Tuesday, 21 August 2018

वो खास रक्षाबन्धन ( संस्मरण )


उस  रक्षाबन्धन के पहले भाई से मेरी जोरदार बहस हुई थी ...मम्मी  बाजार गई हुई थी और मुझे कुछ  काम ( रसोई का ) देकर गई थीं ,मैं उसमें व्यस्त हो कर भाई का दिया काम नहीं कर पाई..उन्होंने मुझे एक थप्पड़ मार दिया...फिर तो मैं भी  अड़ गईं , अब तो  उनकी कोई बात मानूँगी ही नहीं...मम्मी वापस आई तो मैं मुँह  फुलाये बैठी थी...रोटियाँ बना दी थी तो मम्मी तो  मुझसे खुश थी ही..भाई को खूब डाँट पड़ी...मम्मी ने कहा , आइंदा उसको हाथ भी लगाया तो ठीक नहीं होगा । भाई को डाँट पड़ी तो मुझे बहुत मजा आया । नाराजगी में मैंने निश्चय कर लिया कि इस बार राखी नहीं बाँधूंगी ...मगर इस घटना के कुछ दिन बाद अचानक उनके सिर के आधे हिस्से में जोरदार दर्द होने लगा  , इतना असहनीय दर्द कि वे रोने , चिल्लाने लगे...उन्हें इस पीड़ा में देखकर सभी दुखी थे , मैं  तो सबसे अधिक रोई थी ...डॉक्टर ने आकर इंजेक्शन दिया तब कहीं जाकर उनका दर्द ठीक हुआ । मुझे बहुत पश्चाताप हुआ कि मैंने भाई को राखी नहीं बाँधने की बात सोची इसीलिए ऐसा हुआ...मैंने भगवान से प्रार्थना की कि  है भगवान अब मेरे भाई को कभी ऐसा दर्द मत देना...फिर कभी मैं ऐसा सोचूंगी भी नहीं ,चाहे वे मेरे साथ कैसा भी व्यवहार करें । उस राखी पर मैंने बहुत ही मन से सारी विधियाँ की ताकि मेरे भाइयों पर कोई विपत्ति न आये और यह समझ भी आया कि बहन की दुआ  क्यों भाई के लिए आवश्यक है । कभी गुस्से में भी अपने भाई के लिए बुरा न कहें क्योंकि बहन की दुआएं तुरंत कुबूल हो जाती हैं ।

स्वरचित -- डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

Monday, 20 August 2018

सवनाही ( कहानी )

