Friday, 30 August 2019

ग़ज़ल

ओझल हुआ रवि थक कर दिन हुआ तमाम ,
सभी जीव घर लौटने  लगे हो गई है शाम ।

भोर से  जो शुरू हुई  भागमभाग जिंदगी की,
क्षीण हुई ऊर्जा तन की , पूरे हो गये सब काम ।

पीड़ा , थकन , भटकन लगी रहेगी देह की ,
दो घड़ी बैठकर  शांत अब कर लो कुछ आराम ।

चिंता , शंका , क्रोध मन में आते ही रहते ,
भूल इन  मन के भावों को पी लो खुशी के जाम ।

चंचल  मन के घोड़े निरन्तर भागते ही रहते ,
चित्त को स्थिर बना जरा कस दो इसकी लगाम ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Wednesday, 28 August 2019

नेता जी

चुनाव क्या जीते नेता जी ,
हो गये  खूब  मोटे नेता जी ।
आलीशान हो गई  हवेली ,
कद के  हुए छोटे नेता जी ।
झूठे वादों से मन भरमाए ,
बने  दिल के खोटे नेता जी ।
कमीशन , रिश्वत खूब खाए ,
घी तर माल झपेटे नेता जी ।
बात खुली तो पकड़ में आये ,
जाँच कमीशन के लपेटे नेता जी ।
धन कमाया कुछ काम न आया ,
जेल में  पत्थर कूटे नेता जी ।
दोस्त न कोई सगा - सम्बन्धी ,
खुद से हारे - टूटे नेता जी ।
धन बल पद को पूजे दुनिया ,
चमचों , भक्तों से छूटे नेता जी ।

स्वरचित - डॉ.  दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Tuesday, 27 August 2019

आत्म सम्मान ( लघुकथा )

शीला जब शाम को बर्तन माँजने  शारदा देवी के घर पहुँची तो वहाँ गहमा गहमी थी । उनकी सोने की अंगूठी जो उन्होंने नहाने जाने से पहले खाने की टेबल पर रख दी थी , वह गुम हो गई थी । उन्होंने पूरा घर छान मारा था और न मिलने पर उन्हें शक नौकरों पर ही हो रहा था
।  उसके पहुँचते ही उससे भी पूछताछ होने लगी थी , यह देखकर शीला को बहुत दुःख हुआ । क्या नौकरों का कोई आत्मसम्मान नहीं होता ? शीला कई वर्षों से उनके घर पर काम कर रही थी , कभी कोई चीज चोरी नहीं हुई । उस पर विश्वास करके मालकिन घर की चाबी भी उसके पास छोड़ देती थी । इस घटना ने उसे चिंतित कर दिया था और वह उनके साथ मिलकर अंगूठी को  ढूँढने  लगी थी । अंगूठी वहीं कमरे में आलमारी के नीचे मिल गई थी पर शीला के आत्मसम्मान को ठेस पहुँची और उसने शारदा देवी के घर का काम छोड़ दिया था ।
अविश्वास के कारण शारदा देवी ने एक ईमानदार सहयोगी खो दिया था ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Monday, 26 August 2019

ग़ज़ल

हमने क्या समझा था वे क्या निकले ,
होगी बहार सोचा था पर खिजां निकले ।

चेहरे पे  ओढ़कर झूठी  मुस्कान ,
वो हमदर्दी का चढाये मुखौटा निकले ।

मुँह में राम  बंदूक बगल में रखते ,
मेरे कत्ल का लेकर  वो सामान निकले ।

हाथ मिलाते है पीठ में खंजर लेकर ,
मुस्कुराते होठों से उनकी बददुआ निकले ।

करते थे जिनसे वफ़ा की उम्मीद" दीक्षा ",
सनम वही संगदिल बेवफा निकले ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,  छत्तीसगढ़

