है ,
अपनी एक अलग दुनिया बसा लेते हैं।
उन्हें छोड़ देते हैं जिन्होंने  ,
हमारी परवरिश को अपने
जीने का उद्देश्य बनाया  ।
हम इतने स्वार्थी क्यों हो जाते हैं ?
क्यों नहीं अब हम ,
अपनी जिम्मेदारी निभाते ।
अब बारी हमारी है ,
उनका हाथ थामने की ।
उनकी देखभाल करने  की ,
उनके लिए  समय निकालने की ।
उनका सहारा बनने की ,
उनके लिए थोड़ा सा त्याग करने की ।
उनको समझने की ,
उन्हें खुशियाँ प्रदान करने की ,
जिसके वे हकदार हैं  ।।

स्वरचित - डॉ . दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़
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Thursday, 11 May 2017

ढाल (लघुकथा )

ढाल ( लघुकथा )
 
    शर्मा जी के बेटे की नई - नई शादी हुई थी । खूब ढूढ़ के बहु लाये  थे  शर्माजी और उनकी पत्नी जानकी जी ।
पढ़ी -लिखी , नौकरी करने वाली , हर काम में चुस्त ।
पर जानकी जी को उसकी एक आदत बिल्कुल अच्छी
नहीं लगती , टपर - टपर बोलती बहुत है । उसको कुछ
बोल दो , बात को ठहरने भी नहीं देती , तुरन्त जवाब देती
है ।
      कुछ समय बाद शर्मा जी के  बड़े भाई के बेटे की शादी थी । उन्होंने अपनी हैसियत के हिसाब से बढ़ - चढ़
कर ही खर्च किया था ,लेकिन औरतों को सन्तुष्टि कहाँ
मिलती है , मेहमानों के सामने जेठानी जी जानकी को
मनमाना सुनाने लगीं । बेचारी जानकी , थोड़ी सीधी थी,
ऊपर से जेठानी का रोब ,चुपचाप सब सुन रही थी । पता
नहीं कहाँ से सुन रही बहु वहाँ आ पहुँची , और उसने अपनी सास का पक्ष लेते हुए जो खरी - खरी अपनी बड़ी
सास को सुनाई ,तो उनकी सिटी - पिट्टी  गुम हो गई और वह चुप हो गई । आज  पहली बार बहु का बोलना   सास को नहीं अखर रहा था ...वह ढाल जो बन गई थी अपनी
सासु  माँ के लिए ।
     स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

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छत्तीसगढ़ की संस्कृति में पर्यावरण चिंतन

