Saturday, 10 June 2017

आपकी बाहों में

मेरा सपना हुआ साकार ,
भूल गई बाबुल का प्यार ,
सिमट गया मेरा संसार ,
आपकी बाहों में.....।
सारे बन्धन तोड़ कर ,
जीवन के हर मोड़ पर ,
पाया मैंने प्यार ही प्यार ,
आपकी बाहों में .....।
दर्द के लगे पहरे ,
छाये जब गम के कोहरे ,
पाया स्वच्छ बृहद आकाश ,
आपकी बाहों में .....।
सम्पूर्ण हुआ जीवन ,
महक उठा तन - मन ,
आई एक नई  बहार ,
आपकी बाहों में .....।
पुलकित हुआ यौवन ,
प्रेम रस भीगा आँगन ,
कर लिया अनूठा श्रृंगार ,
आपकी बाहों में .....।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़
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सफ़र में

मुश्किल हों हालात ,
भाव भरे जज़्बात ,
कुछ न हो अपने हाथ ,
बहता चल , जीवन के लहर संग बहता चल ।
उलझे लम्हों को काटता,
सूझे न कोई रास्ता ,
मिला न कोई साथ ,
चलता चल ,जीवन की डगर मे चलता चल।
अंधेरे घनघोर बड़े ,
बाधाएं  राहों में खड़े ,
उम्मीदों के दीप जला ,
जलता चल , राहों को रोशन करता चल ।
अपनों का साथ ले,
दुःखो  को बाँट ले ,
हौसलों की बाँह थाम ,
सम्भलता चल ,औरों को सहारा देता चल ।
मन के हारे हार है ,
मन के जीते जीत ,
मन को ऐसा साध ले ,
फूटे विजय -संगीत , गाता चल ,गुनगुनाता चल ।
डूबकर समंदर में ,
मोती ढूंढ निकाल ,
उदासी के भँवर से ,
बाहर निकल ,मुस्कुराता चल ,हँसाता चल ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे ,दुर्ग , छत्तीसगढ़
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Thursday, 8 June 2017

