Friday, 31 July 2020

छत्तीसगढ़ी गीत

देखत हावव रस्ता तोर , तरिया के पार मा ।
आ जाबे गोरी तैं हर , सोलह सिंगार मा ।।

धान  कस सुघ्घर हरियर तोर लुगरा हे ,
बादर कस करिया तोर आँखी के कजरा हे ।
 ददरिया गाबो दुनो झन , बुता करत खार मा ।
आ जाबे गोरी तें हर , तरिया के पार मा ।।

लाली लाली चुरी पहिरे ,कनिहा करधनिया ओ ,
सुरुज असन दमकत हे ,माथे के बिंदिया ओ ।
झूम जाथे मोर जियरा  ,पैरी के झनकार मा ।
आ जाबे गोरी तें हर , सोलह सिंगार मा ।।

तोर बोली कोइली असन , अब्बड़ नीक लगथे ,
नागिन सही तोर केश म , मोर नैन अरझथे ।
जिवरा हर मोर भेदागे , तोर नैन के कटार मा ।
आ जाबे गोरी  तैं हर , सोलह सिंगार मा ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़









राखी ( लघुकथा )

  राज की अपनी सहकर्मी नेहा से बिल्कुल नहीं जमती थी , अकड़ू , घमंडी इत्यादि उपनामों से कई बार सुशोभित किया था उसे । नेहा  की भी राज के बारे में यही राय थी कि वह अपने आपको तीसमार खान समझता है जैसे उससे होशियार दुनिया में कोई और है ही नहीं । सच भी था कि राज अपने कार्य में एक्सपर्ट था । पिछले कई वर्षों से देख रही थी नेहा ,राज पूरे वर्ष अपनी बहन की राखी नहीं उतारता था । राखी के दिन ही पुरानी राखी तोड़कर नई बंधवाता था । इस बार उसने नई राखी नहीं बाँधी थी ,वही पुरानी राखी पहने घूम रहा था तो नेहा ने उसे सुना दिया " इस बार दीदी से लड़ लिया क्या लड़ाकू तभी दीदी ने राखी नहीं भेजी "। हमेशा बहस करनेवाले राज की आँखें नम हो गई और वह बिना कुछ कहे चुपचाप वहाँ से चला गया । उसके दोस्त निहार ने बताया कि राज की बहन का निधन हो गया है । नेहा को अपने बर्ताव पर बहुत पछतावा हुआ । वह ऑफिस में सबके सामने जोर से रोने लगी और राज से माफी माँगने लगी । उसने अपने बैग से राखी निकाली और राज की कलाई पर बाँधते हुए बोली - "अब यह कलाई कभी खाली नहीं रहेगी , यह अकड़ू बहन चलेगी न । "
  राज ने हँसते हुए कहा - "सोच लो , फिर तो तुम्हें डाँटने का कॉपीराइट मिल जाएगा मुझे "।  " चलेगा ..भाई - बहन के प्यार में लड़ाई तो चलता है, इस लिहाज से पहले ही हम भाई बहन बन चुके हैं ,है ना.." दोनों की आँखों से खुशी के आँसू झर रहे थे ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़

Thursday, 30 July 2020

दोहे ( अहंकार )

चार दिनों की जिंदगी , मत कर तू अभिमान ।
महल काम आए नहीं , छूटे सब सामान ।।

जाना है सबको यहाँ , अहंकार को त्याग ।
बहुत दिनों सोया रहा , बीती बेला जाग ।।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़

शिक्षादान ( लघुकथा )

*शिक्षादान* (लघुकथा )
         शादी के बाद रुचि को पति के साथ मुंबई आना पड़ा । उसे अपनी चार वर्ष की नौकरी छोड़नी पड़ी , यह बात उसे बहुत पीड़ा दे रही थी । पति के ऑफिस चले जाने के बाद वह बहुत   बोर होती , पहले  उसकी कितनी व्यस्त दिनचर्या रहती थी । एक दिन उसके पड़ोस में रहने वाली चाची अपनी बेटी प्रिया को लेकर आई जिसे अपनी पढ़ाई में कुछ समस्या आ रही थी । रुचि ने उसे कुछ दिन पढ़ाया , प्रिया को उसके पढ़ाने की शैली पसंद आई और उसने आगे भी पढ़ाने के लिए रुचि  से निवेदन किया । प्रिया की दो - तीन सहेलियाँ भी पढ़ने आने लगी थीं । रुचि को अपनी शिक्षा सार्थक लगने लगी थी । शिक्षित होने की अंतिम परिणति सिर्फ नौकरी ही क्यों ? थोड़ा ही सही पर समाज को वह अपना योगदान तो दे रही थी । शिक्षादान करके उसे अत्यंत सन्तुष्टि और आनन्द की प्राप्ति हो रही थी  ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Wednesday, 29 July 2020

बेटी पर दोहे

दोहे
विषय - बेटी

बेटी पढ़ती है  यहाँ , जीवन रुपी किताब ।
मन के कोरे स्लेट पर , मिलते लिखे जवाब ।।

पढ़ी लिखी बेटी  करे , राष्ट्र जगत  कल्याण ।
 बदलें सभी विचार तब  ,  मिले दुखों से त्राण ।

पढ़ - लिखकर बेटी बने  , मात- पिता का मान ।
सफल रही हर क्षेत्र में  , सभी काम आसान  ।

मलयज की पावन महक  , मधुबन की है शान ।
बेटी पढ़ -लिख कर बनी , दो घर का अभिमान ।

दीपक के उजियार से, अँधियारा हो दूर ।
पढ़-लिख बेटी हो सफल , प्रियजन करें गुरूर ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़




मुक्तक

मर्यादित है नीर नदी के तटबंध में ,
पलता है विश्वास प्रेमाकुल सम्बन्ध में ।
प्रेम देना पड़ता है प्रेम पाने के लिए_
रीत की सौगंध है प्रीत के अनुबंध में ।।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़ 

Monday, 27 July 2020

गीत 18

गीत

जीवन-पथ पर चलने की, सही राह दिखलाई है ।
रामकथा लिखकर तुलसी ने , जन-जन तक पहुँचाई है ।।

मात-पिता का मान बढ़ाया , पाठ पढ़ाया संयम का।
वनवास लिया हँसते- हँसते ,वचन निभाया रघुकुल का।
महलों का वैभव त्याग दिया , कुल की रीति निभाई है।।
रामकथा लिखकर.....

शबरी के जूठे बेर चखे, गुहराज-राम मित्र बने ।
 उद्धार अहिल्या का करके, अनुकरणीय चरित्र बने।
 दैत्यों को यमलोक दिखाया, संतों की पहुनाई है ।
रामकथा लिखकर.....

बाली वध कर शासन भार्या , मित्र सुखद उपहार दिया ।
पत्नी की रक्षा की खातिर , रावण का संहार किया ।
मर्यादित आचरण सिखा कर , राहें नई दिखाई है ।।
रामकथा लिखकर....

पालनहार बने जनता के , दीन-दुखी को अपनाया ।
समरसता का पाठ पढाकर ,जंगल को नगर बनाया ।
राम -राज्य  में सुखी रहें सब , राज नीति सिखलाई है ।
रामकथा लिखकर.....

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़