         छत्तीसगढ़ की परम्पराएं , तीज - त्योहार में
पर्यावरण चिंतन स्पष्ट परिलक्षित होता है ।मनुष्य
सदा से प्रकृति प्रेमी रहा है , प्रकृति से उसका जुड़ाव
चिर काल से रहा है । जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत उसकी
हर  क्रियाकलाप में प्रकृति शामिल होती है । शायद
इसीलिए  मानव संस्कृति में अनायास ही प्रकृति जुड़ी
हुई है ।धर्म और परम्पराएं इस सम्बंध को और भी
मजबूत करती हैं ।
            प्राचीनकाल से ही बरगद , पीपल , आँवला ,
तुलसी इत्यादि पौधों की पूजा करने की प्रथा है अतः
घर - घर में ये उपयोगी पौधे पाये जाते थे । आँवला
नवमी में आँवला पेड़ के नीचे सामूहिक भोजन करने
की परम्परा थी , जो जीवन में वृक्षों का महत्व बढाने
के साथ - साथ सामुदायिकता की भावना का भी प्रसार
करती थी ।
           हरेली में घर - घर नीम की टहनी खोंसना , वट-
सावित्री पूजन में बरगद वृक्ष का महत्व , अमावश्या व
पूर्णिमा में पीपल के पेड़ में पानी डालना इत्यादि परम्पराएं  प्रकृति के महत्व को प्रतिपादित करती हैं ।
प्रत्येक कथा - पूजन में दूब , आम के पत्तों , केले की पत्तियों का प्रयोग किया जाता है । दशहरे में रावण
मारने के बाद सोनपती बाँटना , पान खिलाना जीवन
को प्रकृति के अधिक करीब लाता है ।
          हमारी परम्पराएं , रीति - रिवाज वृक्षारोपण एवं
उनके संरक्षण को प्रेरित करते हैं । सावन के माह में पेड़ों पर झूले डालना मन की उमंगों से हरीतिमा को
जोड़ता है । पुष्प घर की सजावट के साथ - साथ पूजन
के लिए भी आवश्यक हैं ।वसंत पंचमी के दिन टेशू के
फूल के द्वारा पूजन की जाती है । विविध त्योहारों में
विविध पुष्पों का प्रयोग किया जाता है , इस प्रकार
न जाने कितने पौधे लगाने की प्रेरणा दी जाती है ।
     कहावतों व मुहावरों में भी पर्यावरण चिंतन दिखाई
पड़ता है । पाप - पुण्य का डर पैदा करना भी वृक्षों के
संरक्षण का एक तरीका था ।
   " बर काटे ले ब्रह्म राक्षस , पीपर काटे ले चंडाल ।
      मऔरे आमा ल काट दीहि त पर जाहि अकाल ।"
  अर्थात बरगद के पेड़ को काटने वाला ब्रह्म - राक्षस
बन जाता है और पीपल काटने वाला चंडाल बन जाता है , किसी ने बौर लगे हुए आम को काट दिया तो अकाल पड़ने की सम्भावना है ।
         प्राकृतिक आपदा या बीमारी का डर दिखाकर ,
धर्म के लिए आवश्यक जानकर लोग पर्यावरण को सुरक्षित रखें , जीव - जंतुओं को भी जीने दें ,  परम्पराओं में इन्हें जगह देने के पीछे प्राचीन समय में
यही सोच रही होगी । विवाह , मृत्यु , उपनयन इत्यादि
विविध संस्कारों में  पौधे व जीव - जंतुओं को महत्व
दिया गया है ।जल , वायु , अग्नि  ,पवन , धरती को
ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर इनकी पूजा की जाती है।
खाना बनाने से पहले चूल्हे को गोबर से लीप कर
सुलगाया जाता था ,खाना बनने के बाद भोजन का
थोड़ा सा भाग अग्नि को समर्पित किया जाता था ।
         नदी में पैर रखने से पहले उन्हें प्रणाम किया
जाता था, नदी में मल - मूत्र विसर्जित करना पाप
माना जाता था।
      सोकर उठने के बाद धरती पर पैर रखने के पूर्व
उन्हेंप्रणाम किया जाता था । नदियों के संगम पर मेला ,
मड़ई भरना  नदियों के प्रति अपने सम्मान को प्रदर्शित
करने का ही एक तरीका  है ।
        पोला में हल - बैल की पूजा की जाती है , गांवों
में तालाब खुदवाना , पेड़ लगाना , धर्मशाला बनवाना
बहुत बड़ा पुण्य का कार्य माना जाता था  । अब भी
गांवों में यह रिवाज प्रचलन में है । खेत आज भी किसान के लिए पूज्यनीय है । सुआ और राउत नाचा
के हानों में अब भी प्रकृति से सम्बन्ध स्पष्ट परिलक्षित
होते हैं ।
           इनमें से कुछ परम्पराएं  अब प्रचलित नहीं हैं ,
कुछ अपना अस्तित्व बचाये हुए हैं । तालाब अब भी
गांवों में दैनिक कार्यों को निपटाने  के प्रमुख स्रोत हैं ।निरन्तर घटते जा रहे भू- जल स्तर को  बनाये रखने
का एक नायाब  तरीका है , तालाबों का संरक्षण । प्रदूषण से राहत पाने के लिए वृक्षारोपण करना और उनका सरंक्षण करना आज अत्यंत महत्वपूर्ण है ।
हमारे बुजुर्गों ने हमें जो संस्कार दिए थे उन्हें भूलने का ही यह दुष्परिणाम है । मनुष्य को अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए पर्यावरण को सुरक्षित रखना
होगा क्योंकि उनसे हम हैं और हमसे वो , हमारी संस्कृति हमसे यही अपेक्षा रखती है ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