          इस बार वर्षों बाद गाँव जाना हुआ....दरअसल दादा जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण उन्हें देखने की प्रबल इच्छा हुई इसलिए छुट्टी लेकर बच्चों के साथ  गाँव आना हुआ....वरना सावन के  इस  महीने में कभी आना नहीं हुआ । किसी खूबसूरत तस्वीर की तरह लग रहा था गाँव... खेतों से घिरे पच्चीस - तीस छोटे - बड़े मकान  ...उत्तर दिशा में एक बड़ा सा तालाब गाँव के सौन्दर्य में वृद्धि कर रहा था....पानी से भरे  तालाब के चारों तरफ ऊँचे - ऊँचे ताड के पेड़ ,
बरगद , पीपल , नीम की सुहानी छाँव  मन को मुग्ध कर रही थी । तालाब के किनारे महादेव का छोटा सा मन्दिर इस खूबसूरत वातावरण को  पावन बना रहा था । वैसे हर मौसम का विशेष प्रभाव होता है परन्तु बारिश का मौसम  बहुत खास होता है । प्रकृति के नवीन स्वरूप के साथ मानव मन भी सक्रिय हो उठता है । कृषक अपनी कर्मस्थली में जुट जाते हैं , वणिक व्यवसाय में तथा श्रमिक श्रम - साधना में तल्लीन हो जाते हैं । जब मैं गाँव में थी तभी कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाने वाला हरेली त्यौहार पड़ा । इसके बाद ही बाकी सभी त्यौहार आते हैं... यह कर्म की पूजा का त्यौहार है... कृषि के प्रथम चरण की पूर्णता का उत्साह पकवानों की महक की तरह सम्पूर्ण वातावरण में बिखर जाता है । ग्रामीण अंचल में यह विशेष रूप से मनाया जाता है ।  शहरों में कार्मिकों  के अलावा अन्य लोगों में इसके लिए उतना उत्साह नहीं देखा जाता ....बहुत  वर्षों बाद  इस अवसर पर मैं गाँव आ पाई हूँ । मेरे बच्चों के लिए तो यह प्रथम अवसर  था और वे बड़े उत्साह के साथ हर नई चीज को ध्यान से देख रहे थे  और उनमें शामिल भी  हो रहे थे  । सबसे पहले हल , फावड़ा , कुदाली , गैती इत्यादि को अच्छी तरह साफ किया गया , फिर उन्हें गोबर की लिपाई किये हुए पवित्र स्थान पर रखकर अक्षत  , पुष्प , धूप अगरबत्ती जलाकर उनकी पूजा की गई  । नारियल ,  मीठे गुलगुले या चीला का भोग लगाया  गया  और सबको वितरित किया गया । बच्चों ने  गेड़ी पर चढ़ने का भी असफल प्रयास किया और दूसरे बच्चों की गेड़ी की मच - मच करती धुन का मजा लिया ।  अचानक उनकी नजर  कुछ घरों की बाहरी दीवार पर बनी आडी  तिरछी लकीरों पर पड़ी जिसे गोबर व सिंदूर से बनाया गया था  । प्रतीकात्मक मानव आकृतियों सी यह रचना  सवनाही   कहलाती है ।  स्थानीय मान्यता के अनुसार अमावस्या की काली रातों को बुरी शक्तियों के जागृत होने की  कहानियों से जोड़ा जाता रहा है । विशेषकर हरेली अमावस्या को जादू टोना करने वाली काली शक्तियां प्रबल हो जाती हैं इसलिए उनसे बचने के लिए दीवारों पर सवनाही बनाई जाती है ।  दूसरे  दिन सुबह सोकर उठी तो वहाँ का माहौल बिल्कुल ही बदला हुआ था ।  कल तक त्यौहार के रंग में रंगा  गाँव आज दुःख , शोक में  डूबा हुआ था । पन्द्रह वर्ष  की  एक बच्ची जो दैनिक कार्यक्रम निपटाने मैदान की ओर गई थी.... उसके साथ अनाचार हो गया था । सुनकर मन खिन्न हो गया था , गाँव की स्वच्छ , सोंधी हवा में यह कैसा जहर घुल गया ...यहाँ के  भोले - भाले शांत लोगों के बीच ऐसी कलुषित प्रवृति कैसे पनप गई । यहाँ की पावन  माटी  में बुराई का बीज कैसे अंकुरित हो गया । संस्कृतियों , परम्पराओं की धरा में ये कैसी प्रदूषित आंधी चली है जिसने मानवीय मूल्यों को क्षत विक्षत कर  दिया ।जहाँ सिर्फ और सिर्फ सद्भावना व सहृदयता थी वहाँ नशा , दुष्प्रवृत्तियों  , पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण युवा पीढ़ी   को दिग्भ्रमित कर रहा है । मन में बस एक ही सवाल बार - बार उठ रहा है... हमारे बुजुर्गों ने भूत- प्रेत
बुरी आत्माओं से बचाने के लिए सवनाही बनाने की परम्परा बनाई थी । उन्हें क्या मालूम था इंसान उनसे कहीं  अधिक  खतरनाक साबित होंगे ...काश ! इन्हें दूर रखने के लिए भी  कोई सवनाही बनाई जा सकती ?

डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

Saturday, 11 August 2018

कारे - कारे बदरा

कारे - कारे बदरा...
यूँ न तरसा ...
तक रहे हैं नैना ,
अब के बरस जा...
पिया गये विदेशवा ,
उन्हें लौटा ला...
सूना मेरा आँगन ,
खुशियाँ भर जा...
तक रहे हैं नैना ,
अब के बरस जा...
सूखी है नदियाँ ,
सूखी है धरा...
तड़प रहे हैं  पंछी ,
सुध ले जरा...
तक रहे हैं नैना ,
अब तो बरस जा..
पीर मेरी जिया की ,
पी तक पहुँचा...
संग - संग लाना ,
प्रीत उनका...
तक रहे हैं नैना ,
अब तो बरस जा...
कारे - कारे बदरा ,
यूँ न तरसा....
तक रहे हैं नैना ,
अब तो बरस जा...।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग  , छत्तीसगढ़

