Wednesday, 7 June 2023

कुण्डलिया

चित्र आधारित सृजन
तिथि - 27/07/2020
विधा - कुण्डलिया

बैठी है नव यौवना  , बीच नदी की धार  ।
लिए कलश जल साथ में    , खूब किया शृंगार ।
खूब किया शृंगार , केश में गजरा सोहे ।
 ग्रीवा कुंदन हार  , नैन का कजरा मोहे ।
 करे पिया का ध्यान , मानिनी लगती रूठी ।
नहीं समय का भान , नदी में वामा बैठी ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़

Sunday, 2 January 2022

सजल

सजल


अंतस में स्नेह-दीप बालें नए साल में ।

खुशियों भरे गीत गा लें नए साल में ।।


अंतिम प्रहर है गहरी रातें मुश्किलों की ।

स्वर्ण किरण रवि मुख पर डालें नए साल में ।।


धरती के कण-कण में छुपी हुई खुशहाली ।

सच्ची खुशी संतोष पा लें नए साल में ।।


दुख पीड़ा की गठरी को शीश नहीं बाँधें ।

इत्र सुधियों की महका लें नए साल में ।।


नागफनी के बीज न बोना मन-मधुवन में ।

सद्भावों के फूल खिला लें नए साल में ।।


भूलें सारी कड़वी बातें द्वेष-दंभ तज दें ।

 हृदय को गंगा जल बना लें नए साल में ।।


डॉ. दीक्षा चौबे



Saturday, 10 October 2020

दोहे

चार दिनों की जिंदगी , मत कर तू अभिमान ।
महल काम आए  नहीं , छोड़ चला इंसान ।।

जाना है सबको यहाँ , अहंकार को त्याग ।
बहुत दिनों सोया रहा , बीती उम्र अब जाग ।।

अहंकार ने ले लिया  , सही - गलत का ज्ञान ।
समझे  छोटा वह सदा  , खुद को व्यापक मान ।।
डॉ. दीक्षा चौबे

Friday, 21 August 2020

एक दिन ( कहानी )

दिव्या आज सुबह उठी तो सूर्य नारायण अपने दायित्व निभाने आसमान में तैनात हो गए थे और दिव्या को उसके आलस पर चिढ़ा रहे थे । सुबह की भागदौड़ और अधिक मुश्किल हो जाती है यदि उठने में देर हो जाए । वो तो शुक्र है कि उसने रात में ही आधी तैयारी कर ली थी । नाश्ते के लिए आलू की सब्जी पहले ही बना कर रख दी थी , फटाफट आलू के पराठे सेंकती गई और देती गई ।