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Tuesday, 9 May 2017

* सफलता की कुंजी सृजनशीलता *

     रुचि की अभिव्यक्ति या सृजनशीलता मानव - मन
को न सिर्फ पोषित करती है वरन उसे पीड़ा , तनाव से
दूर एक स्वच्छ , सुन्दर दुनिया में ले जाती है जहाँ सुर-
ताल हैं , अनोखे रंग हैं , कल्पनाओं के सजीव चित्र हैं ,
अद्भुत भाव - विचार हैं । यदि  सृजनशीलता बनी रहेगी
तो जीवन के प्रति सकारात्मकता बनी रहेगी ।
             रुचि के लिए सीखा  हुआ कार्य कई बार हमें
हताशा के अंधेरे से बाहर निकलने के लिए उजाले का
भी कार्य करता है । शादी के पन्द्रह वर्षों बाद दीपा के
पति की नौकरी छूट गई , क्योंकि उसके पति जिस कागज के कारखाने में काम करते थे , वह बन्द हो गया । उनके सामने एक बहुत बड़ी समस्या आ खड़ी हुई थी। दीपा को शादी से पहले सीखा हुआ ब्यूटीशियन का
पाठ्यक्रम याद आया । घर के एक कमरे से ही ब्यूटी
पार्लर की शुरुआत की । धीरे - धीरे स्थिति सुधरी । आज उसने पार्लर में सभी सुविधाएं जुटा ली हैं । दीपा की मदद से उसके पति ने भी घर पर बेकरी की दुकान
खोल ली है । अब प्रत्येक माह उनकी अच्छी आय होती
है ।
       अनिल और  निशा ने प्रेम विवाह किया था । उनका संयुक्त परिवार था । वर्षों बाद बंटवारा  हुआ
तो जिस दुकान के पीछे अनिल ने जीवन भर मेहनत
की , वह चाचा के हिस्से में चली गई । वे बहुत ही कठिन
दिन थे । आधे रास्ते पर आपको  मालूम न हो कि जाना
कहाँ है , व्यक्ति अकिंचन हो जाता है । ऐसे वक्त में निशा ने उसे सम्भाला । घर पर बुटीक का काम शुरू किया । धीरे - धीरे उसी बुटीक ने एक बड़े दुकान का
रूप ले लिया । अब पति - पत्नी , दोनों बेटे भी मिलकर
दुकान को संभाल नहीं पाते । उन्हें कई नौकर रखने पड़े। अब भी उस समय को याद कर कांप जाते हैं वे
दोनों , परन्तु वही बुरा वक्त उन्हें वह आत्मविश्वास ,
सम्बल दे गया जिसके सहारे वे पूरी ज़िंदगी बिता सकते
हैं । बुरे वक्त में कोई काम आए न आए अपना हुनर , अपनी मेहनत ही काम आती है ।
               सीखा  हुआ हूनर कभी बेकार नहीं जाता ।
शौक के लिए सीखी गई कला ने दीपा व निशा को जीने
की एक नई राह दिखाई । आज भी कई महिलाएं घर पर ट्यूशन पढ़ा कर घर की आर्थिक स्थिति  को सुदृढ़ता
प्रदान कर रही हैं । हमें अपने आस - पास इस तरह के
हजारों उदाहरण मिलेंगे जब एक बिखरते घर को अपनी
हिम्मत , कला , शिक्षा से एक स्त्री ने  संभाला । कला बुरे वक्त में काम आने वाले आभूषणों की तरह है  , प्रत्येक स्त्री के पास यह धन होना ही चाहिए । प्रत्येक
माता - पिता को अपनी बेटी को  शिक्षा के साथ सृजन-
शीलता की ओर अवश्य प्रेरित करना चाहिये । उनकी
रचनात्मकता व प्रतिभा को फलने - फूलने का अवसर
प्रदान करना चाहिये ।
            संगीत व कला मन को एक नई ऊर्जा से लबरेज कर देते हैं। जीवन को तनाव व निराशा के अंधेरे
से बाहर खींच लेते हैं और जीने की नई उमंग पैदा करते है । मेरी एक चाची के दोनों बेटे अमेरिका में बस गये हैं
सेवानिवृत्त चाचा जी की अपनी व्यस्त दिनचर्या है - दोस्तों की महफ़िल , पढ़ने का शौक । परन्तु चाची
रसोई का काम खत्म करके  बोर होती । वह अकेलेपन के अवसाद से कुंठित सी हो गई थी । एक दिन बगीचे की बुरी हालत देखकर उसकी सफाई में जुटी तो बागवानी का पुराना शौक बाहर आ गया । दूसरे दिन बाजार जाकर ढेर सारे बीज व फूलों के सुंदर पौधे ले आई । अपने बगीचे की साज - सँवार में वे इतनी व्यस्त हो गई कि अन्य कार्यों के लिए उन्हें समय निकालना पड़ता है । अकेलेपन की पीड़ा , तनाव कब उड़न - छू हो गया , उन्हें पता भी नहीं चला ।
           इसी प्रकार कई लोगों को मैंने जीवन की सारी
जिम्मेदारियां पूरी कर लेने के बाद संगीत सीखने , लेखन कार्य , चित्रकला इत्यादि  शौक पूरा करते देखा
है । हम अपने दिल में  अनेक ख्वाहिशें  संजोकर रखते
हैं । जीवन की व्यस्तता हमें उन्हें पूरा करने का अवसर
नहीं देती और जब वक्त होता है तो हमारा संकोच ,
आलस्य या लगन  की कमी हमें आगे बढ़ने से रोक देते
हैं । जब भी अवसर मिले हमें अपनी सृजनशीलता या
शौक को अवश्य पूरा करना चाहिए । इससे हमारे मन
को सन्तोष , सम्पूर्णता व सच्ची खुशी मिलती है ।