आलेख- ***क्योंकि टूट कर पत्ते हरे नहीं होते

      समाज की धुरी होता है परिवार और परिवार का
केन्द्र होती है महिला । परिवार में रिश्तों की डोर को
मजबूत बनाये रखने में घर की स्त्रियों की विशेष भूमिका होती है , यदि  वह  लापरवाह हो जाये तो
परिवार को  बिखरते देर नहीं लगती । रिश्तों को जोड़ने
वाला प्रेम का धागा बड़ा नाजुक होता है । जरा सी
असावधानी से इसे टूटते देर नहीं लगती , यानी सावधानी हटी , दुर्घटना घटी । अर्थात सामाजिक
संरचना में रिश्तों का महत्वपूर्ण स्थान है । प्रेम के महीन
रेशों से बुने ये रिश्ते अत्यंत नाजुक होते हैं । भाई , बहन ,दोस्त , पति- पत्नी , चाचा , मां इत्यादि रिश्तों
का रुप चाहे जो भी हो , ये सभी विश्वास , आदर ,ईमानदारी एवं समर्पण की मांग करते हैं ।
रिश्तों की इस बेल को स्नेह , त्याग  एवं विश्वास के
जल से सींचना अनिवार्य है , नहीं तो  यह असमय
ही मुरझा जाती है ।
          कई बार वर्षों के प्रेम संबंध छोटी -छोटी बातों,
गलतफहमियों या अफवाहों के कारण टूट जाते हैं ।
बहुत ही सोच - समझ कर , सही - गलत का परीक्षण
कर संबंध तोड़ना चाहिये क्योंकि एक बार सम्बन्ध
खराब हो गए तो फिर वह मिठास वापस नहीं आती ।
कवि रहीम ने इसी बात पर कहा है -
  "  रहिमन धागा प्रेम का , मत तोड़ो चटकाय ।
    टूटे से फिर ना जुरे ,जुरै गाँठ पड़ जाय ।।"
          प्रेम के तारों में गुँथे रिश्तों को बहुत ही सहेजकर
रखना चाहिये , उतावलापन इन सम्बन्धों के लिए  घातक है । कुछ बिंदुओं पर गौर करें -
   मर्यादित हो व्यवहार -
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         विनीत और नीलेश बहुत अच्छे दोस्त थे । बातों
ही बातों में एक बार विनीत ने नीलेश के परिवार के
सम्बन्ध में अमर्यादित टिप्पणी कर दी , जिससे वह
आहत हो गया और उसने विनीत से मिलना , बात
करना बंद कर दिया ।
        प्रगाढ़ सम्बन्धों में खुलापन और बेतकल्लुफ
होना गलत नहीं है , लेकिन वह मर्यादा की सीमा में
होना चाहिये । बड़ों का आदर ,  स्त्रियों की निजता
में खलल नहीं पड़नी चाहिये । मजाक में भी किसी
की भावना आहत न हो , इसका हमें ख्याल रखना
चाहिये ।
एक -  दूसरे  की भावना का आदर करना -
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        कोई बात हमें अच्छी लगती है , जरूरी नहीं
कि वह सभी को अच्छी लगे । दूसरों के विचारों ,
भावनाओं का आदर करके हम उनके दिल में जगह
बना सकते हैं  और अपने सम्बन्धों को मजबूत
आधार प्रदान कर सकते हैं ।
  सहयोग की भावना -
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      सम्बन्धों के मायाजाल में कई तरह के लोग होते
हैं । रिश्तों की कसौटी तो विपरीत परिस्थितियों में ही
होती है । खुशियों में साथ देने वालों की कमी नहीं रहती
लेकिन दुःख में हमारा साथ दे , वही सच्चा दोस्त/सम्बन्धी होता है । सहयोग की भावना किसी भी रिश्ते
को प्रगाढ़ता में बदल देती है ।
  चुगलखोरों से बचें -
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    निशा  , यामिनी और रीना तीनों की खूब जमती थी ।
एक बार रीना ने गुस्से में निशा के समक्ष यामिनी के
बारे में कुछ गलत कह दिया । बाद में उसे अपने कथन
पर पछतावा हुआ लेकिन तब तक निशा यामिनी को
वह बात बता  चुकी थी । इस कारण रीना और यामिनी
के सम्बन्धों में दरार उत्पन्न हो गई । कुछ लोग इधर की
बातों को उधर करके लोगों के बीच गलतफहमियां पैदा
करते हैं । ऐसे लोगों को नजरअंदाज करना चाहिए  क्योंकि आवेश में व्यक्ति भले ही कुछ बोल दे , पर मन
शांत होने पर उसे अपनी गलती पर पछतावा होता है।
   सहना भी सीखें -
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      प्रेमपूर्ण सम्बन्धों में दोनों पक्षों को कुछ समझौते
करने पड़ते हैं । एक - दूसरे की अपेक्षाओं को पूरा
करना पड़ता है । सिर्फ अपना लाभ देखना रिश्तों के
बीच तनाव उत्पन्न कर सकता है । सीमा ,घर की
व्यवस्था न बिगड़े ,यह सोचकर अक्सर अपने घर पर
कोई भी कार्यक्रम करने में  टाल - मटोल करती रहती
थी , लेकिन उसके इस स्वभाव ने उसे दोस्तों , रिश्तेदारों
से दूर कर दिया ।
   जुलाहा जब कपड़ा बुनता है , उसके ताने - बाने में
हमें कोई गिरह या गांठ महसूस नही होती । जबकि
उसने कितने धागे जोडे होते हैं , हम रिश्तों का ऐसा
ताना - बाना क्यों नहीं बुन सकते जिसमें कोई गांठ न
हो । हमारे सम्बन्धों के ताने - बाने गाँठरहित होंगे तो
अधिक मधुर  , चिरस्थायी एवं आनंददायक रहेंगे ।
     प्रेम के धागों से बंधे इन रिश्तों को चाहिए - थोड़ी
सी देखभाल और विश्वास , फिर इनके टूटने का कभी
भय नहीं होगा । सम्बन्धों को आसानी से न टूटने  दें ,
इनका उचित उपचार करें , भरसक प्रयास करें उन्हें
चिरस्थायी बनाए रखने का । कहा भी गया है -
" सोचकर कोई ताल्लुक तोड़ना ,
  क्योंकि टूटकर पत्ते हरे नहीं होते ।"

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़
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Monday, 5 June 2017

* मत फाड़ो हरियाली की चादर *

नम आँखों से देख रही थी मैं ,
स्कूल प्राँगण के सामने कटता हुआ ..
वह विशाल आम का पेड़  ...
या टूटते  हुए कई परिवार  ।
उसकी गिरती शाखाएँ ,
कर रही थीं चीत्कार ।
जैसे माँ से बिछड़ा बच्चा ,
रो रहा हो जार - जार ।
रह - रह कर गिरते पत्ते ,
रोते और बिलखते ।
मुँह छुपा कर धरती में ,
ढूंढ रहे आधार ।
टूटा वह चिड़िया का घोंसला ,
गिरे कुछ अंडे , दो बच्चे ।
माँ गई होगी लाने दाना ,
यहाँ खाक हुआ आशियाना ।
नहीं आयेंगे कौए , तोते ,
अब न होगी छाँव की ठंडक ।
नहीं हो पाएगी अब यहाँ ,
चिड़ियों की भी बैठक ।
थके - हारे पथिक ,
ढूंढेंगे एक अदद छाँव भी ।
भौतिकता की अंधी दौड़ से ,
अछूते न रहे गाँव भी ।
कटते जा रहे पेड़ निरन्तर ,
बढ़ रहा आबादी का कहर ।
फैलता जा रहा सर्वत्र ,
गन्दगी व धुंए का जहर ।
कृत्रिमता ओढ़ने के लिए ,
मत फाड़ो हरियाली की चादर ,
नहीं तो पछताओगे ।
प्राप्त कर ली सारी सुविधाएं ,
गाड़ी , कपड़े ,घर....
खड़े कर लिए बड़े - बड़े कारखाने..
लेकिन ...
साँस लेने किधर जाओगे ।
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

