Monday, 16 September 2019

जागो हे भारत की बेटियों

जागो हे भारत की बेटियों ,
आत्म विश्वास का वरण करो ।
दबना नहीं डरना किसी से ,
लज्जा ,संकोच का हरण करो ।
कमजोर बनाते जो तुमको ,
रूढ़ियों से मुक्त बंधन करो ।
बुरी नजर जो डाले तुम पर ,
दुष्ट दानवों का दमन करो  ।
कुचल डालो  विषधर का फन ,
अत्याचारियों  का शमन करो ।
उड़ो हौसलों के पर लेकर ,
लक्ष्य को विस्तृत गगन करो ।
शिक्षा की उजास जीवन में  ,
 भर लो साहस को नमन करो ।
धैर्य शक्ति की मिसाल बनना ,
सरस्वती सा आचरण करो ।
रौद्र रूप  काली का धरकर ,
अन्यायी का संहरण करो ।
ज्ञान - विज्ञान की वेदी पर ,
अज्ञानता का हवन करो ।
अपने अधिकारों की खातिर ,
जुल्मों से युद्ध आमरण करो ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Sunday, 15 September 2019

सजल ( बचपन ) -12

मजबूरी के साये में सोता बचपन ।
गरीबी , तंगहाली में  खटता बचपन ।।

रोटी की चिंता  खेलने की उम्र में ।
डिब्बे  और प्लास्टिक बीनता बचपन ।म

जूतों की पालिश या टेबल पर पोंछा।
घर की जिम्मेदारी में दबता बचपन ।।

 बच्चों के हिस्से नहीं खेलना-पढ़ना ।
अभावों के अँधेरों में गुमता बचपन ।।

मानव अधिकारों को दे रहा चुनौती ।
बेबसी के चक्रों में घूमता बचपन ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Friday, 13 September 2019

संस्कार ( लघुकथा )

शादी की बात चलने पर राजन पहली बार माही से मिलने गया था । एक रेस्टोरेंट में कॉफी के साथ उनकी बातचीत की शुरुआत हुई । राजन माही के शुद्व हिंदी , स्पष्ट उच्चारण से प्रभावित हुआ था । दरअसल माही ने हिंदी में एम. ए. किया था , साथ ही वह पत्रिकाओं में आलेख लिखती थी तो उसकी कोशिश रहती कि अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग कम करे । उसका यही गुण राजन को भा गया और उसने तुरंत शादी के लिए हाँ कह कर दी थी । उसका परिवार बहुत आश्चर्य चकित था क्योंकि इसके पहले राजन को कोई लड़की पसन्द ही नहीं आती थी । सीधी - सादी सी माही पता नहीं कैसे राजन को भा गई , इसकी वजह सभी जानना चाहते थे । उसने कहा - " दरअसल अपनी मातृभाषा के प्रति लगाव ही सबसे बड़ा कारण है , क्योंकि वही तो संस्कारों की जननी है । बाकी और क्या जानना है , लड़कियाँ तो सभी एक जैसी होती हैं । महज उनके संस्कार ही उन्हें परिभाषित करते हैं ।" उसके जवाब ने सबको लाजवाब कर दिया था ।
आप सभी को हिंदी दिवस की शुभकामनाएं । 🙏 ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

दीवाना

दुनिया की बातों को दिल से न लगाना ,
प्यार का दुश्मन है सदियों से जमाना ।

रीत प्रीत की तुम भूल ही गये आखिर ,
वक्त न मिलने का जो बना रहे बहाना ।

बरसों तक कर भी अनथक हैं मेरे नैन ,
अधूरी ख्वाहिशों ने बना दिया दीवाना ।

तुझे ही चाहेंगे हम दम निकलने तक ,
ऐसी क्या मजबूरी जो कर दिया बेगाना ।

सजाये रखा है पलकों पे तेरे सपने को ,
मिलन के गीत गाता रहेगा ये मस्ताना ।

कभी तो मुकम्मल होगी मेरी कहानी ,
ख्वाबों को अपनी हसरतों से सजाना ।

पीर पर्वत सी पिघलेगी एक दिन जरूर ,
इश्क की तपिश में अपना दिल जलाना ।

उड़ जायेंगे एक दिन हम पंछी के मानिंद ,
अश्कों  से  लिख जायेंगे इश्क का फ़साना ।

मुश्किलों से मिलता है प्यार यहाँ " दीक्षा "
इज़हार- ए - इश्क को अब न देर  लगाना ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Monday, 9 September 2019

सौदा ( लघुकथा )

"अरे स्वाति तुम यहाँ  ! तुम इतनी छोटी नौकरी कर रही हो , मुझे विश्वास नहीं हो रहा । तुम्हारे जैसी टैलेंटेड मॉडल को  बहुत ऊपर जाना था । मैं तुम्हें यहाँ देखकर हतप्रभ हूँ " ,  कई  वर्षों पश्चात मुलाकात  होने पर श्वेता ने अपनी  सहेली स्वाति से पूछा । कॉलेज के जमाने में ही खूबसूरत स्वाति को मॉडलिंग के कई ऑफर आ चुके थे ।'
" श्वेता मैं इस छोटी नौकरी के साथ भी बहुत खुश हूँ , क्योंकि आसमान में उड़ने के लिए मैं अपनी इज्जत के साथ #सौदा नहीं कर सकती ।" श्वेता ने आज स्वाति के आंतरिक सौंदर्य के दर्शन किये थे , स्वाति के लिए उसके मन में अब स्नेह के साथ श्रद्धा के भाव जागृत हो गये थे ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

क्या यही प्यार है ?

मन की कली खिल उठी , दिल का चमन गुलज़ार है,
तेरे  आने से जीवन में आई बहार ,क्या यही प्यार है ।

नजारा उनका करके जो  नज़रें मेरी झुक जाती हैं ,
झंकृत हो उठे हृद - वीणा के तार , क्या यही प्यार है ।

कातिल  निगाहों से उसने जो छू लिया मुझको ,
हया  से हो गये गुलाबी  रुख़सार , क्या यही प्यार है ।

रूबरू पाकर उन्हें  बढ़ जाती है मेरी धड़कन ,
थरथराते लब कर देते इजहार , क्या यही प्यार है ।

हर  ओर नज़र आती है  पिया तेरी  ही  सूरत ,
मिलने को  दिल रहता बेकरार , क्या यही प्यार है ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

पति - पत्नी की जंग

देखो इस परिवार का क्या हो गया हाल ,
छोटी - छोटी बात पर ये मचा रहे बवाल ।
मचा रहे बवाल कि कुछ समझ न आये ,
सहमा है नन्हा बच्चा रोये या चिल्लाये ।
पहले सी नहीं रही, जिंदगी है कि जंजाल ।

पति - पत्नी की जंग में हार- जीत कैसी,
गृहस्थी के ये दो पहिये हालत एक जैसी ।
अविश्वास और जिद ने घर को तोड़ दिया ,
सुख - शांति और चैन ने साथ छोड़ दिया ।
रोज - रोज की झिकझिक से हुए बेहाल ।

आधुनिक वस्त्रों में खो न जाएं  संस्कार ,
झूठी शान और दिखावे  ने मचाया रार ।
घर में जो मिलता रहा प्रेम और सुकून ,
अब  वहाँ है सिर्फ दम्भ , झूठा अहंकार ।
बच्चों के पिस जाने का न कोई मलाल ।
देखो इस परिवार का क्या हो गया हाल ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़