     आज जितनी बार वह अपने किशोर बेटे शिशिर के कमरे में गई वह फोन पकड़े ही दिखा ।" फिर तू मोबाइल लेकर बैठ गया...जब देखो तब फोन में पता नहीं क्या देखता रहता है । कुुुछ  दिनों  के बाद परीक्षा  है....मम्मी शिशिर को डांट रही थी और उसके कानों पर जूूं नहीं रेंग रही थी , वह फोन पर ही लगा रहा । कुछ देर बाद  दिव्या उधर गई तो शिशिर को फिर फोन के कारण डांट पड़ी । हे भगवान ! मैंने इसे मोबाइल लेकर। क्यों दिया , अब पानी सिर से ऊपर जा रहा है ...तू नहीं
सुधरा तो मोबाइल छीन लूँगी तुझसे। मम्मी ने फोन लेकर टेबल पर रख दिया ,  नहीं  पढूँगा जा गुस्से में कॉपी , किताबें पटक रहा था शिशिर । पन्द्रह - सोलह वर्ष की यह वय
ही ऐसी होती है ....उन्हें लगता है वे जो कर रहे हैं वही
सही है और बाकी गलत । बहुत जल्दी गुुस्सा आ जाता है और चिड़चिड़े  भी हो जाते हैं ।  उन्हें कोई  कारण नहीं सुनना
जिसकी वजह से उनका कोई काम रुके , किसी की सलाह भी नहीं लेनी । माता - पिता तो उनकी नजर में बुद्धू ही रहते हैं ।
            तब - तब ऐसा वाकया होता रहता है जब - जब
उनकी बात नहीं सुनी जाती । माँ - बेटे में कुछ पल अबोला रहता है , फिर पता नहीं कब उनमें सुलह भी
हो जाती है । बेटा माँ को लाड़ करते रहता है और माँ
उसकी फेवरिट डिश पका कर खिलाती रहती है ।
       पर इस बार विवाद कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था
क्योंकि बोर्ड की परीक्षा होने के कारण माँ  परेशान थी
मोबाइल बेटे की कमजोरी बन गई थी । जब भी उसे
मना करते वह कहता पढ़ाई का काम कर रहा हूँ । गूगल
पर कुछ सर्च कर रहा हूँ । न फोन छीनते बन रहा था और न उसे देने का मन कर रहा था । बस अधिक रोक टोक बुरी लग गई और बेटे ने बदतमीजी से बात की । माँ आहत हुई ....उसके आँसू तो जैसे पलकों में ही सवार रहते हैं ....कुछ हुआ नहीं और टपकना शुरू । आज बेटा स्कूल जाते वक्त आवाज देता रहा  ,उसे छोड़ने नहीं गई... नही तो उसके बाहर छोड़ने आये बिना कोई घर से जा नही सकता ।
    शिशिर भी खूब बड़बड़ाता रहा , ऐसी माँ होनी ही
नहीं चाहिए , दिन भर टोकते ही रहती है । फोन पकड़ना मतलब गेम खेलना ही होता है क्या ? मेरी फीलिंग्स कुछ समझती ही नहीं । हुँह.... मैं अपना काम खुद ही कर लूँगा , समझती क्या है मुझे ।
          शाम को  दिव्या के किसी कलीग ने उसके पति तुषार को फोन किया कि स्कूल से लौटते वक्त दिव्या का एक्सीडेंट हो गया है और उसे भिलाई के सेक्टर 9 हॉस्पिटल में एडमिट कराए  हैं तो पल भर के लिए वह कमजोर हो गयेे , फिर
जल्दी से सब सामान पैक कर  वहाँ पहुँचे तो दिव्या के
पैर में प्लास्टर चढ़ा हुआ था । शिशिर को उसकी दीदी  स्नेहा ने एक्सीडेंट के बारे में बताया तो कुछ देर के लिये उसे लगा जैसे उसी के कारण यह सब हुआ ।  फिर उसने  एक लंबी  .साँस भरी और सोचा.. चलो यार !कुछ दिन मम्मी हॉस्पिटल में रहेगी तो उनकी बक - बक से मुक्ति तो मिलेगी । चैन से रहूँगा अकेले । उसने जैसे अपने - आप से कहा था । मैगी का बड़ा पैकेट ले आया था वह ।  माइक्रोवेेेव   में  पकाने रखकर  फोन लेकर बैठ गया । पर आज न मैगी खाने में मजा था और न फोन खेलने में , मम्मी के मना करते रहने पर छुप कर या उन्हें खिजा कर जो मजा आता था । ट्यूशन जाते वक्त न चाहते हुए भी मुँह से निकल गया था - मम्मी, मै जा रहा हूँ । लगा ...अभी मम्मी बाहर आयेगी और ढेर सारी हिदायतें देंगी गाड़ी चलाने को लेकर ....गाड़ी धीरे चलाना ....मोड़ पर हॉर्न  बजाना ....ओवरब्रिज में सावधान रहना । मैं मम्मी से कहता - रोज वही - वही बात कहती हो मम्मी , आप 

