Friday, 15 May 2020

भूख ( लघुकथा )

      भूख ( लघुकथा)
        1
     रवि जिस  थाने का प्रभारी था  उस क्षेत्र में मजदूरों के पलायन की सूचना मिली थी । संज्ञान लेने वह पहुँचा तो उसके सिपाही उन्हें रोक कर रखे थे । महोदय , ये लोग पैदल ही पटना जाने के लिए निकले हैं .…साथ में बच्चे भी हैं । रवि बोला - "क्यों जी इतने दूर पैदल कैसे जाओगे  ? अपने साथ दूसरों की जान भी जोखिम में डाल रहे आप लोग । इतनी बड़ी बीमारी है कोरोना इससे डर नहीं लगता क्या  ? " "दो माह से काम बन्द है साहब , जमापूंजी खत्म हो गई । खाने - पीने का ठिकाना नहीं है इसलिए अपने गाँव जा रहे हैं ,वहाँ कुछ तो मिलेगा । साहब कोरोना से कैसा डर  , भूख से बड़ी भी कोई बीमारी है साहब ?
     रवि ने कुछ रुपये ,  खाने का सामान देकर उन्हें एक ट्रक में बिठा दिया । पूरे दिन उसके कानों में यही गूँजता रहा - " भूख से बड़ी भी कोई बीमारी है साहब " ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़


 2
    मानव ने अपने घर की बालकनी से देखा दो  अधनङ्गे बच्चे कचरे के डिब्बे में कुछ ढूंढते और मुँह में डालते जाते । यह सब देखकर मानव का दिल रो दिया ।ओह ! भूख न गंदगी देखती है और न जगह , वह दौड़कर नीचे आया और उन दोनों को अपने घर लेकर आया । उन्हें हाथ धोने के लिए पानी दिया और रसोई में खाने की चीजें देखने लगा । मम्मी उसके लिए खाना बनाकर ऑफिस गई थी , उसने पूरा खाना एक थैली में रखकर उन्हें दे दिया । रोटी में सब्जी लगाकर वे तुरंत दो - दो रोटी चट कर गए । मानव उन्हें खाते देखकर स्वयं तृप्त हो रहा था । शायद ऐसा सन्तोष उसे पेट भरने पर भी नहीं होता जितना आज खाली पेट महसूस हो रहा था ।
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग , छत्तीसगढ़

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