Friday, 10 May 2019

ग़ज़ल


वतन महान है मेरा ,
वतन ईमान है मेरा ।

मिटा दूं मैं अपनी हस्ती ,
सब कुछ कुर्बान है मेरा ।

उगाये मिट्टी से सोना ,
परिश्रमी किसान है मेरा ।

कभी विश्वास न खोना ,
सैन्य शौर्य गुमान है मेरा ।

अंतहीन , सीमाहीन ,
अंतरिक्ष तक  विमान है मेरा ।

किये अविष्कार नवीन ,
आधुनिक विज्ञान है मेरा ।

समृद्ध और खुशहाल ,
देश अभिमान है मेरा।।

गर्व कर दीक्षा इस पर ,
जन्म लेना यहाँ सम्मान है मेरा ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Wednesday, 8 May 2019

माँ तुझे सलाम

माँ को ईश्वर ने धरती पर अपना प्रतिनिधि बना कर भेजा है क्योंकि वह हर जगह नहीं हो सकते ।  माँ के पैरों के नीचे जन्नत होती है । मुनव्वर राणा कहते हैं -
"मुझे खबर नहीं जन्नत बड़ी कि माँ लेकिन ,
लोग कहते हैं कि जन्नत बशर के नीचे है ।
मुझे कढ़े हुए तकिये की क्या जरूरत है ,
किसी का हाथ अभी मेरे सर के नीचे है ।"

   सिर पर माँ का हाथ होना खुशकिस्मती मानी जाती है ।  माँ के बिना घर का आँगन  सूना हो जाता है , माँ से संस्कार , रीति - रिवाज  और परम्पराएं हैं । माँ त्यौहारों की रौनक है । माँ रसोई से आती पकवानों की खुशबू है,
दमकते हुए सजे - सँवरे घर की रौनक है , पूजाघर से आती अगरबत्ती की पावन गंध है ,माँ गमले में खिले गुलाब की सुगंध है । बच्चे के लिए माँ हर दुःख दर्द सह लेती है , मौत से लड़कर उसे जन्म देती है ।  खुद भूखे रहकर उसे निवाला खिलाती है ,गीले में सोकर उसे सूखे में सुलाती है । एक फूँक से अपने बच्चे की चोट ठीक कर दर्द हरने वाली  चिकित्सक है , अपने आँचल को लपेटकर अपनी सांस से गर्म करके आँखों पर फाहा रखने वाली ठंडक है । माँ गीली पट्टी रखकर बुखार ठीक कर देती है , रातों को जागकर बच्चे को सुकून की नींद देती है । माँ पूरे परिवार की समस्याओं का निदान है.. माँ तू सिर्फ इंसान नहीं  भगवान है । तेरे सदको से हर बुरा साया घबराता है , माँ तेरे डर से यमराज भी थर्राता है । हर परेशानी से तू उबार लेती है , बचत करने के लिए अपनी ख्वाहिशों को मार लेती है । दर्द किसी को भी हो माँ रोती है , दुआओं से अपना दामन भिगोती है । माँ का कभी मत अपमान करो..उसे धन - दौलत कुछ नहीं चाहिए , सिर्फ सहयोग और सम्मान करो । माँ सदैव दुआओं में होती है , माँ के पैरों में जन्नत होती है ।
माँ तुझे  नमन 🙏🙏

डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

पुकार

वसुन्धरा यह कहे पुकार ।
बंद करो अब अत्याचार ।

कंक्रीट का नगर बसाने ,
जंगल को दिया उजाड़ ।

सूखे पड़े जलस्त्रोत सारे ,
पड़ गई अनेकों  दरार ।

सूना हो गया मेरा आँगन ,
जीव - जंतु कर रहे चीत्कार ।

ताक रहा बेबस अम्बर ,
होकर मेघ रहित लाचार  ।

स्वार्थरत होकर मानव ने ,
जल - चक्र को दिया बिगाड़ ।

आपदाओं को दे आमंत्रण ,
मचा दिया है हाहाकार ।

वक्त रहते चेत जा  अब  तो  ,
कर ले गलतियों में सुधार ।

हरे - भरे वृक्षों को उगाकर ,
बंजर धरती का कर शृंगार  ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़


Tuesday, 7 May 2019

जीवन के अनुभव ( संस्मरण )