रिकॉर्ड क्यों नहीं कर लेती ..बस रिकॉर्डर ऑन कर दिया करो , आपका काम हो जाएगा  । 

       आज न जाने क्यों वही बातें फिर से सुनने को दिल चाह रहा है । कहाँ तो मम्मी को धमकी देता मैं अपने सब काम खुद कर लूँगा पर अब कुछ भी नहीं हो रहा मुझसे । पापा  थोड़ी देर के लिये अस्पताल से  घर आये थे तब बुआ और स्नेहा मम्मी के पास थे। रात को पापा फिर चले गए थे । मेरी परीक्षा पास होने के कारण मुझसे कुछ नहीं कहा जा रहा था । दूसरे दिन अलार्म लगा कर सोया था ताकि समय पर स्कूल जा सकूँ । मम्मी एक जोड़ी यूनिफार्म हमेशा तैयार रखती थी इसलिये दिक्कत नहीं हुई पर मुझे उठाते वक्त वह खूब लाड़ करती थीं... स्नेहा से कहीं अधिक । मेरा सिर सहलाती ,नाक खींचती , मेरे गालों पे प्यार करती ...आज कुछ कमी सी महसूस हुई थी । टिफिन के लिये भी मेरे बड़े नखरे होते ....नहीं आज पराठा नहीं सैंडविच , कभी साबूदाने की खिचड़ी , कभी कटलेट...वह बनावटी गुस्सा दिखाते हुए सब बना देती । मोजे मुश्किल से मिले , बैठे - बैठे मम्मी से बॉटल , जूते  मोजे माँगने की आदत जो पड़ी हुई थी । आज मैगी नहीं खाया गया , न ही कैंटीन में कुछ खाने की इच्छा हुई...तब बहुत होती थी जब मम्मी वहाँ कुछ भी न खाने की ताकीद करती ।शायद किसी काम को नहीं करने की ताकीद ही उसे करने को उकसाती है ।किसी ने ठीक ही कहा है किसी का महत्व उनके न रहने पर ही मालूम होता है ।

      अभी तो एक ही दिन हुए थे मम्मी के बिना  ...और
मुझे उनकी बेहद कमी खल रही थी ...हर बात में ...दिन
भर । जब वह होती थी तब भी और जब नहीं होती थी तब भी...उनकी जो बातें पकाऊ लगतीं थीं आज मेरे कान
वो सब सुनने को तरस रहे थे । लगता था जैसे एक भरम में जी रहा था कि मैं अब बड़ा हो गया हूँ और
मुझे मम्मी की जरूरत नहीं है लेकिन अब समझ में आ
रहा है ...शायद कुछ बातों के लिये मैं कभी बड़ा नहीं
  होऊंगा और बड़े होने के बाद भी मम्मी के बिना जीवन अधूरा ही लगेगा । शाम की ट्यूशन छोड़कर अप्रत्याशित सा मैं मम्मी को देखने हॉस्पिटल पहुँच गया था ...वह लेटी हुई थी ..मुझे देखकर  चमक उठी  थीं उनकी आँखें ...और मैं रोते हुए उनके गले लग गया था , अपने मन में खड़े किये कई विद्रोहों की दीवारों को तोड़कर ....आज ममता के आगोश में वे सब कुतर्क ध्वस्त हो रहे थे  । मम्मी के एक दिन के अलगाव और आँसुओं ने  मेरी अकड़  को धो दिया था  ......मेरा दिमाग सही ठिकाने लग गया था ।

☺️☺️

Saturday, 1 August 2020

ग़ज़ल

भीड़ में भी तन्हा हो जाता है आदमी ,
 चलते- चलते राह खो जाता है आदमी ।

हँसकर सह जाता है दूसरों के दिए जख्म ,
अपनों के वार से रो जाता है आदमी ।

आलीशान महलों में नखरे हैं  नींद के ,
 थका हुआ सड़क पर सो जाता है आदमी ।

कीचड़ से अपना दामन बचाते रहे हैं ,
दौलत से भी दाग धो जाता है आदमी ।

काया देख धोखा नहीं खाना तुम ' दीक्षा '
इंसान से  शैतान हो जाता है आदमी ।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़





उषा / मुद्रा छंद ( चतुक्षरावृत्ति )

उषा / मुद्रा छंद
चतुक्षरावृत्ति  1221
1 जपूँ नाम । सुबह शाम ।।
नहीं काम । बिना राम ।।

2. सही राह । मिले चाह ।।
   सहे आह । हुआ वाह ।।

3. प्राण बोध । नहीं क्रोध ।।
    करें रोध । नहीं शोध ।।

4. हुई भूल । हृदय शूल ।।
     कटी रात । बनी बात ।।

5.  बजे गीत । यही रीत ।।
     हुई प्रीत । बने मीत ।।

6.   बड़े लोग । बढ़े रोग ।।
     निकल प्राण । मिले त्राण ।।

7. बढ़ी शान । घटी आन ।
     छली लोग । बड़े रोग ।।

स्वरचित  - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़

सोरठा ( राखी )

विधा - सोरठा
विषय - राखी

राखी है त्यौहार , भ्रात -बहन के नेह का ।
वसुधा के संस्कार , पूनम चाँद निहारता ।।

रहें हमेशा साथ , शाखें बंधी पेड़ से ।
रक्षाबंधन हाथ , भ्रात बहन को जोड़ता ।।

बहना दिया दुलार , रक्षा बंधन बाँध कर ।
खुशियाँ मिले अपार , मन में मिठास घोल कर ।।

