Saturday, 28 March 2020

सजल - 18

समां त - ओला 
पदांत -  है
मात्रा भार - 15
मात्रा पतन - *
❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
शबनम नहीं यह शोला है
प्रेम एक आग का गोला है
❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
मन मिले तो रूप - रंग क्या
झूठा यह* तन का चोला है
❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
नेकी पर दुनिया यह टिकी 
 सन्मार्ग से क्यों डोला है
❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
खुशी कहीं है गम कहीं पर
जीवन तो एक हिंडोला है
❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
दिल में प्रिय की मूरत बसी 
आँखों  ने  राज खोला  है
❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़









Tuesday, 24 March 2020

कोरोना

कोरोना

कहते हैं मनुष्य को अपने बुरे कर्मों का
 फल यहीं भुगतना पड़ता है
बहुत किया प्रकृति से छेड़छाड़
वनों का विनाश,असन्तुलित पर्यावरण।
रसायनों का अधिकाधिक  प्रयोग
वायु  , जल , मिट्टी का प्रदूषण।
अत्याधुनिक हथियार , 
अस्त्र - शस्त्र , सुरक्षा के औजार  ।
कल - कारखाने  ।
वो चाँद , ग्रहों की सैर
चमचमाते शहर , बड़ी - बड़ी बिल्डिंग
मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर
यही है ना तरक्की के पैमाने ।
कहाँ हैं ये सब 
आते क्यों नहीं 
मानव  अस्तित्व बचाने ।
अब तो मिल गये  होंगे न तुम्हें ,
अपने सारे सवालों  के  जवाब ।
तुम कुछ भी नहीं हो
उस ईश्वरीय सत्ता के आगे
वो ,उसकी व्यवस्था है लाजवाब।
प्रकृति का दोहन किया तुमने बेहिसाब।
मौत के आगे तुम हो जाते ,
बेबस , लाचार ।
अब तो सुधार लो ,
अपने आचार - विचार , व्यवहार ।
बाढ़ ,तूफान , महामारी , संक्रमण 
ये हैं सिर्फ रूप उसकी  चेतावनी के
मानव ! सुधर , समझ
 तरक्की की अंधाधुंध दौड़ में 
विनाश बन्द करना होगा ।
विज्ञान और पर्यावरण में ,
सन्तुलन रखना होगा ।
अपने अस्तित्व को बचाने ,
प्रकृति के साथ चलना होगा ।
अपनी महत्वाकांक्षाओं पर,
 लगाम कसना होगा ।
बिगड़ा नहीं अभी कुछ
वक्त है अभी भी बहुत ,
मानव तुम्हें सम्भलना होगा
सृष्टि को बचाने ,
तुम्हें सम्भलना ही होगा ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Monday, 23 March 2020

जनता कर्फ्यू और शंखनाद

बाइस मार्च ....आज की सुबह उठी तो मन में एक संशय था हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री द्वारा आहूत किया गया जनता कर्फ्यू अभियान सफल होगा कि नहीं परन्तु जैसे ही आँगन में आई सारे संशय उसी तरह मिट गये जैसे धूप के निकलने पर ओस की बूंदें । चारों ओर सन्नाटा पसरा था , गलियाँ सूनी पड़ी थी , बाहर न कोई इंसान था न कोई जानवर । यहाँ तक कि छोटे बच्चे भी अपने घरों में खेलते रहे । आज पहली बार कामवाली बाई के न आने पर दुःख नहीं हुआ बल्कि खुशी हुई कि यह वर्ग भी इतना जागरूक हो गया है । जनता कर्फ्यू की सफलता यह सिद्ध करती है कि कानून या सख्ती से बढ़कर मनुष्य का स्व - अनुशासन अधिक महत्वपूर्ण है । सबने कोरोना की भयावहता को समझ लिया है और इससे लड़ने को तैयार हैं । भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश का अपने - आपको घर में स्वस्फूर्त बन्द कर लेना विश्व को एक महान सन्देश देता है कि हम अपनी सुरक्षा के लिए कितने जागरूक हैं ।
           शाम को पाँच बजे जब हम शंख , थाली व घण्टी लेकर बाहर निकले तो अद्भुत नजारा देखने को मिला । लोग अपने घर के बाहर तैयारी के साथ खड़े थे । थाली , ताली ,शंखनाद के द्वारा सभी ने अपनी सहभागिता दी और कोरोना के कर्मवीरों के प्रति अपनी सद्भावना को व्यक्त किया । इस आवाज को सुनने वाले वहाँ आस- पास हों या न हों परन्तु एक - दूसरे का सबने हौसला बढ़ाया और दूर रहकर भी यह संदेश दिया कि मुसीबत की इस घड़ी में हम साथ हैं । इस वक्त न कोई वर्गभेद था न  कोई जातिभेद , सभी सिर्फ और सिर्फ भारतीय थे । यह हमारी संस्कृति है जो हमें उदार , शांतिप्रिय और  समन्वयशील बनाती है । यह नजारा वाकई मर्मस्पर्शी था । शाहीनबाग में धरना दे रहे और विदेशों से आकर छिपने व अलग न रहकर दूसरों को संक्रमित करने वाले लोगों के प्रति हर किसी के मन में आक्रोश है । काश ! वे स्थिति की भयावहता को समझते और सावधान रहते तो बीमारों की संख्या इतनी भी न होती ।
          यह हमारे समाज और देश के हित में है कि हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझे , सतर्कता बरते , कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए बताये जा रहे नियमों का पालन करे , भीड़भाड़ वाले जगहों पर जाने से बचें । 
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

