Thursday, 28 November 2019

बेजुबान ( लघुकथा)

पायल बेजुबान सी पुलिस द्वारा उसके पति सुनील को पकड़कर ले जाते देख रही थी । उसके कोई प्रतिरोध न करने पर लोग हतप्रभ थे परंतु वह तब भी नहीं बोली थी जब उसकी मर्जी के बिना उसकी शादी कर दी गई । तब भी नहीं जब सुनील शराब पीकर उसे मारता - पीटता । जब जी चाहे घर आता जब जी चाहे कहीं चला जाता । तब भी कुछ नहीं कहा जब उसकी मर्जी के बगैर कई बार..... आज पहली बार अपने बेजुबान होने पर उसे अफसोस नहीं हो रहा था ।

स्वरचित -डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Wednesday, 27 November 2019

दिन है तू रात मैं

दिन है तू रात मैं , मिले कहाँ  कोई कहे ।
क्या करूँ बात मैं , दूरियाँ दरमियाँ रहे ।
वक्त की धार में ,ख्वाहिशें बनके पात बहे ।
मार मुश्किलों  की ,बता कोई कब तक सहे ।
दिन और रात मिल , एक नया क्षितिज गढ़ें ।
प्रेम के उजास में , थामकर  हाथ आगे बढ़ें ।
दो विपरीत रंग घुल - मिलकर नया रंग बनें ।
एक पथ के साथी हम एक जिस्म के अंग बनें ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे , छत्तीसगढ़

अनपढ़ ( लघुकथा )

 अनपढ़ (लघुकथा )

     अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए राज के आँसू अनवरत बह रहे थे... उच्च अधिकारी होने का दंभ उन आँसुओं में तिरोहित हो गया था । आज रेणु ने अपनी एक किडनी देकर उसकी जान बचा ली थी जिसे अनपढ़ समझकर उसने जिंदगी भर उपेक्षित किया था । माता - पिता के दबाव के कारण उसने रेणु से शादी तो की थी लेकिन कभी दिल से उसे अपनाया नहीं
। रेणु बिना किसी शिकायत के अपने दायित्व निभाती रही , आज उसने साबित कर दिया था निःस्वार्थ प्रेम और त्याग किसी डिग्री का मोहताज नहीं होता , साथ ही अपने पति के हृदय में वो स्थान बना चुकी थी जिसकी वह हकदार थी । इतने वर्ष साथ रहकर राज रेणु के मन को पढ़ नहीं पाया। यह प्रश्न उसके मन को उद्वेलित करता रहा "अनपढ़ रेणु है या वह ?"

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

किस्मत ( लघुकथा )

" किस्मत का लिखा कौन टाल सकता है बेटा ! पर तुमको बच्चों के लिए अपने - आपको सम्भालना होगा " - रश्मि को घेर कर बैठी औरतें विलाप कर रही थीं । पैतीस वर्ष  की रश्मि के पति का आकस्मिक निधन हो गया था । आठ वर्ष और दस वर्ष की दो बेटियों के साथ अब वह जीवनपथ  पर अकेली हो गई थी ।  सही कहा था बुआ ने - अपनी किस्मत पर रोने की बजाय अब उसे धैर्य व साहस के साथ जीना होगा , परिश्रम से अपने प्रारब्ध को बदलना होगा । दृढ़ निश्चय ने  निराशा व दुःख की इस घड़ी में  भी उसके चेहरे की आभा बढ़ा दी थी ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग  , छत्तीसगढ़

Monday, 25 November 2019

कुछ खट्टी कुछ मीठी

कुछ खट्टी कुछ मीठी यादें मन को भिगो गई ,
मानो रिमझिम फुहारें अम्बर- धरा को धो गई ।

दौड़ गई फिर एक बार बचपन की गलियों में ,
वो लड़कपन वो मस्ती जाने कहाँ खो गई ।

वो शैतानियाँ , नादानियाँ , बदमाशियाँ ,
न जाने गुड़िया के किस पिटारे में सो गई ।
 
माँ की डाँट से बचने को पापा के कंधे चढ़ी ,
रहती वैसी गुड़िया सी क्यों मैं बड़ी हो गई ।

सखियों की सब बातें याद मुझे आने लगीं ,
रोक न पाई जज्बातों को न जाने कब रो गई ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़




Sunday, 24 November 2019

बोलती तस्वीर

समाज रूपी वृक्ष की दो शाखाएं नर और नारी ,
सींचते , सँवारते मिलकर देखती दुनिया सारी ।
जड़ें  यदि मजबूत हो तो वृक्ष भी फल देगा ,
समन्वय व सहयोग सफलता की अधिकारी ।
नन्हीं - नन्हीं शाखें विकसित हो रही तनों से ,
प्रेम और सद्भावना से सींचें जग की क्यारी ।
व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर चलें अब ,
फैलाएँ सौरभ अमन का महका दें फुलवारी ।
राष्ट्रप्रेम की लौ जलाकर रौशन कर दें जहां ,
उड़ान को मिला  गगन परिंदे  हुए आभारी ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Friday, 22 November 2019

किसके लिए ( लघुकथा )

आज  मेरी सहेली सुहानी बहुत गुस्से में थी । जब से आई थी दूसरों पर अपनी खीझ उतार रही थी और चिडचिड़ा रही थी ।
दरअसल  वह अपने पति और बच्चे पर उसका कहा कोई काम न कर पाने के कारण होने वाले नुकसान पर बरस कर आई थी । मैंने उससे पूछा कि उसने इतनी उम्र में क्या पूँजी बनाई है । विषय से हटकर अब वह अपनी सम्पत्ति गिनाने में लग गई थी । उसके बाद मेरा अगला प्रश्न था कि उसके पति और बच्चों के बिना इस सम्पत्ति का उसके लिए क्या महत्व है ? वह निरुत्तर हो गई थी क्योंकि सचमुच उसके जीवन की सबसे बड़ी सम्पत्ति उसका परिवार था । फिर यह गुस्सा किसके लिए ? अपने - आप से पूछे गये इस प्रश्न ने उसे शांत कर दिया था ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़