Thursday, 16 May 2019

ज़िंदगी...

जिंदगी कब तक मुझे रुलायेगी ,
दौड़ में जीतने देगी या हरायेगी ।

होठों पर ठहर गये  कई जज्बात ,
 खुलेगी या बात दबी रह जायेगी ।

सीने में मचल रहे कई अरमान ,
पूरे होंगे या दफ्न कर दी जायेगी ।

दुनियावी रस्मों से मात खाई देह ,
तूफानों के वार  से थरथरायेगी ।

नेह के माधुर्य को तरसती जुबां ,
खामोश रहेगी या गुनगुनायेगी ।

चलती रही सदा अस्तित्व की जंग ,
खुद को जीतकर ही मुस्कुरायेगी ।

Wednesday, 15 May 2019

तुम्हारी आँखें

राज खोल देती हैं दिल के ,
कुछ अनकहा कह जाती हैं ..
तुम्हारी आँखें ।
कभी खुशी कभी गम में ,
अश्क बन ढल जाती हैं ..
तुम्हारी आँखें ।
दिल में कई भाव जगाकर ,
खामोश रह जाती हैं ...
तुम्हारी आँखें ।
मुस्कुराते हुए ,
कई दर्द सह जाती हैं...
तुम्हारी आँखें ।
महसूस कर पर पीड़ा ,
अक्सर नम हो जाती हैं..
तुम्हारी आँखें ।
उतर जाती गहराइयों में ,
मन की थाह ले पाती हैं...
तुम्हारी  आँखें ।
चुरा लेती हैं दिल कई ,
अपने साथ ले जाती हैं ...
तुम्हारी  आँखें ।
मीन सी चंचल ,
कहीं टिक नहीं पाती हैं..
तुम्हारी आँखें ।
पलकों के चिलमन से झाँक,
दिल में उतर जाती हैं..
तुम्हारी आँखें ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

क्या हम इंसान नहीं

हाड़ माँस के पुतले हम भी ,
बसती हममें भी जान वही ।
कुछ कमियाँ जरूर है हममें ,
कोई अपनी पहचान नहीं ।
पर क्या हम इंसान नहीं ।

निर्दोष होकर भी  दण्ड पाया ,
जन्मते ही परिवार ने ठुकराया  ।
 झूठ , फरेब की दुनिया ने ,
हमें क्यों नहीं अपनाया  ,
हम बिल्कुल अनजान नहीं ।

तिरस्कार भरी नजरों  से ,
दामन अपना सजाते रहे ।
दिल में दुआ सबके लिए ,
गम सहकर मुस्कुराते रहे ।
हमारी दशा पर कोई  परेशान नहीं ।

जिंदगी  हमारी बेरंग है पर ,
होठों पर रंग लगाते रहे  ।
खुशी में नाच लेते हम भी ,
बस तालियाँ बजाते रहे  ।
क्या हम मानव सन्तान नहीं ।

सिर पर हाथ रखकर ,
व्यथा  मन  की सुनाते रहे ।
हिजड़ा कह अपमानित किया,
हम पर रुपये लुटाते रहे पर ,
समाज में हमारा कोई स्थान नहीं ।

दुनिया की दोगली रस्में ,
बरकत हमारे कदमों में ।
शुभ कार्यों पर बुलाते हमें ,
नमक लगाते जख्मों में ।
पर दिल में कोई सम्मान नहीं ।

परिश्रम की दुनिया में हमने ,
अपना लोहा मनवाया है ।
हमारी शिक्षा , कर्मठता ने ,
दूषित मान्यताओं को हराया है ।
कोई होना अब हैरान नहीं ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Monday, 13 May 2019

सीटी बजाइये न (संस्मरण )

बात उन दिनों की है जब हमारी नई - नई शादी हुई थी ।
तब मेरी पढ़ाई चल रही थी और हम कहीं बाहर घूमने नहीं जा पाये थे । कुछ दिन के लिए ससुराल आती तो संयुक्त परिवार में रिश्तेदारों के मिलने आने वालों के कारण एक - दूसरे के लिए समय ही नहीं मिलता था । एक दिन पतिदेव ने अपने दोस्त के घर जाने का बहाना बनाया और हम तैयार होकर निकलने लगे कि ननद का चार वर्ष का बेटा हमारे साथ चलने की जिद करने लगा । हमने उसे साथ ले लिया और मूवी  देखने  चले गये.. ।
उसके एक - दो दिन बाद घर पर सभी बैठे थे कि लाइट चली गई..भांजा अनीश अपने मामा के पास आया और बोला - मामाजी सीटी बजाइये न..सीटी बजाने से लाइट आ जाती है जैसे उस दिन आ गई थी । दरअसल उस दिन टॉकीज में बिजली गुल हो जाने पर लोग सीटियाँ बजाने लगे थे उसके बाद जेनेरेटर चालू  हो गया । बड़े लोग तो समझ गये थे कि हम उस दिन कहाँ गये थे पर हमारी पोल खुल जाने के कारण हम लोग झेंप गये थे ।
आज भी लाइट चली जाने पर वह वाकया याद आ जाता है ।

डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Sunday, 12 May 2019

वो बीते पल

जिंदगी के धरोहर हैं वो बीते पल  ,
लौटकर न आयेंगे वो सुनहरे कल ।
वो अल्हड़ हँसी , मदमस्त बचपन ,
नाचते थिरकते कदम होते चंचल ।
बागों के ललचाते  इमली आम ,
पके अमरूद रख देते नीयत बदल ।
जी भर कर खेलते हम सारे खेल ,
कुछ नया करने की करते पहल ।
सीख कर तालाबों  में तैराकी ,
जीवन हो गया मानो पूरा सफल ।
वय की हर बरस है देती चुनौती ,
कर्मण्य को ही मिला मीठा फल ।
मधुर स्मृतियों में सहेजा बचपन ,
जी लो आज को न आयेगा कल ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Saturday, 11 May 2019

