जिंदगी क्या से क्या हो गई है ,
दिन बीत रहे हैं ,
उम्र रीत रहे हैं मगर...
धड़कनें कहीं खो गई है ।
पंख है ,परबाज है ,
साज है , आवाज है पर ...
तरानों की सरगम खो गई है ।
शिकवे हैं , वादे हैं ...
रिश्ते हैं , नाते हैं वो ...
बातों की मिठास खो गई है ।
आस है ,प्रयास है ,
मन में विश्वास है ...
जाने क्यों तकदीर सो गई है।
बेबस हाल है ,
ठनठन गोपाल है...
मजबूरी भी हमपे रो दी है ।
दर्द भरी आहें हैं,
अनगिनत चाहे हैं....
बेचारगी की हद हो गई है ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे ,दुर्ग , छत्तीसगढ़
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