Wednesday, 23 May 2018

धोखा ( लघुकथा )

मैंने बहुत पहले एक प्लॉट खरीदा था... उसकी जरूरत नहीं पड़ने पर वर्षों उस पर ध्यान नहीं दे पाया । बरसों बाद उसकी सुध ली तो पता चला कि जमीन बेचने वाले एक एजेंट ने उसे धोखे से किसी को बेच दिया है । बच्चों ने उस एजेंट के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई और उस पर केस किया । उसी सिलसिले में  कोर्ट से वापस आ रहा था कि अपने बचपन के मित्र रामस्वरूप से मुलाकात हो गई । मन के किसी कोने में छुपी भूली - बिसरी बातें फिर से बाहर आ गई थी... हम दोनों ने बहुत देर तक अतीत की घटनाओं को दुहराकर उन्हें जीवंत  किया और उन यादों में डूबे रहे ।
      ... पर वर्तमान के बारे में बताते हुए वह दुःखी हो उठा था...मातृविहीन जिस बेटे को चार साल की उम्र से माता -पिता दोनो का प्यार दिया.... पढ़ाया ,लिखाया...अपने पैरों पर खड़े होने के योग्य बनाया...सफल होने के बाद उसने धोखे से घर अपने नाम कराकर उसे  बेघर कर दिया था । वह फिलहाल एक वृद्धाश्रम में रह रहा था..। मैं हतप्रभ सा उसकी बातें सुन रहा था.. क्या कोई इतना स्वार्थी , इतना बेगैरत हो सकता  है कि पिता के जीवन भर के त्याग को न समझ पाये । कोई पराया या अनजान व्यक्ति धोखा दे जाये तो हम उसके खिलाफ मुकदमा दायर कर सकते हैं , अपना विरोध दर्ज करा सकते हैं.. पर किसी अपने के द्वारा किये गए विश्वासघात का क्या करें ? अपने बेटे को अदालत में घसीट कर वे उसे दुःखी भी नहीं देख सकते थे ..भले स्वयं परेशान हो रहे हों ।  मुझे लगा मेरी स्थिति उससे बेहतर है ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

Monday, 21 May 2018

वो स्कूटर प्रेम ( संस्मरण )

संस्मरण
#वो स्कूटर प्रेम#
बात बहुत पुरानी है, तब लड़कियों के पास गाड़ी नहीं हुआ करती थी... बहुत हुआ तो किसी को लूना या स्कूटी मिल गई । मेरे लिए गाड़ी चलाना स्वप्न हो गया था और गाड़ी चलाने के प्रति आकर्षण मन में बढ़ता ही जा रहा था । मैं तो सपने में भी अपने आपको गाड़ी चलाते ही देखती । तब मैं आठवी कक्षा में थी..मामाजी के घर बलौदा गई हुई थी गर्मी की छुट्टियों में । मामाजी उस दिन बस से गये थे बिलासपुर । बस , मुझे मौका मिल गया और मैने उनका स्कूटर निकाल लिया उस सँकरी सी उबड़ - खाबड़ गली में । मन में कोई डर तो नहीं था पर आत्म विश्वास गजब का था....पहली बार स्कूटर वो भी बिना किसी बड़े की सहायता लिये... ऑब्जर्वेशन पॉवर जबरदस्त थी ..देखती रहती थी कैसे स्टार्ट करते हैं..कैसे गियर लगाते हैं... उन्हीं निरीक्षणों के बदौलत स्कूटर स्टार्ट कर ली , गियर लगा ली और मेरी गाड़ी चल पड़ी...पर बहुत सी बातें तो हम अनुभवों से सीखते हैं ....ब्रेक और गियर का सामंजस्य स्थापित करना एक बार में सीखने वाली बात नहीं थी...ब्रेकर में उसी स्पीड से गाड़ी कूदा दी और धड़ाक.... गाड़ी के साथ मैं भी जमीन पर । मुहल्ले के एक दो परिचित वहाँ थे , उन्होंने गाड़ी और मुझे उठाया और घर पहुंचाया । मुझे और गाड़ी दोनों को कोई विशेष नुकसान नहीं हुआ पर अपनी इस डेयरिंग पर थोड़ी डाँट जरूर लगी...सीखने का शौक था तो बताना था ना...गाड़ी ऐसे गली में थोड़ी सीखी जाती है । पर मैंने ऐसे ही सभी गाड़ियों पे हाथ आजमाया..मोटर साइकिल पर भी ।
   तब यह बात तो समझ में आ गई कि कोई नया काम सीखना हो तो किसी जानकार व्यक्ति से राय ले लेने में कोई बुराई नहीं । आपके अंदर कितना भी आत्मविश्वास हो फिर भी....हर नया काम शुरुआत में कठिन लगता है पर अभ्यास उसे आसान बना देता है हमेशा ।
आप सबका दिन शुभ हो ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