आँगन रहे बहार , राखी पावन दिवस पर ।
रिमझिम पड़ी फुहार , मौसम भी हर्षित हुआ ।।

बहे नैन से नीर , छलके  प्यार भाई का ।
बहना प्यारा वीर , भीगी आँखों देखती ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़

दोहे ( सहयोग )

होंगे पूरे काम  सब , लेकर जन - सहयोग ।
अपनों का जब संग हो , सफल सभी उद्योग ।।

लोगों के सहयोग से , बनते हैं सब काम ।
बाँधा पुल नल - नील ने , पार हुए श्री राम ।।

नारी है घर की धुरी , देती शुभ संस्कार ।
 स्त्री - पुरूष सहयोग से , चलता घर - संसार  ।।

 अखंडता में  देश की , दें अपना  सहयोग ।
सर्व धर्म समभाव से ,गले मिलें सब लोग ।।

जीव - प्रकृति सहयोग से , सुखी रहे संसार ।
सुंदर तन खुशहाल मन , जग को यह उपहार ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़

गीत 19

आँखें भर आती हैं सब की , बेटी की विदाई में ।
टूटे हों तटबंध नदी के , बारिश की ढिठाई में ।।

सीप में पले मोती जैसे  , नाजों में पली बेटी ।
अंबर के तारों -सी झिलमिल , रस्मों में ढली बेटी ।
बढ़ी धान की बाली जैसी  , नेह की सिंचाई में ।
आँखें भर आती हैं सबकी बेटी की विदाई में ।।

घर- आँगन की चिड़िया वह , सभी कोनों में चहकी ।
बगिया के सुंदर फूलों -सी  , लगती वह सदा महकी ।
सूनेपन की पीर है  छलकी  , माता की रुलाई में ।।
आँखें भर आती हैं  सबकी , बेटी की विदाई  में ।।

सेतु बनी दो परिवारों की , शोभा आँगन की बनी ।
दो कुल की अभिमान बनी वह , प्यारी बनी साजन की ।
 खुशहाली के फल लद जाएँ , प्रीति की अमराई में ।।
आँखें भर आती हैं सबकी  , बेटी की विदाई में ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़





Friday, 31 July 2020

छत्तीसगढ़ी गीत

देखत हावव रस्ता तोर , तरिया के पार मा ।
आ जाबे गोरी तैं हर , सोलह सिंगार मा ।।

धान  कस सुघ्घर हरियर तोर लुगरा हे ,
बादर कस करिया तोर आँखी के कजरा हे ।
 ददरिया गाबो दुनो झन , बुता करत खार मा ।
आ जाबे गोरी तें हर , तरिया के पार मा ।।

लाली लाली चुरी पहिरे ,कनिहा करधनिया ओ ,
सुरुज असन दमकत हे ,माथे के बिंदिया ओ ।
झूम जाथे मोर जियरा  ,पैरी के झनकार मा ।
आ जाबे गोरी तें हर , सोलह सिंगार मा ।।

तोर बोली कोइली असन , अब्बड़ नीक लगथे ,
नागिन सही तोर केश म , मोर नैन अरझथे ।
जिवरा हर मोर भेदागे , तोर नैन के कटार मा ।
आ जाबे गोरी  तैं हर , सोलह सिंगार मा ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़









राखी ( लघुकथा )

