Tuesday, 14 April 2020

सजल

सजल 
समांत - ईल
पदांत - है
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भाग्य की शिकायत में देता कई दलील है ,
 कर्मशीलता  का  पक्षधर वक्त बना वकील है ।
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लक्ष्य निर्धारित करने से ही मिलेगी मंजिल ,
साहस से ऊँची उड़ान भरता हुआ चील है ।
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घाव कड़वी बोली का भरता नहीं जीवन भर ,
 छोड़ जाती  निशान जब चुभती  कोई कील है ।
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सत्संग का असर देखो  क्या  रंग दिखाता है ,
अंबर के अनुराग  में  समंदर हुआ नील है ।
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न्याय की देवी ने आँखों पर बाँधी पट्टी है ,
 चीख - चीख कर सच  कर रहा न्याय की अपील है ।
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

सजल

सजल
समां त - अड़ी
पदांत - है
मात्रा भार - 20
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मुसीबत ये सिर पर आई बड़ी है
रखो धीर ये परीक्षा की घड़ी है
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रखना है संयम खुद पर ही हमको
चलती रहे जो  साँसों की लड़ी है 
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सुरक्षा हमारी केवल सावधानी
हमें तोड़ना  संक्रमण की कड़ी है 
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कोशिश हम सबको करनी ही होगी 
यहाँ नहीं कोई जादू की छड़ी है
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 खतरे को समझें सम्भल जाएं अब
हम सबके आगे  ये मौत खड़ी है
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Monday, 13 April 2020

मुक्तक

वैदेही

वैदेही तुम  त्याग और  धैर्य की मूरत थी ,
सेवाभावी , दया और ममता की सूरत थी ।
रामप्रिया , पति की अनुगामिनी, धर्म परायणा _
लक्ष्मण - रेखा को लाँघने की क्या जरूरत थी ।।
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चली वैदेही  राम के संग पर वक्त न उसके साथ चला ,
उस ने निभाया सदा धर्म अपना पर  रावण ने  उसे  छला ।
अग्नि परीक्षा देकर उसने निष्कलंक साबित किया खुद को _
हुई निर्वासित  फिर भी , शक की आग ने उसे  दिया जला।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Sunday, 12 April 2020

ग़ज़ल

ग़ज़ल
काफ़िया - अरा
रदीफ़ -हुआ है
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पाबन्दियों का जितना पहरा हुआ है ,
मोहब्बत का असर उतना गहरा हुआ है ।
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सूखने का डर है  इख्लास की तपिश से ,
टूटकर समंदर  आज कतरा हुआ है ।
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जुदा हुए थे हम एक - दूजे से जहाँ पर ,
गया  वक्त  अब भी वहीं ठहरा हुआ है ।
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मुझे ढूँढना वहीं जहाँ फूटकर रोया  ,
अश्कों की बूंदों में मन  बिखरा हुआ है ।
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मीठी बोली का जहाँ बहता था निर्झर ,
उस दिल में  नफरत का जहर  भरा हुआ है ।
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लड़ा रहा रुपया यहाँ इंसा को इंसा से ,
  इंसानियत को हिर्स से खतरा हुआ है ।
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अनसुनी कर रहा है वो मेरी फरियादें ,
संगदिल सनम इस कदर बहरा हुआ है ।
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इख्लास = प्रेम
हिर्स= लालच
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Thursday, 9 April 2020

खिला रहे फूल ( कहानी )

         ससुराल से  आए दो दिन हो गए  थे  आज रीमा को  ...पता नहीं क्यों वह पहले वाली चंचल चुलबुली रीमा नहीं लग रही थी । उसकी मम्मी देख रही थी वह कुछ उदास अनमनी- सी है । जब से आई थी उसने एक बार भी अपने पति रोहन या अपने ससुराल वालों का जिक्र नहीं किया था । तीसरे दिन खाना खाने के बाद जब  सभी सोने चले गये तो उन्होंने अपनी बेटी का मन टटोला - " क्या बात है बेटा  , तुम कुछ उदास लग रही हो  कहीं रोहन से झगड़ कर तो नहीं आई तुम ?" पहले तो रीमा थोड़ी सकपकाई , फिर उसने यह स्वीकार कर लिया । मम्मी , रोहन तो बिल्कुल अपनी मम्मी  की हर बात मानते हैं । कभी मेरा पक्ष लेते ही नहीं । इसी बात के कारण  कई बार हमारा झगड़ा हुआ वरना हम लोगों के बीच कोई विवाद होता ही नहीं । उनकी मम्मी को भी हमें कुछ स्पेस देना चाहिए न ,पर वो तो हमेशा बेटे के पीछे लगी रहती हैं । खाना ठीक से खाया कि नहीं । यहाँ जाओ ,वहाँ मत जाओ । रात को जल्दी घर आया करो , बाहर का खाना मत खाया करो । हर चीज में रोक-टोक , मैं तो परेशान हो जाती हूँ । रोहन को तो कुछ फर्क ही नहीं पड़ता , उनको यह सब सामान्य लगता है ।