Thursday, 17 May 2018

जिनगानी के हाल

जिंदगानी के हाल...
तोला का बताव संगी  ..
रेहेंव फटेहाल ...
फेर कर पारेव बिहाव संगी...।
बाई के घर आये ले...
मन मंजूर नाचीस...
अंगना  कुरिया चमक गे ,
मोरो भाग जागिस...
मेहर ओखर हीरो बनगेव,
सोच सोच मुस्कियाव संगी ....।
थोरकिन दिन बने लागिस...
तहां नून तेल के खर्चा बाढिस ,
कपड़ा लत्ता , काजल ,लिपस्टिक...
अब्बड़ कन ओखर फरमाइश ,
कइसे एला निपटाव संगी....।
दु बछर म लइका आगे..
जउहर मोर परान सुखागे...
लइका अउ बाई के चक्कर मा ,
मोर मुड़ी के चुन्दी झररागे ...
बुता करे कइसे जाव संगी...।
घर मा किचकिच...
बाहिर ऊंच नीच...
कोनो नइहे रद्दा दिख्य्या ...
आमदनी अठन्नी , खर्चा रुपय्या,
कइसे पार लगाव संगी.....।
जिनगानी के हाल ल...
तोला कइसे बताव संगी....।।

स्वरचित --- डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

Wednesday, 16 May 2018

पीड़ा सृजन की

फिर वही अथाह लहर ,
असहनीय पीड़ा...
मुझे ही आखिर क्यों 
स्त्री की नियति में दर्द ही क्यों
अक्सर मेरे जेहन में ,
सवाल यह करता मंथन ।
पीड़ा से ही क्यों होता सृजन ।।
धरा ने दिया जवाब ,
मुझ पर चला हल ..
विदीर्ण होता मेरा तन,
तब जाकर देती मैं अन्न ।
पुत्री , पीड़ा से ही  होता सृजन।।
मिट्टी भी मुस्काई  ,
मन की व्यथा समझाई ..
मुझे कूट कर नरम बनाया ..
गूँधा ...आग में तपाया ,
तब बने सुन्दर बर्तन ।
बहन , पीड़ा से ही होता सृजन ।।
स्वर्ण भी आगे आया ,
उलझन मेरी सुलझाया ..
मुझे खान से खोदा गया ,
स्वच्छ कर धोया गया ,
पीटा , तपाया ,पिघलाया..
तब बने आकर्षक आभूषण ।
सखी ,पीड़ा से ही होता सृजन ।।
नीर नदी की पास आई ,
वेदना अपनी बतलाई ,
अपनों से बिछड़ी , वाष्पित हुई ...
नीरद बन भटकी गगन -गगन ,
संघनित हुई तब हुआ वर्षण ।
प्रिय , पीड़ा से होता सृजन ।।
रहस्य मैंने यह जान लिया ,
हाँ ...मैंने यह मान लिया..
व्यर्थ नहीं स्त्री का जन्म ,
वेदना को जो करती सहन  ,
वह सृष्टि का करती सर्जन ।
हाँ , पीड़ा से होता सृजन ।।
हाँ , पीड़ा से होता सृजन ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

Friday, 11 May 2018

तोर मया

गरमी म जुराये छांव सही ,
तोर मया दुलार ।
सावन के पहिली फुहार सही,
तोर मया दुलार ।।
बैरी मन के टेडगा बोली,
कर देथे मुंधियार ।
तोर गुरतुर बोली ,
चंदा कस उजियार ।।
जिनगी भर संग देबे ,
करत हंव गोहार ।
जुरमिल के कर लेबो,
भवसागर  ल पार ।
भरोसा ले घर कुरिया ल,
राख लेबो संवार ।
मया पिरीत के बंधना मा,
बंधा जाहि संसार ।।
मोर सुख दुख के संगी,
तोर खुसी म जिनगी न्यौछार।
तोर मोर रद्दा एक हे ,
एक हमर घर संसार ।।

स्वरचित -- डॉ. दीक्षा चौबे  , दुर्ग , छत्तीसगढ़

पानी ल बचाव

सबो कोती गोहार परगे ,
सुक्खा परगे कुंआ , तलाव ..
अब्बड़ अनमोल होगे ,
पानी ला बचाव ...
गरमी ह भारी बाढ़गे ,
पाना डारा सुखागे ...
जम्मो परानी पियासे मरत हे,
ऊंखर पियास  ल बुझाव...।
कुआं , तलाव बचावव गा ,
नदिया ला झन मइलाव...
माटी ल बचाय बर ,
रुख राई ल झन कटवाव...।
सीमेंट के बस्ती बना देव ,
गमला बर माटी खोजे जाव...
छांव चाही गरमी म तव ,
बनेकन रुख ल लगाव ....।

स्वरचित -- डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

Saturday, 5 May 2018

तपती दोपहर

धरती ने ओढ़ ली सुनहरी चादर ,
प्यासी है धरती , प्यासा अम्बर ।
लू के थपेड़ों में जलता शहर  ,
सूनी - सूनी गलियाँ , उदास सा मंजर ।
थके हारे पथिक ढूँढते बसर ,
शिथिल हो पवन हाँफता सर - सर ।
ठूँठ से खड़े पेड़ ,छाँव की फ़िकर ,
ऊँघती सी धूप ढूंढ रही बिस्तर ।
बेहाल जन मन , सूरज का कहर ।
प्रचंड ज्वाल सी तपती दोपहर ।।

स्वरचित -- डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़