Sunday, 25 August 2019

माँ की व्यथा

प्रिय बेटे  ,
       उस दिन तुम  कहकर गये थे न कि अभी लौट कर आता हूँ । तुम अब तक नहीं आये , यहाँ सब तुम्हारी प्रतीक्षा  में हैं । रोज नाश्ते , खाने के समय टेबल पर तुम्हारी कमी महसूस होती है.. लगता है कि तुम कहीं से आओगे और पूछोगे माँ आज क्या स्पेशल बनाया है । कई बार ऐसे ही दरवाजे तक आती हूँ.. लगता है कि घण्टी बजी है पर वहाँ कोई होता नहीं है ।  घण्टों तुम्हारे कमरे की सफाई करते रहती हूँ , तुम्हारी किताबों को जमाते रहती हूँ । तुम्हारी आलमारी के आगे खड़े होकर तुम्हारे कपड़े देखती रहती हूँ और उनमें तुम्हारी छवि को याद करती रहती हूँ  ।  यह सब करके चाहती हूँ तुम वैसे ही मुझसे नाराज हो कर कहो - अरे माँ तुम मेरा सामान मत जमाया करो , फिर मुझे कुछ मिलता नहीं है । पहले तुम्हारे ऐसा करने पर मैं नाराज होती थी न , पर अब उन्हीं शब्दों को सुनने को कान तरस गये हैं । वो पेपर वेट जिसे अक्सर अपने हाथों में उठाकर ऊपर फेंकते रहते थे तुम..अब भी तुम्हारी राह तक रहा है । तुम्हारी बाइक मैने  साफ करके चमका दी है जिससे तुम्हें बहुत प्यार है ।
          वो मुहल्ले के गाय , कुत्ते , जिन्हें तुम रोटी और बिस्किट खिलाते रहते थे ...गेट पर खड़े रहकर तुम्हारा इंतज़ार करते हैं... रोटी देने के बाद भी नहीं जाते शायद  उस प्यार भरे स्पर्श के लिए जो तुम उन्हें सहला कर व्यक्त करते थे । घर पर अब न टी. वी. के रिमोट के लिए झगड़ा होता है और न चार्जर के लिए । न कोई किसी को चिढ़ाता है न मजाक करता ...सब चुप से हो गए हैं मानो  आँखें खुली रख कर सो गये हों । तुम क्या गये जीवन से रौनक ही चली गई । बिना नमक की सब्जी , बिना इंसान के घर या बिना प्राण के देह की तरह सब कुछ बेमानी सा लगता है । मालूम है तुम लौट कर नहीं आओगे फिर भी एक उम्मीद सी लगी रहती है,
नजरें दरवाजे से हटती ही नहीं ...कभी  अपनी गोद में खिलखिलाता तुम्हारा बचपन याद आता है ...कभी एक सफेद चादर में लिपटी तुम्हारी पार्थिव देह...काश ! उस दिन वह ट्रक ड्राइवर शराब नहीं पिये होता या तुम अपने दोस्त के जन्मदिन की पार्टी में न जाते । काश ! उन बीते लम्हों  को डिलीट कर सकती अपनी जिंदगी से और वापस ले आती तुम्हें । अपने  युवा बेटे को खोने से  बड़ा
भी कोई  दुःख  हो सकता है । काश ! मैं ईश्वर से अपने बदले तुम्हारी जिंदगी माँग पाती । ये सूनी आँखें आज भी तुम्हारा इंतज़ार कर रही हैं और करती रहेंगी शायद पथरा जाने तक 🙁

✍️✍️ डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Saturday, 24 August 2019

कान्हा

कान्हा तेरी  रीत निराली
सहज प्रेम से आत्म ज्ञान तक ,
सीधी , सच्ची राह दिखा दी ।

कान्हा तेरी प्रीत निराली
भा गये गोपियों के माखन ,
सुदामा के चावल ने भूख मिटा दी।

कान्हा तेरी जीत निराली
अहंकार , मद - मोह के बंधन ,
अत्याचारियों  से मुक्ति दिला  दी ।

कान्हा तेरी नीति निराली
सबल न छीने हक निर्बल का ,
विरोधियों  को धूल चटा दी ।

कान्हा तेरी दोस्ती निराली
बालसखा का मान बढ़ाया ,
सभा में द्रोपदी की लाज बचा ली ।

कान्हा तेरी विधि निराली ,
दुनिया को गीता - सन्देश दिया ,
अधर्म पर धर्म को जीत दिला दी ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Thursday, 22 August 2019

मुक्तक

गोकुल की गलियों में  रचाया है रास ,
उंगलियों में  गोवर्धन होठों पे स्मित हास ।
कालिया के फन पर थिरक उठे कृष्ण_
कर्म का संदेश देकर बन गये हो खास ।

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चीरहरण  द्रोपदी का देख न पाये तुम ,
उस की लाज बचाने दौड़ के आये तुम ।
अस्मत दांव पे लगती है हर रोज यहाँ _
कृष्ण उन्हें क्यों न न्याय दिलाये तुम  ।

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नटखट नन्दलाल  तू है बड़ा प्यारा ,
बांसुरी की तान पे नचाये ब्रज सारा ।
कहाँ छुप गये हो  मनमोहन मुरारी _
दरस को राह निहारे जग सारा ।

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सज  रहा पूनम का चाँद  तारों की चूनर ओढ़ के ,
रचा रहे गोपियों संग रास लोक लाज  छोड़ के ।
प्रीत की रीत है निराली मुखड़ों पे घूँघट न लाज_
चली आई  राधा भी आज बन्धन सारे तोड़ के ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़