       स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़
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Monday, 8 May 2017

सन्तुलन

मेरी दादी अक्सर मुझे अपने समय की बातें सुनाया
करती थीं , उस समय के रहन - सहन , खान - पान की तुलना आज से करके अपनी नाराजगी भी जाहिर करतीं थीं । पर हाँ , वर्तमान की अच्छी बातों की तारीफ करना भी वह नहीं भूलती थी । उन्हें सलवार - कुर्ता बहुत भाता था ,कहती हमारे समय मे ये नही मिलता था वरना मै जरूर पहनती । मैं उनसे मजाक किया करती कि दादी अब भी पहन सकती हो।वृद्धों को अपना अतीत बहुत
याद आता है क्योंकि वे तब समृद्ध थे । उसी प्रकार युवा
हमेशा अपने भविष्य के बारे में सोचता है,सपने देखता है , अधिक अच्छा करने के बारे मे सोचता है। वृद्ध वर्तमान में अतीत देखते हैं और युवा अपना भविष्य ,यानी कि अपने वर्तमान से कोई सन्तुष्ट नहीं रहता ।आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसीलिए वर्तमान को सुधार काल कहा है  क्योंकि हम असन्तुष्ट रहते हैं तो सुधारने  का प्रयास
करते हैं , सन्तुष्ट हो गए तो कोई बदलाव लाने की बात
क्यों सोचेगा । दूसरी तरफ सन्तोष को सबसे बड़ा धन
कहा जाता है -
   गौ धन , गजधन ,बाजिधन ,और रत्न धन खान।
    जब आवे सन्तोष धन, सब धन धूरि समान।।
             असन्तोष सुधार को जन्म देता है , विकास की
ओर अग्रसर करता है , वहीं विकास की अंधी दौड़ में भागते मनुष्य को नियंत्रित करने का काम करता है संतोष
जिस प्रकार घोड़े की गति की नियंत्रित करने के लिए
लगाम जरूरी है। मनुष्य के चंचल चित्त को नियंत्रण में
रखना जरूरी है , वरना वह बेलगाम घोड़े की तरह इधर - उधर  भागता  है  सही गलत की परवाह किये बिना ।धर्म यही काम करता है , इंसान को बुराई की ओर जाने से
रोकने का काम करता है ,मनुष्य के मन में किसी बात का
डर होता है तो वह कुछ गलत करने से डरता है चाहे वह
डर समाज का हो या पाप - पुण्य का।
                कहने का अर्थ यह है कि किसी भी चीज की
अति उचित नहीं है । आगे बढ़ने के लिए सुधार होते रहना
जरूरी  है तो जीवन  में सुख और शांति के लिए सन्तुष्ट
रहने की भी उतनी ही आवश्यकता है । जीवन में संतुलन
होना चाहिये ,न ही सब कुछ पाने की भागमभाग में शामिल होइए , न ही  वैराग्य धारण कर बैठ जाइए।
                  
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छ . ग.
   