        बेटे , शुरुआत में थोड़ी एडजस्टमेंट प्रॉब्लम तो होती ही है । तुम कुछ समय धैर्य रखो , धीरे - धीरे सब कुछ सामान्य हो जाएगा । शादी को दो साल होने को आये मम्मी और कितना  समय दूँ । बेटे होने के अलावा रोहन अब पति भी हैं , क्या मेरी तरफ उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती । अब मेरा उनके साथ रहना मुश्किल है , मुझे  रोहन से दिक्कत नहीं है लेकिन उनकी फैमिली के साथ मैं नहीं रहूँगी , बस यही बोलकर मैं घर आ गई हूँ । उन्हें स्वीकार होगा तो मुझे लेने आयेंगे वरना मैं आत्मनिर्भर हूँ ,उनके बिना भी रह लूँगी " - रीमा ने  अपना फैसला सुना दिया था । उसकी मम्मी सोच में पड़ गई , आजकल के बच्चे छोटी-सी समस्या को बड़ी बना लेते हैं । हम लोगों के जमाने में तो ये निभा ही नहीं पाते । सुबह उठकर जो रसोई में घुसते तो पतिदेव से मिलना रात को ही होता था । बड़ों के सामने दोनों की घिघ्घी बंधी रहती । सीधे खाना माँगने में भी संकोच करते । आजकल अब वह बंधन नहीं रहा , न वह रूढ़िवादिता । आजकल के सास-ससुर भी आजाद ख्याल के हो गए हैं । फिर भी बच्चों को कोई न कोई शिकायत रहती है , अपनी बेटी की जिद को वह भली - भाँति पहचानती थीं  किस प्रकार उसे परिवार की महत्ता वह समझाए कुछ समझ नहीं आ रहा था ।  बस वह वक्त का  इंतजार करने लगीं  और वह अवसर उन्हें शीघ्र मिल भी गया । 

               एक दिन घर के बगीचे में  माँ-बेटी साथ घूम रहे थे । बारिश का खुशगवार मौसम था , चारों ओर हरियाली छाई हुई थी । हल्की बूंदाबांदी के बीच घूमते हुए  रीमा को पीले गुलाब से खिला गमला दिख गया और वह प्रसन्नचित्त होकर अपने मनपसंद फूलों को प्यार से सहलाने लगी । उसकी मम्मी ने तुरंत एक फूल तोड़कर झट से रीमा के हाथ में पकड़ा दिया । अरे मम्मी ! आपने यह क्या कर दिया । इसे तोड़ क्यों दिया , यह पौधे से अलग होकर कितने देर तक खिला रहेगा । कुछ समय बाद मुरझा जायेगा । यदि तोड़ती नहीं तो अभी कई दिनों तक खिला रहता । 

           हाँ बेटा , मैंने सिर्फ फूल ही तोड़ा है तुम तो  किसी  पौधे  को  उसकी जड़ से  अलग करना चाहती हो । " किसकी बात कर रही हो मम्मी " ,  रोहन की बात कर रही हूँ बेटा , क्या तुम उसे उसकी जड़ों से दूर करने की शर्त नहीं रख रही । जरा सोचो , उसके मम्मी - पापा चाहे जैसे भी हों पर उसके लिए तो वे सदैव  सम्मानित ही रहेंगे न । उनसे अलग रहकर क्या उसे सच्ची खुशी मिल पायेगी । अपनी शादी को बचाने के लिए वह अलग हो भी जायेगा तो इस गुलाब की तरह मुरझा नहीं जाएगा । फिर उसे दुःखी कर क्या तुम उसके साथ खुश रह पाओगी । रीमा कुछ पल अपने हाथों में थामे गुलाब को देखती रही और कुछ पल सोचकर बोली - "आप सच कह रही हैं मम्मी । मैं आपकी बात समझ गई । अपने परिवार से अलग रहना किसी समस्या का समाधान नहीं है । अब मुझे जो भी समस्या होगी मैं वहीं उनके साथ रहकर ही सुलझा लूँगी । आपकी तरह सकारात्मक नजरिया रखने से शायद मुझे अधिक समस्या होगी भी नहीं । थैंक्यू मम्मा  । आप चिंता मत कीजिए  । मेरी गृहस्थी का गुलाब पौधे में ही खिला रहेगा ,मैं उसे उसकी  जड़ों से अलग नहीं करूँगी  । दोनों माँ - बेटी खिलखिलाकर हँस पड़े थे ।


स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे

दुर्ग , छत्तीसगढ़

Saturday, 4 April 2020

फिर लौट आया बचपन

थिरकने लगा है मेरा अंग - अंग ,
बारिश ने जब - जब भिगोया तन - मन ।
डोरी बनी  उड़ते पतंग के संग ,
मृग से कुलांचे भरते चंचल नयन ।
मस्ती लिये फिर लौट आया बचपन ।।

बुलाया बगिया के पुष्पों ने हरदम ,
झूले ने उमंगित किया है यह तन ।
मर्यादा की बेड़ी में जकड़े कदम ,
पर तितलियों के पीछे दौड़ा यह मन ।
मस्ती लिये फिर लौट आया बचपन ।।
 
तस्वीर पुरानी जो हाथ में आई ,
स्मृतियों में थिर हुआ चंचल चितवन ।
पुरानी सखियों की यादें  आईं ,
मायके की याद में छाया सावन ।
मस्ती लिये फिर लौट आया बचपन ।।

झाँके आँखों में जब कोई सुंदर गाँव ,
 तालाबों के शीतल जल की छुअन ।
अमराई की ठंडक , पीपल की छाँव ,
 कानों में सरगम सुनाती ज्यों पवन ।
मस्ती लिये फिर लौट आया बचपन ।।

पहने माँ की साड़ी , दादी की नकल ,
मन को भाती माँ की चूड़ी खनखन ।
बच्चों की शरारत में दिखती शक्ल ,
बज उठती  जब मेरी पायल छनछन ।
मस्ती लिये फिर लौट आया बचपन।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़







Thursday, 2 April 2020

मुक्तक

खून से लथपथ पड़ी है अपनों की लाश ,
नशे के मूल में ही छुपा है सर्वनाश ।
सोचने - समझने की खत्म हो गई शक्ति_
खत्म कर दी है स्वयं की जीने की आस ।।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़