  राज की अपनी सहकर्मी नेहा से बिल्कुल नहीं जमती थी , अकड़ू , घमंडी इत्यादि उपनामों से कई बार सुशोभित किया था उसे । नेहा  की भी राज के बारे में यही राय थी कि वह अपने आपको तीसमार खान समझता है जैसे उससे होशियार दुनिया में कोई और है ही नहीं । सच भी था कि राज अपने कार्य में एक्सपर्ट था । पिछले कई वर्षों से देख रही थी नेहा ,राज पूरे वर्ष अपनी बहन की राखी नहीं उतारता था । राखी के दिन ही पुरानी राखी तोड़कर नई बंधवाता था । इस बार उसने नई राखी नहीं बाँधी थी ,वही पुरानी राखी पहने घूम रहा था तो नेहा ने उसे सुना दिया " इस बार दीदी से लड़ लिया क्या लड़ाकू तभी दीदी ने राखी नहीं भेजी "। हमेशा बहस करनेवाले राज की आँखें नम हो गई और वह बिना कुछ कहे चुपचाप वहाँ से चला गया । उसके दोस्त निहार ने बताया कि राज की बहन का निधन हो गया है । नेहा को अपने बर्ताव पर बहुत पछतावा हुआ । वह ऑफिस में सबके सामने जोर से रोने लगी और राज से माफी माँगने लगी । उसने अपने बैग से राखी निकाली और राज की कलाई पर बाँधते हुए बोली - "अब यह कलाई कभी खाली नहीं रहेगी , यह अकड़ू बहन चलेगी न । "
  राज ने हँसते हुए कहा - "सोच लो , फिर तो तुम्हें डाँटने का कॉपीराइट मिल जाएगा मुझे "।  " चलेगा ..भाई - बहन के प्यार में लड़ाई तो चलता है, इस लिहाज से पहले ही हम भाई बहन बन चुके हैं ,है ना.." दोनों की आँखों से खुशी के आँसू झर रहे थे ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़

Thursday, 30 July 2020

दोहे ( अहंकार )

चार दिनों की जिंदगी , मत कर तू अभिमान ।
महल काम आए नहीं , छूटे सब सामान ।।

जाना है सबको यहाँ , अहंकार को त्याग ।
बहुत दिनों सोया रहा , बीती बेला जाग ।।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़

शिक्षादान ( लघुकथा )

*शिक्षादान* (लघुकथा )
         शादी के बाद रुचि को पति के साथ मुंबई आना पड़ा । उसे अपनी चार वर्ष की नौकरी छोड़नी पड़ी , यह बात उसे बहुत पीड़ा दे रही थी । पति के ऑफिस चले जाने के बाद वह बहुत   बोर होती , पहले  उसकी कितनी व्यस्त दिनचर्या रहती थी । एक दिन उसके पड़ोस में रहने वाली चाची अपनी बेटी प्रिया को लेकर आई जिसे अपनी पढ़ाई में कुछ समस्या आ रही थी । रुचि ने उसे कुछ दिन पढ़ाया , प्रिया को उसके पढ़ाने की शैली पसंद आई और उसने आगे भी पढ़ाने के लिए रुचि  से निवेदन किया । प्रिया की दो - तीन सहेलियाँ भी पढ़ने आने लगी थीं । रुचि को अपनी शिक्षा सार्थक लगने लगी थी । शिक्षित होने की अंतिम परिणति सिर्फ नौकरी ही क्यों ? थोड़ा ही सही पर समाज को वह अपना योगदान तो दे रही थी । शिक्षादान करके उसे अत्यंत सन्तुष्टि और आनन्द की प्राप्ति हो रही थी  ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Wednesday, 29 July 2020

बेटी पर दोहे

दोहे
विषय - बेटी

बेटी पढ़ती है  यहाँ , जीवन रुपी किताब ।
मन के कोरे स्लेट पर , मिलते लिखे जवाब ।।

पढ़ी लिखी बेटी  करे , राष्ट्र जगत  कल्याण ।
 बदलें सभी विचार तब  ,  मिले दुखों से त्राण ।

पढ़ - लिखकर बेटी बने  , मात- पिता का मान ।
सफल रही हर क्षेत्र में  , सभी काम आसान  ।

मलयज की पावन महक  , मधुबन की है शान ।
बेटी पढ़ -लिख कर बनी , दो घर का अभिमान ।

दीपक के उजियार से, अँधियारा हो दूर ।
पढ़-लिख बेटी हो सफल , प्रियजन करें गुरूर ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़




मुक्तक

मर्यादित है नीर नदी के तटबंध में ,
पलता है विश्वास प्रेमाकुल सम्बन्ध में ।
प्रेम देना पड़ता है प्रेम पाने के लिए_
रीत की सौगंध है प्रीत के अनुबंध में ।।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़ 

Monday, 27 July 2020

गीत 18

गीत

जीवन-पथ पर चलने की, सही राह दिखलाई है ।
रामकथा लिखकर तुलसी ने , जन-जन तक पहुँचाई है ।।

मात-पिता का मान बढ़ाया , पाठ पढ़ाया संयम का।
वनवास लिया हँसते- हँसते ,वचन निभाया रघुकुल का।
महलों का वैभव त्याग दिया , कुल की रीति निभाई है।।
रामकथा लिखकर.....