सजल - 17

समांत - आह
पदांत - है वहाँ
मात्रा भार - 19
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प्यार है जहाँ , नहीं आह है वहाँ
दर्द है जहाँ  , अश्कगाह है वहाँ
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रात की पनाह में ,  भोर है छिपा
चाह है जहाँ  नई  राह है वहाँ
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बाँध दे जो तीव्र जाह्नवी  की * धार
 उसी धीर  की वाह - वाह है वहाँ
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आस के उजास की  हिलोर है जहाँ
प्रेम  की प्रगाढ़ता की थाह है वहाँ
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त्याग , तोष , तप  की विनीत साधना
भावना का सघन प्रवाह है वहाँ
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़




एक हुए आज हम

एक हुए आज हम
एक सबका कर्म है ।
न जात है न पात है
न वर्ग है न धर्म है
मंजिल है एक हमारी
एक सबका कर्म है ।
इरादे बुलन्द हैं
मदद को बढ़े हाथ है
मानव - कल्याण हित
आज हम साथ हैं
पीड़ा है एक हमारी
एक सबका मर्म हैं ।
एक हुए आज हम 
एक सबका कर्म है ।
मुसीबत जो आई है
वो रंग न पहचानती
राज्य , देश और विदेश
कोई सीमा न जानती
मिटाना है इसे हमें
यह युद्ध राष्ट्रधर्म  है ।
एक हुए आज हम
एक सबका कर्म है ।
हौसलों के पर हैं
उमंगों के परवाज हैं
प्रकृति की आपदा के
खिलाफ मुखर आवाज है
चुनौती ये स्वीकार कर
हुआ खून  गर्म है ।
एक हुए आज हम
एक सबका कर्म है ।
सावधान रहें सभी
कोई  न संशय हो
हराना है विषाणु को
मन में न कोई भय हो
संक्रमित जो हो गये
बोलने  में क्या शर्म है ।
एक हुए आज हम
एक सबका कर्म है ।
पावन है ये वसुंधरा
संस्कृति मनभावनी
शांति और सद्भावना
भारत की पहचान बनी
जीतेंगे जरूर हम
आरम्भ किया जो जंग है ।
एक हुए आज हम
एक सबका कर्म है ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़









 

Friday, 20 March 2020

कोरोना ब्रेक ( लघुकथा )

    एक कामकाजी गृहिणी के लिए अपनी अभिरुचियों के लिए वक्त निकालना मुश्किल होता है । कोरोना के कारण मिले आकस्मिक अवकाश ने शिखा को यह अवसर दे दिया था । पतिदेव से पेंट - ब्रश मंगाकर उसने एक पेंटिंग बनाना शुरू कर दिया , बचपन से ही यह कला उसे एक अलग दुनिया में ले जाती थी ..उसकी अपनी दुनिया जहाँ न कोई नियम - कानून थे और न ही कोई बंदिश । उसके अपने खास रंग थे जो नये - नये खाके में उभरने लगते । वह मंत्रमुग्ध हो कर पेंटिंग बनाती किसी को वह पसन्द आये न आये पर अपने सृजन को देखकर  उसे जो खुशी मिलती वह अनमोल थी । 
             आज का दिन कुछ विशेष था उसकी पेंटिंग देखकर दोनों बच्चे अत्यंत प्रफुल्लित हुए साथ ही चकित भी। " माँ ! आप तो बहुत खूबसूरत पेंटिंग बनाती हैं बिल्कुल बाजार में मिलने वाली पेंटिंग्स की तरह ।  आप हमेशा क्यों नहीं बनाती ? " बिटिया ने आँखें फैलाकर कहा । उसके आठ वर्षीय भाई ने  समर्थन किया और पापा ने भी । उतना वक्त नहीं निकाल पाती.. धीमी आवाज में शिखा ने उत्तर दिया था । " मम्मा आज के बाद आप अपनी पेंटिंग्स के लिए समय निकालेंगी और हाँ मेरे कमरे के लिए आपको बड़ी वाली तस्वीर बनानी होगी " बिटिया ने उसके गले में अपनी बाहें डालकर मनुहार की तो शिखा मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी । इस कोरोना ब्रेक ने रोजमर्रा के कामों से ऊबते सीले से मन को ताजगी की धूप दिखा दी थी ।
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़
 

Thursday, 19 March 2020

सजल 16

 खनक रहा है बहुत समझ लो वह  सिक्का  तो खोटा है
कभी किसी के काम न आया  ज्ञान समझिए थोथा है 
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शांत रहे  वह  सदा   ज्ञान का जो अथाह भंडार रहे
आधी भरी गगरी का जल ही बहुत  उछलता है 
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दौड़ लगानी होगी  तुमको साथ - साथ चलकर
समय  किसी के लिए  भला कब और कहाँ ये रुकता है
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बैठ किनारे  रह जाने  से नहीं कभी कुछ  मिलता  है
डूब गया जो गहरे तक उसको ही मोती मिलता है
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पूरी उम्र बीत जाती है तब  जाकर मिलता अनुभव 
नहीं लौटकर आता है वो पल जो कर से  छूटा  है
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स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़