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Thursday, 1 June 2017

गुमनाम सी मोहब्बत

गुमनाम सी मोहब्बत पर ,
अंधेरों का साया है ।
ख्वाहिशों की कब्र को ,
आँसुओं  से सजाया है ।
न रसमें  हैं , न कसमें हैं ,
न रिश्तों का बन्धन है ।
अनकही बातों को,
लबों पे ठहराया है ।
न बातें हैं , न वादे हैं ,
न शिकवे हैं , न  शिकायतें ,
बस नजरों ने मिलकर,
एक अफ़साना बनाया है ।
थोड़ी सी फिक्र है,
एक - दूजे का थोड़ा ख्याल है ।
खामोश  सरगोशियों  ने ,
अपनापन बढ़ाया है ।
न जिस्मों की चाह है ,
न स्पर्श का आकर्षण ।
न जाने किस बन्धन ने ,
दो रूहों को एक बनाया है।
मासूम  सा रिश्ता है,
एहसासो का खुशनुमा दर्पण है।
न लेना है , न देना है ,
बस भावनाओं का समर्पण है।
न जाने किस मिट्टी से खुदा ने ,
प्रेमियों  का  दिल  बनाया है ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़
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Tuesday, 30 May 2017

तलाश


  हम सब को एक ही चीज की तलाश है । हम उसे पाने के लिये जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं , दिन - रात एक कर रहे हैं।
जितना अपने पास है , उससे अधिक चाहिये । एक घर हो गया
दूसरा चाहिये ।  कार नहीं है तो कार चाहिये ,कार है तो उससे अच्छा वाला ( आरामदायक )  चाहिये । हर कोई अपने जीवन स्तर को  ऊँचा उठाना चाहता है , वो सारी सुविधाएं अपने परिवार को  उपलब्ध कराना चाहते हैं । शायद जीवन की सफलता के यही पैमाने हैं । अमीरी , रहन - सहन , यश ,मान - सम्मान  जिसके पास है , दुनिया की नजरों में वही व्यक्ति पूजा जाता है । पर क्या खुशियाँ इनके होने से ही मिलती है । जिसके
पास यह सब नहीं क्या वह खुश नहीं हो सकता ।सच तो यह
है कि ऐसे भी हैं जिनके पास सब कुछ है परंतु स्वास्थ्य ठीक
नहीं है , उनके सुख - दुख में साथ देने वाले अपने नहीं हैं , किसी के पास सच्चे दोस्त नहीं हैं  तो किसी का परिवार नही  है। कुछ न कुछ कमी हर इंसान में होती है फिर भी हम उन्हें
नजरअंदाज कर उनके साथ जीते हैं वैसे भी  सबको सब कुछ
नहीं मिलता ,जितना  अपने पास है , जो मिल गया उसी के लिये  हम ईश्वर का धन्यवाद करें । कल जब मेरे पास ये होगा
तो मैं ये करूँगा वाली प्रवृत्ति छोड़ें क्योंकि जिंदगी का क्या
भरोसा , कब मुट्ठी में से रेत की भांति फिसल जाए। अपने आज
को जियें और जी भर जियें । जिस हाल में हैं सन्तुष्ट रहें ,खुश
रहें क्योंकि खुशियों को ढूंढने जाएंगे तो वो नहीं मिलेगी ,वो
तो हमारे आस - पास  ही बिखरी पड़ी है , बस हमारे महसूस
करने की देर है ,इन्हें समेट लीजिये अपने दामन में ।
     मत पूछो खुशियों की हद, मिलेगी ये कहाँ ।
     बिखरी है कण - कण में ,धरती से लेकर आसमाँ।
     घृणा नहीं , हिंसा नहीं ,प्रकृति का खूबसूरत समां।
     जी लो जी भर के, पाओ खुशियाँ ही खुशियाँ ।

  स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़
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Wednesday, 24 May 2017

साया


कल रात मैंने देखा एक पेड़ ,
जिसकी पत्तियां गिर गई थी ।
शाखाओं पर ढेर सारे,
चेहरे टँगे थे ।
कुछ गुमसुम , उदास , रोते ,
बेढंगे , बदसूरत चेहरे ।
स्याह बादलों के दैत्य ,
आग उगल रहे थे ।
आसमान रो रहा था ,
खून के आँसू ...
बर्फ बन रहे थे नदी और समंदर,
तालाब कीचड़ उछाल रहे थे।
जीव - जंतु भाग रहे थे,
इधर - उधर बेतहाशा ।
पुरवइया नम थी ,
धरती गर्म थी ।
पंछी व्याकुल से ,उल्लू हावी थे।
गिद्धों की फौज ,
चक्कर पे चक्कर काट रही थी ।
न जाने कैसा मंजर था,
बेजान मूर्तियों के ,
हाथों में ख़ंजर था ।
पत्थर भी रोते थे ,
मौत पे जश्न होते थे ।
कुछ काले साये
झण्डे उठाये घूम रहे थे,
न जाने किसे ढूंढ रहे थे।
क्या कोई तूफान या,
जलजला आया था ।
या ये आने वाली ,
बलाओं का साया था ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़
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