शबरी के जूठे बेर चखे, गुहराज-राम मित्र बने ।
 उद्धार अहिल्या का करके, अनुकरणीय चरित्र बने।
 दैत्यों को यमलोक दिखाया, संतों की पहुनाई है ।
रामकथा लिखकर.....

बाली वध कर शासन भार्या , मित्र सुखद उपहार दिया ।
पत्नी की रक्षा की खातिर , रावण का संहार किया ।
मर्यादित आचरण सिखा कर , राहें नई दिखाई है ।।
रामकथा लिखकर....

पालनहार बने जनता के , दीन-दुखी को अपनाया ।
समरसता का पाठ पढाकर ,जंगल को नगर बनाया ।
राम -राज्य  में सुखी रहें सब , राज नीति सिखलाई है ।
रामकथा लिखकर.....

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़

Saturday, 25 July 2020

लक्ष्य ( मनहरण घनाक्षरी )

मनहरण घनाक्षरी

लक्ष्य का संधान कर , नीति का विधान कर ,
श्रम अनुष्ठान कर , जग मिल  जाएगा ।

निशा को विहान कर ,नीचे आसमान कर ,
त्याग तप जो करे , सुख वही पाएगा ।

हौसला उफान पर , जोश की उड़ान भर ,
झुका कर आसमान , तारे तोड़ लाएगा ।

भूमिजा बने उर्वर  , स्वेद जल सींच कर ,
जीवन सफल कर , सुख फल खाएगा ।

- डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

Friday, 24 July 2020

उम्मीद (लघुकथा )

     आज खाली बैठे दो माह हो गये थे  , रामू  बड़ी निराशा के साथ अपने ठेले को देख रहा था । उसके मटर चाट और पापड़ी भेल का ठेला प्रसिद्ध था । शाम होते ही उसके ठेले पर भीड़ उमड़ पड़ती थी । महीने के बीस - पच्चीस हजार आराम से कमा लेता था । कोरोना के कारण काम बंद हो गया , जमा पूँजी भी कब तक चलेगी , अब उसे चिंता हो रही थी । तभी उसने अपने दोस्त जिसका चाट , गुपचुप का ठेला था उसे सब्जियाँ बेचते देखा । रामू के मन में भी उम्मीद की किरण जाग उठी । उसने देखा कि उसके मोहल्ले के लोगों को दूध लेने मुख्य सड़क तक जाना पड़ता है । रामू ने दूध के पैकेट बेचना शुरू कर दिया और उसे अच्छी आमदनी होने लगी ।
यदि हम उम्मीद का दामन थामे रखें तो  जीवन में  आने वाली हर कठिनाई से लड़ सकते हैं , रामू ने यह समझ लिया था ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़

Wednesday, 22 July 2020

विधाता ( दोहे )

भाग्य विधाता ने रचा , यह सुंदर संसार ।
अद्भुत उसकी सर्जना , लोचन सुखद अपार ।।

गढ़े विधाता ने यहाँ , भाँति - भाँति के लोग ।
सरस सलिल सरिता बहे , मनुज करे उपभोग ।।

धरती माँ पोषण करे , पर्वत पिता समान ।
विपिन विधाता ने दिए , कर इनका सम्मान ।।

पारस पावन अनल है , शीतल मंद समीर ।
दान विधाता ने दिया , निर्झर निर्मल नीर ।।

गढ़े विधाता ने यहाँ , सुंदर दृश्य अभिराम ।
उपवन सी दुनिया बनी , पावन सुरभित धाम ।।

स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ,छत्तीसगढ़

Tuesday, 21 July 2020

रूप घनाक्षरी

अंधकार निराशा का , एक दिन जाएगा ही ,
लंबी चाहे कितनी हो , बीतेगी जरूर रात ।
तम गया रवि आया , जीवन उजास लाया ,
एक नवीन उत्साह , ले आया नव प्रभात ।
सुमन महक उठे , गगन लहक उठे ,
पवन के आगोश में , प्रमुदित हुआ गात ।
आस्था बनाये रखना ,यत्न करते रहना ,
साधना करते रहो ,बनेगी जरूर बात ।।

सुविधा साधन मिला , सुख का भाजन मिला ,
जिंदगी में सब मिले , मिले नहीं पितु - मात ।