Tuesday, 7 August 2018

धोखा ( लघुकथा )

धोखा ( लघुकथा )
तिनका - तिनका जोड़कर यह आशियाना बनाया था मंजू और मुकेश ने...कितनी मेहनत से पाई - पाई जोड़ी थी ...एक घर ...अपना घर होने के एहसास ने उन्हें  अपनी सभी जरूरतों को सीमित करने  को बाध्य कर दिया था , अपने सारे शौकों को भुलाकर वे सिर्फ इसी के लिए दिन - रात एक कर रहे थे । आज उनका ख्वाब पूरा होने जा रहा था... उन्होंने घर पसन्द कर लिया था । उस घर के मालिक अपने बेटे के पास रहने अमेरिका जा रहे थे हमेशा के लिए इसलिए सस्ते में ही मकान बेच रहे थे...जल्दी निकलना है कहकर उन्होंने सभी फॉर्मेलिटीज पूरी करने की बड़ी हड़बड़ी मचाई ..कम कीमत में इतना बड़ा मकान ...ऊपर से समय की कमी ..मंजू लोग भी उनके बारे में कुछ पता नहीं लगा सके  और सौदा पक्का कर दिया । पेमेंट हो गया..घर के कागजात देकर वे चले गए बाद में पता चला कि जिन्होंने अपना बोलकर घर बेचा था , वे तो स्वयं किराएदार थे...कागजात भी फर्जी निकले । उन्होंने थाने में रिपोर्ट लिखाई पर उनका कुछ पता नहीं चला.. जीवन भर की कमाई  लुट चुकी थी , धोखे का यह घात असहनीय था...पर क्या किया जा सकता था..मानवता पर से उनका विश्वास उठ चुका था ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

Saturday, 28 July 2018

चोरी और सीनाजोरी

रिश्वतखोर आर. टी. ओ. साहब की पत्नी अक्सर अपने ऐश्वर्य , वैभव का बखान करते रहती है । उनके पति रिश्वत लेते हैं , इस बात की कोई शर्मिंदगी नहीं..इसे कहते हैं चोरी और सीनाजोरी ।
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लगातार दूसरी बार सरपंच के पद पर निर्वाचित उमाबाई ने अपने बेटे को सीमेंट  , छड़ की दुकान खुलवा दी है... गाँव की सड़क , पंचायत भवन इत्यादि सरकारी निर्माण कार्यों का ठेका भी दिलवा दिया । छोटा सा घर बंगला बन गया है , बड़ी गाड़ी भी खरीद ली है... और बड़े शान से कहती है मैंने गाँव का विकास कर दिया...इसे कहते हैं चोरी और सीनाजोरी ।
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दिन भर के थके  मान्दे  मंगलू ने आखिरी सवारी को उसके मंजिल तक पहुँचा कर अपना किराया माँगा... दबंग सवारी ने पैसे तो दिए नहीं उल्टे दो हाथ जड़ दिये.. साले रिक्शा चलाने वाले...मुझसे पैसे माँगता है..औकात देखी है अपनी...इसे कहते हैं चोरी और सीनाजोरी ।
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नेताजी सभाओं में नारी मुक्ति पर खूब भाषण देते हैं ...उनके कल्याण की बड़ी बड़ी बातें करते हैं , पर घर की औरतों को खुलकर बोलने की भी आजादी नहीं देते
...इसे कहते हैं चोरी और सीनाजोरी ।

स्वरचित -- डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

Monday, 23 July 2018

बदलाव ( लघुकथा )