कई बार जीवन के अनुभव हमें बहुमूल्य सीख दे जाते हैं   । वक्त बीतने के बाद हमें समझ आता है हमारे द्वारा लिया गया निर्णय सही था या गलत । आज से लगभग बीस वर्ष पहले की बात है जब मेरे ससुर द्वारा उनकी सम्पत्ति का बंटवारा किया गया । मेरे पति की पोस्टिंग शुरू से दल्ली राजहरा में रही तो हम बाहर ही रहे परन्तु प्रत्येक शनिवार हम घर ( दुर्ग ) जरूर आते थे ताकि परिवार से नजदीकियां बनी रहे । नौकरी करनेवालों के लिये छुट्टी का एक दिन कितना महत्वपूर्ण होता है फिर भी कभी मैंने घर आने से मना नहीं किया । कैसे भी हो
भागदौड़ करके हम आ ही जाते थे । कभी कोई त्यौहार भी बिना माता - पिता के नहीं मनाया । हमारी यही विचारधारा थी कि यदि हमने अपने बड़ों को महत्व नहीं दिया तो हमारे बच्चों को वो संस्कार कहाँ से प्राप्त होगा कि परिवार क्या होता है ।हमें खुशी है कि हम अपने बच्चों के मन में परिवार के महत्व का बीजारोपण करने में सफल हुए ।
      चूँकि मेरे सास - ससुर अपने बड़े बेटे के साथ रहते थे तो उन्होंने अपना पैतृक घर उन्हें ही देने का निर्णय किया यह बोलकर कि वे डॉक्टर हैं और उन्होंने शुरू से यहीं प्रैक्टिस किया है.. अगर घर का बंटवारा होगा तो नर्सिंग होम नहीं बन पायेगा । मेरे पति ने चुपचाप उनके फैसले को अपनी स्वीकृति दे दी परन्तु मुझे बहुत दुःख हुआ क्योंकि उस घर से इनकी भी बहुत सी यादें जुड़ी हुई हैं और जो भी हो बंटवारा दोनों बेटों में समान होना चाहिए । हमारे  पैतृक घर का मूल्य उस समय लाखों में था और हम तो कभी भी वैसा घर नहीं खरीद पाते । बदले में उन्होंने गाँव की चार एकड़ भूमि हमारे नाम की थी तब खेतों का उतना मूल्य  भी नहीं था । तब मुझे दुःखी देखकर मेरे पति ने मुझे समझाया कि वो सम्पत्ति पापा की अपनी बनाई हुई है वो जिसे देना चाहें दे सकते हैं.. हम बस रिश्तों को स्वीकृति दे रहे हैं क्योंकि अगर उनका निर्णय मानने से हम एतराज करेंगे तो सिर्फ सम्बन्ध खराब होंगे और कुछ नहीं । धन - सम्पत्ति कितने दिन काम आयेगी.. परिवार का महत्व सबसे बड़ा है , बड़ों का स्नेह व आशीर्वाद  हमारे साथ रहा तो हम कभी अकेले नहीं रहेंगे । हम दोनों कमाते हैं.. धीरे - धीरे अपना आशियाना बना ही लेंगे तुम चिंता मत करो । मैंने भी उनकी खुशी में अपनी खुशी देखी और  पापा पर कभी यह जाहिर नहीं किया कि उनके निर्णय से हमें कोई तकलीफ हुई है । वक्त बीतने के साथ यह महसूस हुआ कि हमारा निर्णय गलत नहीं था ..हमने चुप रहकर
परिवार की प्रतिष्ठा और सम्मान की रक्षा की और प्यार और एकता को बरकरार रखा । बच्चों को भी बुजुर्गों के महत्व व सम्मान का संस्कार मिला ..आज  हमारा परिवार खुशहाल और प्यार भरा है और मै अपने पति की समझदारी पर गर्व महसूस करती हूँ ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Monday, 6 May 2019

खोखले रिश्ते ( लघुकथा )

तृषा आँसू भरी आँखों से ऋषभ को दूर जाते देख रही थी ..कितने बड़े - बड़े वादे किये थे उसने  , पर आज वो सब बेमानी हो गये थे । सुख - दुःख  में  साथ देने का  दम भरने वाली उसकी बातें शीशे की तरह यथार्थ के ठोस धरातल से टकरा कर चूर - चूर हो गई थी.. साथ में उनके ख्वाब भी ।  पापा ने तो बस उसको परखने के लिए कह दिया था कि ऋषभ से शादी करने के बाद वे उसे अपनी सारी सम्पत्ति से बेदखल कर देंगे..और ऋषभ इस परीक्षा में फेल हो गया । शायद मुझ सामान्य सी दिखने वाली लड़की से कहीं अधिक उसकी रुचि मेरी सम्पत्ति में थी । अच्छा हुआ..उसके प्यार का झूठा तिलिस्म टूट गया और उनके #खोखले रिश्तों का सच बाहर आ गया  वरना शादी के बाद का धोखा वह कैसे बर्दाश्त करती । स्वार्थ और छल से भरे रिश्ते का टूट जाना ही बेहतर है कहते हुए उसने अपने आँसू पोछ लिये ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

ग़ज़ल

वो मेरे सामने बैठे रहे , शब भर बात चलती रही ।
चाँद  यूँ ही ढलता  रहा , चाँदनी बरसती रही ।

कली सी गुमसुम रही , गुलमोहर सी खिलती रही ।
हाथ न आई कभी , तितली सी खुशी उड़ती रही ।

नैनों में नीर भरता रहा , दिल में पीर पलती रही 
फिर ख्वाब मचलते रहे , उम्मीद थिरकती रही  ।

इश्क का रंग चढ़ता रहा ,  दीवानगी रँगती  रही ।
ज्यों ज्यों प्रीत लुटाते रहे , मेरी तिश्नगी बढ़ती रही ।

पत्तों पे शबनम झरते रहे ,फिजां में खुशबू घुलती रही ।
वो  मुझे देख मुस्कुराते रहे , शमा सी मैं पिघलती रही  ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Sunday, 5 May 2019

करना जरूर मतदान

मजबूती से खड़ा गणतंत्र ,
इसको आधार मान ।
सोच समझकर करना ,
करना जरूर मतदान ।

चंद रुपयों के लालच में ,
न बेचना स्वाभिमान ।
पूछ परख कर करना ,
करना जरूर मतदान ।

न आना लोगों की बातों में ,
जातिगत भेद न मान ।
प्रत्याशी की क्षमता को ,
जाँच कर करना मतदान ।

आयेंगे कई खरीददार ,
अपने मत का मूल्य पहचान ।
इसका न कोई मोल ,
सम्भलकर करना मतदान ।

विकासपथ पर जो ले जाये ,
सौंपना है उसे कमान ।
देशहित है सर्वोपरि ,
अपने दिल का कहना मान ।

मत दे बढ़ावा कभी भी ,
वंशवाद , खानदान ।
हिंसा , गुंडागर्दी का ,
लोकतंत्र में नहीं स्थान ।

पाँच वर्ष भुगतना पड़ेगा ,
रखना इस बात का ध्यान ।
गलत निर्णय न हो जाये ,
सोचकर करना मतदान ।।
करना जरूर मतदान ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़