माँ तो माँ है

शादी के बाद दूसरे दिन  सत्यनारायण की कथा - पूजा होती है  । उसके बाद कंकन मौर छुड़ाया जाता है , पासे और सिक्का ढूँढने वाले कुछ खेल खिलाये जाते हैं ताकि  आने वाली नई दुल्हन नये माहौल में सहज हो सके । इस दिन एक और परम्परा का निर्वहन किया जाता है जो मुझे बहुत प्यारा लगता है सास अपने हाथों से अपनी बहू को दूध भात खिलाती है जो  उन दोनों के बीच सम्बन्धों की एक मीठी शुरुआत  होती है । सास अपनी बहू का स्वागत खुले मन से करती है और यह अपेक्षा रखती है कि बहू उस घर में रिश्तों में   अपने प्यार की मिठास भर दे । अपने प्यारे बेटे के लिए वह खूब ढूंढकर एक प्यारी सी दुल्हन लाती है और उसे अपना बेटा सौप देती है । अब तक मैं जो देखभाल अपने बेटे की करती आई हूँ अब तुम करना  , बस यही उम्मीद वह  अपनी बहू  से करती है परंतु बाद में यही रिश्ता इतना कडुवाहट भरा क्यों हो जाता है । जब भी  मैं किसी सास - बहू के बीच सम्बन्ध बिगड़ते देखती हूँ तो शादी के वक्त खुशी से दमकता माँ का चेहरा याद आता है ..स्वाभाविक है इस दिन  लिए तो नहीं । इन सबके बीच सबसे अधिक तकलीफ होती है बेटे को । माँ और पत्नी के बीच उसे ही सामंजस्य बिठाना पड़ता है । बेटा माँ से जुड़ा होता है उसे नाराज नहीं कर सकता और पत्नी अपना घर , रिश्ते छोड़कर आई है तो उसकी बातों को मान देना भी आवश्यक है ।
दरअसल माँ और पत्नी को ऐसी नौबत ही नहीं आने देना चाहिए कि बेटे के आगे सिर्फ एक ही राह रह जाये या उसे कोई दुविधा हो । बहू को माँ का किसी भी प्रकार अनादर नहीं करना चाहिए क्योंकि माँ तो माँ है , उससे बढ़कर कोई नहीं हो सकता । माँ से कैसी प्रतियोगिता ? एक बेटे के लिए माँ हमेशा पत्नी से ऊपर ही रहेगी और यह बात पत्नी को समझना ही  चाहिए अगर वह नहीं समझती तो स्वयं माँ बनने के बाद समझ जाएगी । मेरे पति कई बार बोलते हैं यह चीज माँ तुमसे अच्छा बनाती है तो मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगता बल्कि मैं भी उनसे सहमत हो जाती हूँ  । वो जो कहते हैं मैं उनका समर्थन करती हूँ क्योंकि एक बेटे के जीवन में माँ का स्थान सबसे महत्वपूर्ण होता है । कई बार ये मुझे उकसाने के लिए जान - बूझकर माँ के हाथों की तारीफ करते हैं तो भी मैं नहीं चिढ़ती क्योंकि माँ की मैं भी प्रशंसक हूँ ..उनसे भी  बड़ी वाली । मुझे भी उनसे उतना ही प्यार है जितना उन्हें । मेरे मन में उनके प्रति कहीं अधिक आदर है क्योंकि उन्होंने मुझे इस घर में अपनेपन का एहसास कराया ...एक नये माहौल में सामंजस्य स्थापित करने में सहयोग दिया..मेरी गृहस्थी में आने वाली समस्याओं का समाधान किया । बच्चों को पालने में , उनका ध्यान रखने में अपना पूरा सहयोग दिया । जब - जब हमें आवश्यकता महसूस हुई..बच्चे बीमार पड़े ,मैं बेडरेस्ट पर थी या पतिदेव को बाहर दौरे पर जाना हो वह हमारे पास रहती थी । जन्म देने वाली माँ पालन - पोषण करती है , शिक्षा और संस्कार देती है, बच्चे को संघर्ष करना सिखाती है  परंतु विवाह के पश्चात सासु माँ आगे की कमान संभाल लेती है और गृहस्थ जीवन में आने वाली समस्याओं  का  समाधान करती है । एक लड़की के जीवन में दोनों माँ की भूमिका महत्वपूर्ण है और उसे यह बात निर्विरोध मानना चाहिए । दोनों को सम्मान देना व प्यार करना चाहिए क्योंकि  मेरी हो या उनकी माँ तो माँ है । मातृ दिवस  दोनों माँ के लिए है , आज के दिन दोनों माँ को धन्यवाद देना चाहिए ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Friday, 10 May 2019

वो शिकारी

धुँए का जहर ढाता जा रहा कहर ,
प्रदूषण बन गया है  आज शिकारी ।
कचरे के ढेर पर बैठे गाँव  शहर ,
अब नचा रहा सबको वह मदारी ।
हवा , पानी में घुल रहा जहर ,
बनकर बैठे आज हम भिखारी ।
रोगग्रस्त हो रहे ,बढ़ रहा मृत्युदर ,
हर शख्स कर रहा मौत की सवारी ।
हरी - भरी धरती  हो गई बंजर ,
गर तुमने अपनी आदत न सुधारी ।
देखना पड़ेगा  वह भयावह मंजर ,
जान देकर चुकानी पड़ेगी उधारी ।
संतुलन न बिगाड़ चेत जा वक्त पर ,
प्रकृति की रक्षा में खुशहाली हमारी ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़