उन्हें  हड़ताल करते  पच्चीस दिन हो गए थे...पिछले माह तो तनख्वाह मिली  नहीं थी ...इस बार मिलने का सवाल ही नहीं था ...वैसे भी कमाओ खाओ वाली स्थिति रहती है... कोई जमापूंजी तो है नहीं कि उससे काम चलाते । पत्नी , बच्चों का बेहाल चेहरा उन्हें कमजोर कर रहा था ...बेबसी तोड़ रही थी उनकी हिम्मत । सभी जानते थे अभी नहीं तो कभी नहीं...इस बार वेतन नहीं बढ़ा तो फिर कभी नहीं बढ़ेगा । बढ़ती महंगाई में वेतन बढ़ाने की आवश्यकता हर कोई समझ रहा था पर प्रबंधन नहीं । वे जानते थे भूख जल्दी ही यह हड़ताल तोड़ देगी इसलिए उनके बिना शर्त वापस लौटने का इंतजार कर रहे थे ।
        पुरुषों की टूटती हिम्मत देखकर सावित्री आगे आई थी... सबसे पहले उसने अपना मंगलसूत्र निकालकर रख दिया और कहा - आप लोग हिम्मत मत हारिये ...हम व्यवस्था करेंगे खाने पीने की...  फिर और भी महिलाएं आगे आई ...बारी बारी अपने जेवर गिरवी रखकर..सड़कों पर घूमकर मदद माँगेगे... लोग जरूर साथ देंगे क्योंकि हम गलत नहीं है... अपने परिवार के पालन - पोषण के लिए बढ़ती महंगाई के साथ वेतन बढ़ाने की माँग करना कोई गलत काम नहीं है  । नारी शक्ति के सहयोग ने एक नई जान फूँक दी थी आंदोलन में... कल तक कमजोर पड़ रहा आंदोलन और मुखर हो उठा था...परिस्थितियां बिल्कुल बदल गई थी... और प्रबंधन के विचार भी । उन्होंने बदलाव को महसूस कर लिया था और उनकी वेतनवृद्धि की माँग मान ली  थी ।

स्वरचित -- डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़

Monday, 16 July 2018

अविस्मरणीय पल ( संस्मरण )

अविस्मरणीय  पल
वैसे  तो जीवन के कई पल अविस्मरणीय हैं फिर भी उनमें से सर्वश्रेष्ठ चुनने कहा जाये तो मुझे सन 1997 की बात याद आती है जब बीमारी की वजह से माँ का आकस्मिक निधन हो गया था । पच्चीस वर्ष की उम्र में माँ को खोना अपूरणीय क्षति होती है किंतु मेरे परिवार के सदस्यों ने मेरे जीवन में आई इस कमी को भरने की भरपूर कोशिश की । जिस प्रकार शिलाखण्ड के टूटने पर  बने खाली स्थान को भरने के लिए चारों तरफ से अथाह जलराशि  दौड़ पड़ती है उसी प्रकार सभी तरफ से मुझ पर स्नेह की वर्षा हुई । सास ने अपनी ममता का आँचल मुझ पर तान दिया तो ससुर जी ने भी  खूब प्यार दिया । तीजा पर लेने आये मेरे पापा से उन्होंने कहा कि दीक्षा अब तीजा यहाँ अपनी माँ के साथ मनायेगी , उस समय मेरे भाइयों की शादी नहीं हुई थी घर पर कोई महिला नहीं थी । पतिदेव ने मुझे अपनी  बाहों में भरकर कहा-- माँ से मायका होता है , तुम्हारी माँ नहीं रही तो आज से यही तुम्हारा मायका है । मैं तुम्हें उनकी कमी कभी महसूस करने नहीं दूँगा ...उन्होंने अपना वादा निभाया..जब - जब मुझे भावनात्मक  सहारे की आवश्यकता हुई  वे मेरे सम्बल बने  । बड़े भाई ने हमेशा अभिभावक की भूमिका निभाई... बरगद की छाँव की तरह हम दोनों छोटे भाई - बहन को उन्होंने अपने स्नेह की छाया में रखा । मामा और मामी ने भी  भरपूर प्यार दिया  । माँ बनते समय ही एक बेटी को  माँ की सबसे अधिक  जरूरत होती है , उस वक्त मेरी सास , ननद व जेठानी ने मुझे जो प्यार ,सहयोग  दिया , मेरी  देखभाल की वो मेरे लिए बहुमूल्य क्षण हैं । अपनों के प्यार के साथ हम हर कठिन परिस्थिति से बाहर निकल सकते हैं , मैंने यही सीखा । वे मेरे जीवन के अविस्मरणीय पल हैं जो मुझे भुलाये नहीं भूलते , न ही मैं इन्हें भूलना चाहती हूँ क्योंकि ये पल मुझे नित नई ऊर्जा प्रदान करते हैं ...जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , दुर्ग , छत्तीसगढ़