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* सिरहाने पर बैठी माँ * (संस्मरण )


  
         उस रात मेरे बेटे को बहुत बुखार था । आधी रात को उसके सिरहाने पर बैठी मै उसके माथे की पट्टियां बदल रही थी .. अनायास ही माँ याद आ गई । तीज के अवसर पर इस बार मेरा मायका जाना मुश्किल था क्योंकि मेरा गर्भावस्था का आठवां माह चल रहा था ।भैया के घर पर माँ  भिलाई आ गई थी और मैं भी वहाँ
आसानी से पहुँच गई ।  उस रात मै  बहुत बेचैन थी ,नींद न आने के कारण बिस्तर पर करवटें बदल रही थी ।तब मां को पीलिया हो गया था ,वह स्वयं बीमार थी पर मुझे
तकलीफ में देखकर पता नहीं कब वह मेरे सिरहाने बैठ
कर मेरा  सिर सहला  रही थीं ।मेरे बगल में लेट कर वह
मेरी  पीठ सहलाती रहीं ,पता नहीं कब मुझे नींद आ गई।
           सुबह उठकर देखा तो वह पूरा खाना बनाकर
मेरे उठने का इंतजार कर रही थीं ।उस के दो दिनों बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया और फिर वहाँ से
वह वापस नहीं आई। मां चिरनिद्रा में लीन हो गई थीं।
वह रात उनके साथ मेरी आखिरी रात थी ।मां ऐसी ही होती है ,अपने बच्चे की सारी तकलीफ वह अपने हिस्से में ले लेती है और अपनी सारी खुशियाँ बच्चे के नाम कर देती हैं। आज भी अपनी तकलीफों में मैं मां को अपने आस - पास महसूस करती हूँ मानो कह रही हों - सो जाओ , सब ठीक हो जाएगा  और अपने सारे दुःख - दर्द , तकलीफें उन्हें सौंप कर मै  निश्चिंतता की नींद सो जाती हूँ  । अब समझ में आया है सिरहाने पर बैठी मां के मायने है बच्चे के लिए सुकून भरी नींद ।।

          स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़
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Friday, 5 May 2017

सामाजिक समरसता में हमारा योगदान

               मेरे हाथों में गुब्बारे देखकर मेरी पड़ोसन
चौक कर बोली - " अरे ! अभी तो आपके बच्चे अपने
मामा के घर गए हुए हैं , ये गुब्बारे किसके लिए ? "  ' उस बच्ची के लिए '-  गुब्बारे बेचने वाली लड़की की
तरफ मैंने इशारा किया तो उन्हें मेरी बात समझ में नहीं
आई ।
         मेरे  पिताजी जब भी सफर से लौटते , उनके बैग
में चॉकलेट , मूँगफली , चना , मटर की पुड़ियाएँ भरी
रहतीं , जबकि वे रास्ते में कुछ भी नहीं खाते थे । पूछने
पर कहते - ' उनकी आजीविका मुसाफिरों पर निर्भर है ,
थोड़ा  सा खरीदकर मै भी अपने हिस्से की जिम्मेदारी
निभा लेता हूँ ।'
                 शोभा पिछले पंद्रह मिनट से रिक्शेवाले से
मोल - भाव कर रही थी । आखिर पाँच रुपये कम करा
कर ही वह रिक्शे पर चढ़ी , उसके चेहरे पर अब संतोष
झलक रहा था । यह वही शोभा है , जो  साड़ियों और
सौंदर्य प्रसाधनों पर प्रत्येक माह हजारों रुपये आसानी
से खर्च कर देती है ।
                    प्रत्येक नवरात्रि पर 1001 रु. की घृत -
ज्योति मन्दिर में जलवाने वाले श्रीवास्तव जी की जेब
से किसी भी  लाचार के लिए एक रुपया तक नहीं
निकलता है । हमारी कॉलोनी में रहने वाले कई लोग बाई ,चौकीदार , रिक्शावाला , दूधवाले  को समय पर कभी पारिश्रमिक नहीं देते हैं । चार बार चक्कर लगाने के बाद ही उन्हें पैसा मिलता है । किराना स्टोर वाले गुप्ता जी  कभी भी अपने नौकरों को समय पर उनका वेतन नहीं देते , जबकि एक और व्यवसायी राजेश आहूजा उनके ठीक विपरीत हैं । वे न सिर्फ उन्हें समय पर वेतन देते हैं, बल्कि जरूरत पड़ने पर अपने कामगारों की भरपूर  मदद भी करते हैं ।
              आपने भी अपने आस - पास ऐसे कई उदाहरण देखे होंगे और महसूस भी किया होगा कि
अपनी शानो - शौकत और वैभव का प्रदर्शन करते
लोग   हजारों रुपये निःसंकोच फूँक देते हैं , लेकिन
छोटे - मोटे खर्चों को कम कराने में कोई झिझक
महसूस नहीं करते । ये छोटे कामगारों , कारीगरों ,
मजदूर ,  रिक्शावाले , गुब्बारे , फूल , ठेले खोमचेवाले
सब्जीवाले , दर्जी , मोची इत्यादि जो बड़ी मेहनत
कर अपनी रोजी - रोटी कमाते हैं , इन्हें उनका हक
देने में इन लोगों को अफसोस होता है जबकि शॉपिंग
मॉल में , कपड़ों की बड़ी दुकानों में , सौंदर्य - प्रसाधनों
में , ब्यूटी - पार्लरों में खर्च करने में थोड़ा भी अफसोस
नहीं होता , यहाँ एक रुपया कम कराना इनकी शान
के खिलाफ हो जाता है ।
              समाज विभिन्न वर्गों और स्तरों में बंटा हुआ
है । राष्ट्र के निर्माण में सबकी भूमिका समान होती है।
यहाँ कोई अपने कुत्ते पर इतना खर्च कर देता है , जितने
में एक गरीब परिवार को दाल - रोटी मिल जाए  तो किसी को दो वक्त का खाना जुटाना भी मुश्किल हो जाता है । हम इसी समाज के अंग हैं और एक - दूसरे
से सम्बद्ध हैं , आर्थिक वैषम्य की खाई को पाटने का
दायित्व हम सबका है ।
                मूँगफली या चने खरीदने के लिए पाँच रुपये
खर्च कर देना एक व्यक्ति के लिए बड़ी बात नहीं होती ,
लेकिन यही रुपये जमा होकर एक कुटुम्ब का पेट भरते
हैं । अपनी आवश्यकता के साथ ही इनके प्रति सहयोग
की भावना होना समाज की उन्नति के लिए लाभप्रद होगा । अपाहिज , लाचार लोगों से यदि हम ही मुँह फेर
लेंगे तो  कौन उनकी  मदद करेगा , जहाँ तक  सम्भव हो, लोगों की मदद का जज़्बा मन में बनाये रखें । ऐसे
ही प्रयासों से दुनिया चल रही है और चलती रहेगी ।
                   यदि अपने वैभव - प्रदर्शन पर होने वाले
खर्च का एक प्रतिशत भी हम इन जरूरतमंदों के लिये
रखते हैं तो वह एक बहुत बड़ा अंशदान होगा । सामाजिक समरसता बनाये रखने में हर व्यक्ति को अपना योगदान अवश्य देना चाहिये । यदि  ऐसा हुआ
तो 'वसुधैव कुटुम्बकम ' का सपना साकार हो जाएगा
और आर्थिक विषमता दूर होगी । अपने  मन की
संकीर्णताओं की बेड़ियाँ तोड़ेंगे तो हर व्यक्ति के लिए
इसमें बहुत जगह है । हम भी अपना जीवन स्तर सुधारें
और अपने साथ - साथ दूसरों के बारे में भी सोंचें । सभी
को साथ लेकर आगे बढ़ें तभी देश और  विश्व सही
मायने में विकसित होगा । खुशहाल जनता ही एक
विकसित राष्ट्र की पहचान होती है । तो समाज की
उन्नति के लिए अपना योगदान दें और सच्ची खुशी का
आनंद लें । अपने सहयोग की चमक से किसी का जीवन रोशन करें । आपको इसी जन्म में जन्नत पा लेने का अहसास होगा ।
                        स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे ,दुर्ग ,छ. ग.
           
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